वाशिंगटन स्थित व्हाइट हाउस में आयोजित एक खास रात्रिभोज के दौरान कूटनीतिक चर्चाओं के साथ-साथ डिनर टेबल पर परोसी गई ड्रिंक भी वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन गई। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस औपचारिक डिनर में स्पार्कलिंग वाइन का लुत्फ उठाया। जब दोनों वैश्विक नेताओं ने इस खास वाइन से भरे गिलासों को आपस में टकराकर टोस्ट किया, तो कूटनीति के साथ-साथ इस पेय को लेकर भी लोगों में भारी उत्सुकता देखने को मिली। हर कोई यह समझना चाहता है कि आखिरकार इन दो शक्तिशाली देशों के शीर्ष नेताओं ने इसी खास वाइन को टेबल पर जगह क्यों दी, यह कैसे बनती है, इसकी खुदरा कीमतें क्या हैं और दुनिया भर में इसका व्यापारिक दायरा कितना बड़ा है।
बोतल में बुलबुले तैयार करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया
अमेरिका के भीतर तैयार होने वाली बुलबुलेदार स्पार्कलिंग वाइन के सबसे बड़े हिस्से का उत्पादन कैलिफोर्निया में केंद्रित है। इसे पारंपरिक पद्धति से तैयार करने की विधि काफी विस्तृत और धैर्य की मांग करती है। वाइन को बोतलबंद करते समय उसमें यीस्ट और शुगर को एक साथ मिलाया जाता है, जिसके बाद फरमेंटेशन की रासायनिक प्रक्रिया शुरू होती है। इस पूरी क्रिया से प्राकृतिक तौर पर कार्बन पैदा होती है, जो सीलबंद बोतल के भीतर बुलबुलों के रूप में सुरक्षित रह जाती है। स्वाद और बनावट को बेहतरीन रूप देने के लिए इन बोतलों को लंबे समय तक यीस्ट के संपर्क में रखा जाता है और धीरे-धीरे घुमाते हुए आपस में ब्लेंड किया जाता है। इस जटिल प्रक्रिया की वजह से इसके टेक्सचर और फ्लेवर में गहरा निखार आता है।
इसके अलावा इसे तैयार करने का एक दूसरा और अधिक तीव्र तरीका भी चलन में है। इस वैकल्पिक पद्धति में भारी दबाव वाले स्टील टैंक का इस्तेमाल किया जाता है। दबावयुक्त टैंक में तैयार करने से वाइन बहुत कम समय में बनकर तैयार हो जाती है, लेकिन पारंपरिक बोतल विधि की तुलना में इसका स्वाद उतना अधिक समृद्ध और प्रीमियम नहीं माना जाता।
कीमत का दायरा और कूटनीतिक चुनाव का मतलब
कीमत के पैमाने पर अगर देखा जाए, तो स्पार्कलिंग वाइन की बोतलें सामान्यतः 20 डॉलर से मिलना शुरू हो जाती हैं और प्रीमियम स्तर पर 200 डॉलर तक पहुंचती हैं। यदि भारतीय मुद्रा में इसका हिसाब लगाया जाए, तो यह कीमत लगभग 1,800 रुपये से लेकर 18 हजार रुपये तक बैठती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब यह कोई बहुत अधिक अति-प्रीमियम पेय नहीं है, तो फिर दोनों राष्ट्राध्यक्षों ने इसी वाइन से जाम क्यों टकराए।
इसका वास्तविक कारण वाइन के अंतरराष्ट्रीय कारोबारी समीकरणों में छिपा हुआ है। दुनिया में स्पार्कलिंग वाइन का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार अमेरिका और चीन ही हैं। इस सांकेतिक चुनाव के माध्यम से दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने अपने-अपने नागरिकों को यह संदेश देने की कोशिश की कि दोनों महाशक्तियों के बीच यह औपचारिक बातचीत पूरी तरह से चीनी और अमेरिकी जनता के आर्थिक और व्यापारिक हितों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रही है।
75 अरब डॉलर के वैश्विक बाजार में दोनों देशों का दबदबा
आंकड़ों के नजरिए से देखें तो इस बुलबुलेदार वाइन का सबसे बड़ा केंद्र अमेरिका ही बना हुआ है। वर्ष 2025 में दुनिया भर के कुल स्पार्कलिंग वाइन बाजार का लगभग 26 फीसदी हिस्सा अकेले अमेरिका के नियंत्रण में दर्ज किया गया था। पूरी दुनिया में स्पार्कलिंग वाइन का समूचा उद्योग करीब 75 अरब डॉलर का है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 7 लाख करोड़ रुपये के आसपास बैठता है।
इस भारी-भरकम वैश्विक कारोबार में अकेले अमेरिका का योगदान लगभग 10 अरब डॉलर का दर्ज किया गया है। वहीं दूसरी तरफ चीन का घरेलू बाजार भी पीछे नहीं है, जिसका आकार करीब 6 अरब डॉलर के स्तर पर आंका गया है। दुनिया भर की कुल हिस्सेदारी में चीन का योगदान 14 फीसदी से अधिक दर्ज है। यदि इन दोनों मुल्कों के बाजार को जोड़ दिया जाए, तो अमेरिका और चीन मिलकर इस 75 अरब डॉलर वाले वैश्विक स्पार्कलिंग वाइन बाजार के 40 फीसदी से भी ज्यादा हिस्से पर सीधा कब्जा रखते हैं।
























