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सूडान के नुहुद में अल-जारा सोने की खदान ढही, मलबे में दबकर 67 मजदूरों की मौतदुनिया
19 सित॰ 2026, 2:19 pm (41 दिन पहले)· 1

सूडान के नुहुद में अल-जारा सोने की खदान ढही, मलबे में दबकर 67 मजदूरों की मौत

सूडान के वेस्ट कोर्डोफान प्रांत में स्थित अल-जारा गोल्ड माइन अचानक ढहने से कम से कम 67 मजदूरों की मौत हो गई। तीन दिनों तक कोई सरकारी बचाव दल न पहुंचने पर लाचार ग्रामीण और परिजन अपने हाथों से ही मलबा हटाकर अपनों की तलाश करने पर मजबूर हैं।

सूडान के वेस्ट कोर्डोफान प्रांत में आजीविका की तलाश में जमीन की गहराइयों में उतरे मजदूरों पर कुदरत और इंसानी लापरवाही का भयानक कहर टूटा है। नुहुद शहर के पास स्थित अल-जारा सोने की खदान अचानक भरभराकर गिर गई, जिसकी जद में आने से कम से कम 67 श्रमिकों की जान चली गई। जिस जगह पर हर रोज भारी गहमागहमी रहती थी और मजदूर उम्मीदों के साथ उतरते थे, वह इलाका अब एक मातम भरे श्मशान में तब्दील हो चुका है। खदान के अंदर बनी गहरी सुरंगों में अभी भी दर्जनों लोग दबे हुए हैं, लेकिन प्रशासनिक बदहाली का आलम यह है कि हादसे के तीन दिन बीत जाने के बाद भी कोई सरकारी राहत या बचाव दल मौके पर नहीं पहुंच सका। नतीजतन, पीड़ित परिवारों के लोग अपनी कांपती उंगलियों, नंगे हाथों और मामूली औजारों से कीचड़ तथा भारी पत्थरों को हटाकर अपनों की तलाश करने को विवश हैं।

मंगलवार की देर रात हुआ खौफनाक हादसा

यह भीषण त्रासदी मंगलवार की देर रात उस वक्त पेश आई, जब खदान की विभिन्न भूमिगत सुरंगों में बड़ी संख्या में मजदूर सोने के कणों की तलाश कर रहे थे। उसी दौरान खदान के ऊपरी हिस्से की कच्ची मिट्टी और भारी चट्टानें अचानक खिसकने लगीं। चश्मदीदों के मुताबिक, ढहने की रफ्तार इतनी तेज थी कि नीचे काम कर रहे कामगारों को संभलने या बाहर भागने का रत्ती भर भी मौका नहीं मिला। देखते ही देखते पूरी खदान ताश के पत्तों की तरह ढह गई और सैकड़ों टन कीचड़, मलबा तथा पत्थर मजदूरों पर आ गिरे।

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हादसे की जोरदार आवाज और चीख-पुकार सुनकर आसपास के गांवों के बाशिंदे और सतह पर मौजूद बचे हुए श्रमिक बदहवास हालत में खदान की ओर दौड़े। लेकिन खदान की अत्यधिक गहराई और संकरी, घुमावदार सुरंगों के जाल के कारण अंदर फंसे लोगों तक पहुंचना पूरी तरह नामुमकिन साबित हुआ। घटनास्थल पर मौजूद मेडिकल टीम और प्रत्यक्षदर्शियों का स्पष्ट कहना है कि मलबे के भारी ढेर के नीचे अब भी कई लोग दबे हुए हैं, जिससे मृतकों का यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ सकता है।

