पारंपरिक देहाती मटन की पहचान सिर्फ इसके चटपटे मसालों से नहीं होती, बल्कि इसे पकाने का पुराना देहाती सलीका इसे दूसरी करी से पूरी तरह जुदा बना देता है। जब भारी पेंदे वाली लोहे की कड़ाही में धीमी आंच पर मटन को लगातार भूना जाता है, तो मसालों और तेल का मेल गोश्त को एक गहरा, चमकदार रंग और लाजवाब सोंधापन देता है। इस जायके को अपनी रसोई में उतारने के लिए किसी जटिल तकनीक की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि यहां सबसे बड़ा हुनर बावर्ची का सब्र होता है। अगर आंच की तेजी पर काबू रखा जाए और हर मसाले को उसका पूरा वक्त दिया जाए, तो तैयार होने वाला सालन ढाबों और देहाती दावतों की याद ताजा कर देता है।
देहाती मटन के लिए जरूरी सामग्री और मात्रा
इस खास डिश को तैयार करने के लिए सामग्री का सही अनुपात बनाए रखना बेहद जरूरी है। इसके लिए 1 किलो ताजा मटन, आधा किलो बारीक कटा प्याज, 250 ग्राम शुद्ध सरसों का तेल, 150 ग्राम अदरक का पेस्ट और 200 ग्राम लहसुन का पेस्ट चाहिए। इसके साथ ही कुछ हरी मिर्च, साबुत तेजपत्ता, दरदरी पिसी काली मिर्च की गुंडी, तीखी लाल मिर्च की गुंडी, हल्दी पाउडर, स्वाद के हिसाब से सादा नमक, शुद्ध देसी घी और खुशबूदार गरम मसाला निकाल कर रख लें। सरसों का तेल अगर घर का पेरा हुआ मिल जाए तो यह मटन के स्वाद को और भी निखार देता है।
कड़ाही की तैयारी और मटन की शुरुआती भुनाई
पकाने की शुरुआत के लिए सबसे पहले एक साफ लोहे की कड़ाही को चूल्हे या गैस पर रखकर अच्छी तरह गर्म करें। कड़ाही तप जाने के बाद उसमें 250 ग्राम सरसों का तेल डालें। जब तेल से धुआं उठने लगे और वह पूरी तरह पक जाए, तब उसमें हल्का सा हींग का पानी छिड़क दें। ऐसा करने से सरसों के कच्चे तेल का तीखापन और तीखी गंध शांत हो जाती है। अब यहां आम तरीकों से हटकर एक खास कदम उठाना होता है। तेल में पहले प्याज डालने के बजाय सीधे धुला हुआ मटन डाला जाता है। कड़छी से लगातार चलाते हुए मटन को करीब 10 से 20 मिनट तक तेज से मध्यम आंच पर अच्छी तरह भूनें। इसके बाद इसमें हल्दी पाउडर मिलाएं और अगले 20 मिनट तक गोश्त को भूनते रहें ताकि हल्दी का कच्चापन मिट जाए और मांस पर सुनहरा रंग चढ़ने लगे।
प्याज, देसी घी और पिसे मसालों का मिलान
भुनाई के दौरान कड़ाही को बीच-बीच में ढक्कन से ढका जा सकता है, मगर ढक्कन हटाकर मटन को लगातार चलाना सबसे जरूरी है ताकि गोश्त कड़ाही के तलवे में चिपके नहीं। जब हल्दी अच्छी तरह रच जाए, तब इसमें आधा किलो कटा हुआ प्याज डालें। प्याज डालकर मटन को लगभग 10 मिनट तक भूनें। जैसे ही प्याज हल्का गलने लगे और गोश्त अपना प्राकृतिक पानी छोड़ने लगे, उसी वक्त इसमें शुद्ध देसी घी डाल दें। घी पड़ते ही कड़ाही से उठने वाली महक बदल जाती है और मटन के रेशों में चिकनाई समा जाती है। घी डालने के बाद मिश्रण को 20 मिनट तक और भूनें ताकि घी और मांस का अर्क आपस में घुल-मिल जाएं। इसके बाद 200 ग्राम लहसुन और 150 ग्राम अदरक का पेस्ट डालकर 15 से 20 मिनट तक चलाते हुए पकाएं। जब अदरक-लहसुन का पानी सूख जाए, तब स्वाद के अनुसार लाल मिर्च पाउडर मिलाएं और फिर से 15 से 20 मिनट तक धीमी आंच पर भुनाई जारी रखें।
पानी का संतुलन और धीमी आंच पर अंतिम पकवान
इस पूरे दौर में कड़ाही के भीतर आंच के मिजाज और मांस की रंगत पर पैनी नजर रखना जरूरी है ताकि सूखे मसाले जलने न पाएं। जब गोश्त गलने की दिशा में बढ़ने लगे और मसाले गहरा तेल छोड़ने लगें, तब काली मिर्च की गुंडी को थोड़े से पानी में घोलकर कड़ाही में डालें। इस घोल को मटन के साथ 15 से 20 मिनट तक चलाते हुए पकाएं। इसके बाद स्वाद के मुताबिक नमक डालें और पूरे मसाले को अच्छी तरह मिला लें। अब तरी और मांस को पूरी तरह नरम करने के लिए जरूरत के अनुसार गुनगुना पानी डालें और ढक्कन लगाकर धीमी आंच पर पकने दें। बीच-बीच में कड़ाही खोलकर चलाते रहें ताकि मटन नीचे न लगे। जब गोश्त पूरी तरह गलकर हड्डियों से अलग होने लगे, तब ऊपर से पिसा हुआ गरम मसाला छिड़कें, अच्छी तरह मिलाएं और कड़ाही को आंच से नीचे उतार लें।
परोसने का तरीका और देवघर का देहाती जायका
लोहे की कड़ाही में तैयार हुए इस देहाती मटन की खासियत इसका गहरा गाढ़ा रंग, मसालों की सोंधी खुशबू और धीमी भुनाई से पैदा हुआ गाढ़ापन है। इसे गर्मागर्म उबले चावल या तवा रोटी के साथ परोसा जाए तो इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। हालांकि इसे शुरू से अंत तक बनाने में करीब ढाई घंटे का वक्त जरूर लगता है, लेकिन थाली में परोसने के बाद हर निवाले में वह मेहनत पूरी तरह सार्थक महसूस होती है। जब भी घर में कोई पर्व-त्योहार हो या छुट्टी के दिन परिवार के साथ कुछ खास खाने की ख्वाहिश हो, तो देवघर की इस पारंपरिक देहाती शैली में मटन बनाकर जरूर चखें।



















