ब्रिटिश प्रशासन ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रसार से देश की अर्थव्यवस्था को मिलने वाले वित्तीय लाभ के अपने बहुप्रचारित अनुमानों में अचानक भारी कटौती कर दी है। पिछले दो वर्षों के दौरान नीति निर्माताओं ने लगातार यह दावा किया था कि नए कंप्यूटेशनल टूल्स ब्रिटिश बाजार में लगभग चार सौ अरब पाउंड का इजाफा कर सकते हैं, जिससे रोजगार संकट की चिंताओं को शांत करने में मदद मिल रही थी। हालांकि, संसद में पेश किए गए एक आधिकारिक स्पष्टीकरण ने यह उजागर कर दिया है कि वह विशालकाय आंकड़ा किसी स्वतंत्र सरकारी विश्लेषण का परिणाम नहीं था, बल्कि तकनीकी कंपनी गूगल द्वारा प्रायोजित एक बाहरी अध्ययन से उठाया गया था। आंतरिक विश्लेषकों का नया मूल्यांकन बताता है कि वास्तविक वित्तीय विस्तार पुराने दावे के एक तिहाई हिस्से तक भी शायद ही पहुंच पाएगा।
संसदीय खुलासे से सामने आई वास्तविक स्थिति
कृत्रिम बुद्धिमत्ता मामलों के मंत्री कनिष्क नारायण ने इस विषय पर पूछे गए एक विधायी सवाल का जवाब देते हुए स्वीकार किया कि आधिकारिक आकलन पूर्व दावों की तुलना में काफी संयमित हैं। उनके अनुसार, एडवांस्ड डेटा प्रणालियों और कम्प्यूटेशनल तकनीकों को अपनाने से वर्ष 2030 तक राष्ट्रीय उत्पादन में पचपन अरब पाउंड से लेकर एक सौ चालीस अरब पाउंड के बीच बढ़ोतरी होने की संभावना है। सरकारी तंत्र का केंद्रीय अनुमान लगभग एक सौ बीस अरब पाउंड बैठता है, जो पहले प्रचारित संख्या से बेहद कम है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह नया और अद्यतन मूल्यांकन भी बेहद अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है और इसे किसी पक्के वित्तीय परिणाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
संसद में पेश किए गए इस आधिकारिक उत्तर में पहली बार यह बात लिखित रूप में दर्ज की गई कि चार सौ अरब पाउंड वाला पुराना दावा असल में वर्ष 2023 की एक सार्वजनिक सामग्री से लिया गया था। यह सामग्री गूगल के लिए ब्रिटिश परामर्शदाता संस्था पब्लिक फर्स्ट ने तैयार की थी, जिसे अब पीएफ ग्लोबल नाम से जाना जाता है। इस खुलासे के बावजूद सरकार ने पुराने आंकड़े को औपचारिक रूप से खारिज नहीं किया और न ही उसे पूरी तरह त्रुटिपूर्ण करार दिया, लेकिन दोनों आकलनों को पहली बार एक साथ रखकर नीतिगत अंतर को सार्वजनिक जरूर कर दिया।
धीमी रफ्तार और बदलते हुए गणितीय मॉडल
पुराने और नए अनुमानों के बीच उभरे इस बड़े फासले पर प्रतिक्रिया देते हुए पीएफ ग्लोबल में अर्थशास्त्र के प्रमुख जोनाथन डुपोंट ने संकेत दिया कि ब्रिटिश प्रशासनिक हलकों में नई तकनीक के उपयोग की रफ्तार उम्मीद से कहीं ज्यादा सुस्त रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मशीन लर्निंग जैसी प्रणालियां बहुत तेजी से बदलती हैं और व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर विश्लेषणात्मक गणित को समय-समय पर संशोधित करना आवश्यक हो जाता है। उनके अनुसार, सरकारी अनुमान अब उस गति से काफी कम रफ्तार मानकर चल रहे हैं, जिसे वर्ष 2023 के शुरुआती मॉडल तैयार करते समय संभव समझा गया था।