चश्मदीदों का छलका दर्द, बिना मशीनों के दम तोड़ती उम्मीदें

इस खौफनाक हादसे से किसी तरह जिंदा बच निकलने वाले मजदूर खैर-अल-सईद गबारा ने हालात की भयावहता को साझा किया। खैर-अल-सईद गबारा के मुताबिक, पूरी घटना इतनी अप्रत्याशित और तेज थी कि किसी को भी बचने का रास्ता नहीं सूझा। उन्होंने सबसे दिल दहलाने वाली सच्चाई यह बताई कि घटनास्थल पर मलबे को हटाने के लिए कोई भारी क्रेन, जेसीबी या आधुनिक खुदाई मशीन मौजूद नहीं है। स्थानीय ग्रामीण और जीवित बचे मजदूर अपने हाथों, फावड़ों और मामूली औजारों के सहारे ही विशाल चट्टानों और दलदली कीचड़ को हटाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

वहीं एक अन्य मजदूर अल-अमीन सुलेमान ने खदान की आंतरिक संरचना का जिक्र करते हुए बताया कि खदान के भीतर कई छोटी और बेहद जटिल सुरंगें काटी गई थीं। इन पतली सुरंगों की गहराई में कई मजदूर अभी भी फंसे हुए हैं। अल-अमीन सुलेमान का कहना है कि जब तक दुर्घटनास्थल पर भारी मशीनें और बड़ी क्रेन नहीं लाई जातीं, तब तक मलबे में दबे इन लोगों को जीवित बाहर निकाल पाना लगभग नामुमकिन है। जैसे-जैसे घंटे बीत रहे हैं, जमीन के नीचे दबे मजदूरों की सांसें थमने का खतरा लगातार गहराता जा रहा है।

गृहयुद्ध की तबाही और अवैध खनन का खूनी गठजोड़

सूडान में घटित यह वीभत्स वाकया सिर्फ एक ढांचागत नाकामी या हादसा भर नहीं है, बल्कि इसके तार देश में चल रहे खूनी गृहयुद्ध और बेरोकटोक जारी अवैध खनन से सीधे जुड़े हैं। वेस्ट कोर्डोफान का यह पूरा इलाका पैरामिलिट्री ग्रुप ‘रैपिड सपोर्ट फोर्सेज’ (RSF) के सीधे नियंत्रण में आता है। पिछले तीन सालों से RSF और सूडानी सेना के बीच पूरे मुल्क में भीषण और रक्तपात से भरी जंग लड़ी जा रही है। इस अंतहीन संघर्ष के कारण इलाके की समूची प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिक ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है, जिसके चलते संकट के समय जरूरी संसाधन और भारी मशीनरी मौके तक नहीं पहुंच पा रही है।

अफ्रीकी महाद्वीप में सूडान को सोना उत्पादन के मामले में एक प्रमुख देश माना जाता है, लेकिन यहां का कड़वा सच यह है कि अधिकांश खनन कार्य बिना किसी सुरक्षा मानक, वैज्ञानिक योजना या तकनीकी निगरानी के किया जाता है। गृहयुद्ध के इस दौर में खदानों पर विभिन्न हथियारबंद गिरोहों और लड़ाकों का शिकंजा कस चुका है। ये विद्रोही गुट अपने सैन्य खर्चों, गोला-बारूद और हथियारों की खरीद का इंतजाम करने के लिए निर्धन मजदूरों को इन जानलेवा परिस्थितियों में काम करने के लिए झोंकते हैं। दूसरी तरफ, भयंकर भुखमरी, बेरोजगारी और गरीबी से जूझ रहे स्थानीय लोगों के पास जीवित रहने का कोई अन्य साधन नहीं बचा है, जिससे वे अपनी जान हथेली पर रखकर इन असुरक्षित और कच्ची खदानों में उतरने के लिए मजबूर हैं।

सुरक्षा मानकों की अनदेखी और खदानों का रक्तरंजित इतिहास

सूडान के खनन क्षेत्र में मजदूरों का इस तरह जिंदा दफन हो जाना कोई अप्रत्याशित या पहली घटना नहीं है। सुरक्षा नियमों की खुली अवहेलना और सरकारी उदासीनता के चलते यहां की खदानों में अक्सर ऐसे घातक हादसे होते रहते हैं

