संयुक्त राज्य अमेरिका में संपन्न हुए मध्यावधि चुनावों ने देश के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह उलटकर रख दिया है। इन चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को गंभीर झटके का सामना करना पड़ा है, जबकि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट दोनों में महत्वपूर्ण बढ़त दर्ज की है। इस जनादेश का असर केवल सत्ता के संतुलन और विधायी नियंत्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यक्तिगत प्रभाव और उनकी चुनावी साख पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभालने के महज दो वर्षों के भीतर मतदाताओं के मिजाज में इतना तीखा बदलाव देखने को मिलेगा, इसका अनुमान राजनीतिक विश्लेषक नहीं लगा पाए थे। ट्रंप ने इस पूरे चुनाव प्रचार अभियान को अपनी निजी प्रतिष्ठा से जोड़ रखा था और देशभर में अपनी पसंद के उम्मीदवारों के लिए जमकर प्रचार किया था। इसके बावजूद कई प्रमुख और पारंपरिक रूप से मजबूत माने जाने वाले राज्यों में उनके पसंदीदा प्रत्याशियों को पराजय झेलनी पड़ी है।
गढ़ माने जाने वाले राज्यों में मतदाताओं ने नकारा
इस पूरे चुनावी घटनाक्रम में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए सबसे असहज स्थिति यह बनी कि जिन चेहरों को उन्होंने खुद चुना और आगे बढ़ाया, वे अपनी सीटें बचाने में विफल रहे। टेक्सास जैसे राज्य में, जिसे रिपब्लिकन राजनीति का बेहद मजबूत केंद्र माना जाता है, ट्रंप के समर्थन से मैदान में उतरे केन पैक्सटन को डेमोक्रेट प्रतिद्वंद्वी जेम्स तलारिको के हाथों हार का स्वाद चखना पड़ा। इसी तरह ओहायो राज्य में रिपब्लिकन सीनेटर जॉन हस्टेड को डेमोक्रेट उम्मीदवार शेरॉड ब्राउन ने शिकस्त दी। नॉर्थ कैरोलिना में भी मुकाबला कड़ा रहा, जहां ट्रंप समर्थित माइकल व्हाटली को पूर्व डेमोक्रेटिक गवर्नर रॉय कूपर के सामने पराजय का सामना करना पड़ा। कंसास के चुनाव में भी मतदाताओं ने बदलाव का संदेश दिया, जहां ट्रंप समर्थित सीनेटर रोजर मार्शल डेमोक्रेट एडम हैमिल्टन से अपनी सीट गंवा बैठे।
इन सभी नतीजों के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर साउथ कैरोलिना में देखने को मिला। साउथ कैरोलिना को लंबे समय से रिपब्लिकन पार्टी का अभेद्य किला माना जाता रहा है। इस सीट पर डेमोक्रेट प्रत्याशी एनी एंड्रयूज ने रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी डार्लिन ग्राहम को पराजित कर इतिहास रच दिया। इस राज्य में वर्ष 1998 के बाद से किसी भी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार ने सीनेट चुनाव में जीत दर्ज नहीं की थी। करीब ढाई दशक पुराने इस रिकॉर्ड का टूटना यह स्पष्ट संकेत देता है कि जिन क्षेत्रों को रिपब्लिकन पार्टी अपना सुरक्षित ठिकाना मानकर चल रही थी, वहां भी मतदाताओं ने सत्ता विरोधी लहर के तहत वोट किया है।
चुनावी मुकाबले को बनाया था निजी प्रतिष्ठा का सवाल
मध्यावधि चुनावों को आम तौर पर स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर लड़ा जाता है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने इस चुनाव को पूरी तरह अपने नाम और नीतियों के इर्द-गिर्द केंद्रित कर दिया था। उन्होंने अपने समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं से बार-बार यह आह्वान किया था कि वे इस मतदान को ठीक उसी तरह देखें जैसे कि स्वयं राष्ट्रपति पद का चुनाव हो रहा हो। इसी रणनीति के तहत उन्होंने विभिन्न राज्यों में ताबड़तोड़ रैलियां कीं, व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाए और माहौल को अपने पक्ष में मोड़ने की भरपूर कोशिश की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप इस बात से भली-भांति वाकिफ थे कि किसी भी राष्ट्रपति के कार्यकाल के मध्यावधि चुनाव में उनकी नीतियों की स्वीकार्यता का सीधा प्रभाव पार्टी के उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर पड़ता है।
जमीनी स्तर पर मतदाताओं के बीच गहरा असंतोष पहले से मौजूद था। आम जनता के बीच महंगाई, टैरिफ, ईरान युद्ध और घर खर्च की लगातार बढ़ती लागत जैसे मुद्दे प्रमुख चिंता का विषय बने हुए थे। डेमोक्रेटिक पार्टी ने रणनीति के तहत आम लोगों से जुड़ी इन आर्थिक और विदेश नीतिगत चिंताओं को ही अपने पूरे चुनावी प्रचार का मुख्य आधार बनाया, जिसका सीधा लाभ उन्हें मतदान केंद्रों पर मिला। जब चुनाव परिणाम सामने आ रहे थे, तब शुरुआत में ट्रंप ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया माध्यमों पर कोई त्वरित टिप्पणी नहीं की। बाद में उन्होंने ट्रुथ सोशल पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह खुद इस चुनाव में सीधे तौर पर प्रत्याशी नहीं थे, और यदि उनका नाम मतपत्र पर होता तो रिपब्लिकन पार्टी भारी मतों के अंतर से जीत हासिल करती। राजनीतिक प्रेक्षक उनके इस बयान को चुनावी पराजय की जवाबदेही से बचने के प्रयास के रूप में देख रहे हैं।
रिपब्लिकन पार्टी के आंतरिक समीकरणों में बदलाव की आहट
इस बड़े चुनावी झटके के बाद अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही पार्टी के भीतर निर्विवाद नेतृत्व और राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की होगी। अब तक रिपब्लिकन खेमे में उनके फैसलों, प्राथमिकताओं और उम्मीदवार चयन को बिना किसी बड़े प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया जाता था। पार्टी के अधिकांश नेता और पदाधिकारी सार्वजनिक मंचों पर उनका विरोध करने से बचते रहे थे। हालांकि, कई महत्वपूर्ण सीटों पर उनके खास उम्मीदवारों के धराशायी होने के बाद अब पार्टी के भीतर दबी जुबान से उठने वाले विरोध के स्वर मुखर हो सकते हैं, और उम्मीदवार चयन की उनकी क्षमता पर आंतरिक बहस तेज होना तय माना जा रहा है।
विधायी मोर्चे पर सीनेट में बहुमत खोना सिर्फ एक संख्यात्मक नुकसान नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी प्रशासनिक परिणाम होंगे। कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़त होने से उन्हें प्रमुख संसदीय समितियों का नेतृत्व और नियंत्रण हासिल हो जाएगा। इस शक्ति के दम पर डेमोक्रेट्स को प्रशासनिक फैसलों की गहन जांच करने, फाइलों की समीक्षा करने और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों को तलब कर उनसे सीधे सवाल पूछने का अधिकार मिल जाएगा। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति के मंत्रिमंडल में होने वाली नियुक्तियों और न्यायिक पदों पर जजों के मनोनयन की प्रक्रिया में भी सीनेट की मंजूरी अनिवार्य होती है। नई सीनेट संरचना के चलते राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अपनी प्राथमिकताओं वाले एजेंडे, विधायी प्रस्तावों और प्रशासनिक नियुक्तियों को बिना रुकावट पारित कराना बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।



