विश्लेषक फर्म का कहना है कि उन्होंने तकनीक की दीर्घकालिक क्षमता को लेकर अपनी बुनियादी धारणा नहीं बदली है, लेकिन जमीन पर कार्यान्वयन धीमा रहने के कारण वर्ष 2030 तक हासिल होने वाले परिणाम अब सरकारी आंकड़ों के काफी करीब दिखाई पड़ते हैं। परामर्शदाता कंपनी के प्रतिनिधियों ने रेखांकित किया कि नागरिक सेवाओं और सरकारी कार्यप्रणाली में ऊपरी स्तर से व्यवस्थित तकनीकी एकीकरण को बढ़ाकर ही इस गति में तेजी लाई जा सकती है, जिसके बाद के वर्षों में विकास दर में विस्तार की संभावना बनेगी। संस्था ने यह भी दोहराया कि गूगल के साथ उनका पेशेवर रिश्ता जारी है, लेकिन अध्ययन के निष्कर्ष और परिकल्पनाएं पूरी तरह उनके अपने स्वतंत्र निर्णय पर आधारित थीं।
नीतिगत प्रचार बनाम जमीनी हकीकत का टकराव
ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन के दौर से गुजरते हुए दो अलग-अलग प्रशासनों ने लगभग दो वर्षों तक गूगल द्वारा प्रायोजित इस चार सौ अरब पाउंड वाले आंकड़े को बार-बार प्रचारित किया। दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि मंत्रियों के पास नवंबर 2025 से ही कम लाभ वाला आंतरिक अनुमान उपलब्ध था, लेकिन इसके बावजूद कई विभागों ने पुराने आंकड़े का इस्तेमाल बंद नहीं किया। उदाहरण के तौर पर, व्यावसायिक प्रशिक्षण और अप्रेंटिसशिप की देखरेख करने वाली सरकारी संस्था स्किल्स इंग्लैंड आंतरिक रिपोर्ट मिलने के चार महीने बाद भी उसी पुराने चार सौ अरब पाउंड के दावे को प्रकाशित करती रही।
हाउस ऑफ कॉमन्स की विज्ञान, नवाचार और प्रौद्योगिकी समिति की प्रमुख और लेबर पार्टी की सांसद डेम ची ऑनवुराह ने कहा कि आधुनिक प्रणालियों के फायदों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से बदलाव की ठोस नीति को नुकसान पहुंचने का खतरा पैदा होता है। उनका मानना है कि सार्वजनिक सेवाओं को डिजिटल बनाने की राह में सबसे बड़ी बाधा तकनीकी अतिशयोक्ति और अत्यधिक प्रचार है। उनके मुताबिक, सरकारी तंत्र को हमेशा इस बात के प्रति यथार्थवादी रहना चाहिए कि यह तकनीक वास्तव में क्या बदलाव ला सकती है और संभावित वित्तीय बचतों के बारे में आम जनता के सामने पूर्ण पारदर्शिता बरती जानी चाहिए।
सार्वजनिक धन के उपयोग पर उठते गंभीर सवाल
कंजरवेटिव पार्टी के सांसद लॉर्ड होम्स ऑफ रिचमंड ने जनवरी 2025 में ही मंत्रियों से चार सौ अरब पाउंड के दावे के स्रोतों के बारे में औपचारिक स्पष्टीकरण मांगा था, लेकिन उस समय उन्हें कोई जवाब नहीं दिया गया था। उन्होंने टिप्पणी की कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार और कई अन्य संगठनों द्वारा लंबे समय तक इस्तेमाल किए जाने के बाद अब इस संख्या को संशोधित किया जा रहा है। उन्होंने जोर दिया कि सटीक आंकड़े इसलिए अनिवार्य हैं क्योंकि जनता के अरबों पाउंड के कर राजस्व को खर्च करने की पूरी दिशा इन्हीं अध्ययनों पर निर्भर करती है।
प्रौद्योगिकी क्षेत्र के पूर्व मंत्री पीटर काइल ने भी अपने कार्यकाल के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता के फायदे गिनाने के लिए इसी विशाल आंकड़े का व्यापक उपयोग किया था, जबकि सत्ता से बाहर बैठे कई सांसद लगातार इसके व्यावहारिक खतरों पर सवाल उठाते रहे। अदा लवलेस इंस्टीट्यूट की सुमेधा देशमुख ने इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा प्रायोजित अध्ययनों पर नीतिगत योजनाएं तैयार करने से पहले सरकार को डेटा का स्वतंत्र परीक्षण करना चाहिए। उनके अनुसार, तकनीक से जुड़े आर्थिक दावों को स्वीकार करने से पहले यह परखना जरूरी है कि वे संख्याएं कहां से आईं और उनका अंतिम व्यावसायिक लाभ किसे मिल रहा है। कैबिनेट कार्यालय और गूगल से इस पूरे विषय पर उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया है।



