  • साल 2021 की त्रासदी: वर्ष 2021 में इसी वेस्ट कोर्डोफान प्रांत में सोने की एक विशाल खदान धंस गई थी, जिसमें दबकर 38 मजदूरों ने अपनी जान गंवा दी थी।
  • साल 2023 का हादसा: वर्ष 2023 में भी एक अन्य खदान के अचानक ढह जाने के कारण 14 निर्दोष कामगारों की दर्दनाक मौत हुई थी।
  • अवैध और असुरक्षित खुदाई: देश भर में ज्यादातर खदानें बिना किसी वैध सरकारी अनुमति, तकनीकी पंजीकरण या इंजीनियरिंग निरीक्षण के मनमाने तरीके से संचालित की जाती हैं।
  • बुनियादी सुरक्षा का अभाव: इन कच्ची खदानों में सुरंगों को सहारा देने के लिए न तो कंक्रीट या लकड़ी के मजबूत पिलर बनाए जाते हैं और न ही भूमिगत स्तर पर काम करने वालों के लिए ऑक्सीजन या आपातकालीन निकास की कोई व्यवस्था होती है।
  • जवाबदेही की कमी: इतने बड़े-बड़े हादसों और अनगिनत मौतों के बावजूद न तो अवैध खदान संचालकों पर कोई दंडात्मक कानूनी कार्रवाई की जाती है और न ही मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं।

बचाव कार्य की राह में खड़ी चार प्रमुख चुनौतियां

हादसे के बाद बचाव अभियान चलाने में कई विकट बाधाएं सामने आ रही हैं, जिन्होंने जमीनी हालात को और अधिक पेचीदा बना दिया है

  • भारी मशीनरी की भारी कमी: इलाका बेहद दुर्गम, पिछड़ा और मुख्य मार्गों से कटा होने के कारण वहां आधुनिक क्रेन, खुदाई उपकरण या जेसीबी गाड़ियां नहीं पहुंच सकी हैं।
  • गृहयुद्ध और RSF का नियंत्रण: क्षेत्र पर पैरामिलिट्री RSF का सैन्य कब्जा होने के कारण न तो केंद्र सरकार की एजेंसियां और न ही अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायता टीमें स्वतंत्र रूप से मौके पर पहुंच पा रही हैं।
  • भुरभुरी और कच्ची मिट्टी का जोखिम: खदान क्षेत्र की मिट्टी बेहद भुरभुरी, दलदली और अस्थिर है, जिससे हाथों या फावड़ों से मलबा हटाते समय दोबारा भूस्खलन होने का खतरा बना हुआ है।
  • समय का संकट और ऑक्सीजन की कमी: सैकड़ों टन मलबे के नीचे दबी संकरी सुरंगों में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से खत्म हो रहा है, जिससे फंसे लोगों के बचने की उम्मीदें हर गुजरते पल के साथ धुंधली पड़ रही हैं।

सवाल-जवाब

सूडान के वेस्ट कोर्डोफान में खदान हादसे में कितने मजदूरों की जान गई है?
इस दर्दनाक हादसे में कम से कम 67 मजदूरों की जान जा चुकी है और कई लोग अब भी मलबे के नीचे फंसे हुए हैं।
यह दुर्घटना किस जगह और किस खदान में हुई?
यह हादसा सूडान के वेस्ट कोर्डोफान प्रांत के नुहुद शहर में स्थित अल-जारा सोने की खदान में हुआ।
हादसे के बाद बचाव कार्य में भारी मशीनें क्यों नहीं पहुंच पाईं?
इलाके में पिछले तीन साल से जारी भीषण गृहयुद्ध, प्रशासनिक बर्बादी और रैपिड सपोर्ट फोर्सेज के नियंत्रण की वजह से क्रेन या जेसीबी गाड़ियां नहीं पहुंच सकीं।
मलबे में दबे मजदूरों को निकालने के लिए स्थानीय लोग क्या कर रहे हैं?
मदद के लिए कोई सरकारी टीम न आने के कारण परिजन और ग्रामीण अपने हाथों, उंगलियों और फावड़ों से मिट्टी हटाकर अपनों को तलाश रहे हैं।
क्या इस इलाके में पहले भी ऐसे खदान हादसे हुए हैं?
हां, इसी वेस्ट कोर्डोफान प्रांत में साल 2021 में खदान ढहने से 38 मजदूरों की और 2023 में 14 मजदूरों की जान जा चुकी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sophie Laurent@sophie-laurent·40 दिन पहले

