दीपावली के आगमन के साथ ही बाजारों की रौनक चरम पर पहुंच जाती है और पूजन सामग्री की दुकानों पर खरीदारों की कतारें लगने लगती हैं। रोशनी और समृद्धि के इस पावन पर्व पर मां लक्ष्मी के पूजन के लिए चित्रों की मांग सबसे ज्यादा देखी जाती है। आधुनिक दौर में जहां छापेखाने और मशीनों से बने चमकीले पोस्टरों की भरमार है, वहीं राजस्थान के करौली में एक ऐसा परिवार आज भी मौजूद है जो रियासत काल के दौर से अपने हाथों के हुनर से इन धार्मिक चित्रों की रचना करता आ रहा है। प्राकृतिक और शुद्ध रंगों के अनूठे संयोजन से तैयार होने वाले इन पारंपरिक चित्रों का आकर्षण आज भी बना हुआ है। करौली की यह अनूठी सांस्कृतिक विरासत वोकल फॉर लोकल की एक जीवंत मिसाल पेश करती है, जिसके बनाए चित्रों को देश के कई कोनों तक भेजा जाता है।
पुश्तैनी परंपरा और आस्था का गहरा विश्वास
करौली की माटी में रची-बसी इस परंपरा को आज भी बुजुर्ग और कला पारखी लोग सबसे अधिक सम्मान देते हैं। स्थानीय मान्यता और आस्था इतनी गहरी है कि पूजा में इस हाथ से बने चित्र को स्थापित करना विशेष फलदायी माना जाता है। इस पारंपरिक कला को जीवित रखने वाले स्थानीय चित्रकार दिनेश कुमार शर्मा का कहना है कि इन हस्तनिर्मित चित्रों में साक्षात मां लक्ष्मी का वास माना जाता है। यही कारण है कि दीपावली पर पारंपरिक तौर-तरीकों से पूजा करने वाले परिवार आधुनिक प्रिंटेड पोस्टरों की जगह इन्हीं रेखाचित्रों को अपने घरों में स्थापित करना प्राथमिकता मानते हैं।
पीढ़ियों की धरोहर को संभालने वाले अकेले शिल्पी
करौली शहर में लक्ष्मी पूजन के लिए इन विशिष्ट हस्तनिर्मित चित्रों का निर्माण केवल स्थानीय चतेरा परिवार द्वारा ही किया जाता रहा है। इस परिवार की कई पीढ़ियां इसी साधना में समर्पित रही हैं और उन्होंने इस हुनर को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सौंपा। वर्तमान समय में इस परिवार के सदस्य दिनेश कुमार शर्मा पूरी निष्ठा के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। वे इस पुश्तैनी कला को थामे रखने वाले परिवार के अंतिम कलाकार हैं। यह खास कला शैली सिर्फ करौली में ही देखने को मिलती है। त्योहार के समय इन चित्रों की बहुत भारी मांग रहती है, लेकिन निर्माण प्रक्रिया में लगने वाली कठिन शारीरिक मेहनत और समय की वजह से इनका उत्पादन बहुत सीमित मात्रा में ही हो पाता है।
दो माह की अनवरत साधना और सीमित उत्पादन
चित्रकार दिनेश शर्मा के अनुसार, इन चित्रों को तैयार करने में अत्यधिक बारीकी और धैर्य की आवश्यकता होती है। दीपावली पर्व आने से लगभग दो महीने पहले ही वे इन चित्रों को बनाने का काम शुरू कर देते हैं। हर चित्र पर रंगों का लेप, रेखाओं का खिंचाव और आकृतियों को संवारना पूरी तरह हाथों से ही किया जाता है। दिन-रात की कड़ी मेहनत के बाद भी दो महीनों में बमुश्किल 200 चित्र ही बनकर तैयार हो पाते हैं। बाजार में आजकल सस्ते और चमकीले रेडीमेड चित्रों का बोलबाला जरूर बढ़ा है, जिसके चलते मांग में कुछ उतार-चढ़ाव आया, लेकिन पुराने जानकार आज भी करौली पहुंचकर केवल इन्हीं चित्रों की तलाश करते हैं। करौली शहर के निवासियों के अलावा आसपास के ग्रामीण अंचलों और अन्य क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग इन चित्रों को खरीदने आते हैं।
लागत, मूल्य और हस्तकला के प्रति लौटता रुझान
पूर्णतः हाथ से बने होने और काफी समय लगने के कारण ये चित्र सामान्य बाजार में बिकने वाले मशीनी पोस्टरों से थोड़े महंगे पड़ते हैं। यही वजह है कि इन्हें खरीदने वाला एक सीमित और खास वर्ग ही है जो कला के महत्व को समझता है। वर्तमान में इन हस्तनिर्मित चित्रों की कीमत बाजार में लगभग 50 से 60 रुपये के आसपास रखी गई है। चित्रकार दिनेश शर्मा बताते हैं कि मशीनी चित्रों की व्यापक उपलब्धता के बावजूद बीते कुछ वर्षों में पारंपरिक हस्तशिल्प के प्रति लोगों की रुचि फिर से बढ़ने लगी है। इसी बढ़ते रुझान का प्रमाण है कि पहले जहां वे साल भर में करीब 100 चित्र तैयार कर पाते थे, वहीं अब खरीदारों के उत्साह को देखते हुए लगभग 200 चित्रों का निर्माण कर रहे हैं।


