सूडान के वेस्ट कोर्डोफान में अल-जारा खदान की यह त्रासदी देश में जारी संघर्ष और प्रशासनिक विफलता के बीच अनियंत्रित खनन के गंभीर खतरों को उजागर करती है। तीन दिनों तक सरकारी बचाव दल का न पहुंचना और स्थानीय लोगों का अपने हाथों से मलबा हटाना यह दर्शाता है कि संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में बुनियादी मानवीय सहायता का ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है, जिससे आने वाले समय में ऐसी आपदाओं और मानवीय संकटों के और गहराने की आशंका है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·40 दिन पहले

सूडान के वेस्ट कोर्डोफान प्रांत में अल-जारा सोने की खदान का ढहना केवल एक स्थानीय आपदा नहीं है, बल्कि यह गृहयुद्ध के बीच चरमराती प्रशासनिक व्यवस्था और खस्ताहाल बुनियादी ढांचे का गंभीर भू-राजनीतिक परिणाम है। तीन दिनों तक सरकारी बचाव दल का न पहुंचना राज्य की विफलता को उजागर करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि संकट के समय आम नागरिकों को अपनी ही किस्मत पर छोड़ दिया गया है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·40 दिन पहले

अर्जुन मेहता के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह प्रशासनिक उदासीनता न केवल राज्य की विफलता को दर्शाती है, बल्कि अनियंत्रित और अवैध खनन की ओर भी इशारा करती है जहाँ सुरक्षा मानकों की पूरी तरह अनदेखी की जाती है। यदि समय रहते भारी मशीनरी और विशेषज्ञ राहत दल नहीं पहुंचे, तो यह लापरवाही और अधिक जिंदगियों को लील सकती है, और इस प्रकार की त्रासदियां तब तक रुकेंगी नहीं जब तक इस क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर सख्त निगरानी और नियम लागू नहीं किए जाते।

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·40 दिन पहले

सूडान के वेस्ट कोर्डोफान प्रांत में अल-जारा खदान का ढहना और तीन दिन तक सरकारी राहत दल का न पहुंचना इस बात का गहरा प्रमाण है कि गृहयुद्ध से जूझ रहे देशों में बुनियादी ढांचा कैसे चरमरा चुका है। बिना भारी मशीनों के लाचार ग्रामीणों का अपने हाथों से मलबा हटाना मानवीय संकट को और गंभीर बनाता है, और यदि तुरंत प्रशासनिक मदद नहीं मिली तो यह त्रासदी प्रशासनिक उदासीनता का एक बड़ा प्रतीक बन जाएगी।

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·40 दिन पहले

सूडान के वेस्ट कोर्डोफान की अल-जारा खदान में हुए इस हादसे ने अनियंत्रित और अवैध खनन की खतरनाक वास्तविकताओं को उजागर कर दिया है। संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में राज्य की प्रशासनिक पकड़ कमजोर होने से ऐसे हादसे आम हो जाते हैं। जब तक सरकार या स्थानीय प्रशासन सुरक्षा और तकनीकी मानकों को सख्ती से लागू नहीं करता, तब तक आजीविका की तलाश में जान जोखिम में डालने वाले इन मजदूरों की सुरक्षा पर संकट हमेशा बना रहेगा।

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