जानलेवा बीमारी एचआईवी के संक्रमण की रोकथाम के लिए दुनिया भर में चल रहे प्रयासों को एक बड़ी रणनीतिक कामयाबी मिली है। अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (US FDA) ने पूरे साल में केवल दो बार दिए जाने वाले एचआईवी प्रिवेंशन इंजेक्शन के सस्ते भारतीय जेनेरिक प्रारूप को अपनी विनियामक स्वीकृति प्रदान कर दी है। लेनाकापाविर नाम का यह इंजेक्शन अब तक अत्यधिक महंगा होने के कारण दुनिया के कई जरूरतमंद इलाकों में आम लोगों की आर्थिक पहुंच से बाहर था। इस भारतीय जेनेरिक विकल्प के बाजार में आने के बाद वैश्विक स्वास्थ्य परिदृश्य पर व्यापक असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
120 विकासशील देशों में बेहद कम खर्च पर पहुंचेगी दवा
इस जेनेरिक संस्करण के तैयार हो जाने से दुनिया के 120 निम्न और मध्यम आय वाले देशों के नागरिकों तक यह आधुनिक चिकित्सीय सुरक्षा तेजी से पहुंचाई जा सकेगी। दवा निर्माता और इसके विकास कार्यक्रम को गति देने वाले अंतरराष्ट्रीय सहयोगी संगठनों ने 2 नवंबर को इस प्रगति की आधिकारिक घोषणा की। सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठनों का मानना है कि एड्स के प्रसार को थामने की दिशा में यह एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है, क्योंकि सीमित संसाधनों वाले देशों में महंगी पेटेंटेड दवाएं पहुंचाना हमेशा से एक बड़ी प्रशासनिक व वित्तीय चुनौती रहा है।
वैश्विक साझेदारों और भारतीय कंपनी का साझा प्रयास
इस किफायती जेनेरिक इंजेक्शन का विकास भारत की फार्मास्यूटिकल कंपनी डॉ. रेड्डीज़ लैबोरेटरीज ने किया है। यह संपूर्ण परियोजना युनिटएड, क्लिंटन हेल्थ एक्सेस इनिशिएटिव और अफ्रीका के स्वास्थ्य अनुसंधान संगठन विट्स आरएचआई के मध्य हुए एक औपचारिक समझौते के अंतर्गत संचालित की गई। इस अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ का केंद्रीय लक्ष्य लेनाकापाविर के तकनीकी विकास चक्र को तेज करना और गरीब देशों के लिए इसे बेहद सुलभ दरों पर उपलब्ध कराना था।
सालाना 40 डॉलर खर्च और दैनिक गोलियों से बेहतर सुरक्षा
वितरण के लिए चिह्नित देशों में इस इंजेक्शन के इस्तेमाल पर प्रति मरीज सालाना लगभग 40 अमेरिकी डॉलर का खर्च आने का अनुमान लगाया गया है। यह लागत मरीज द्वारा प्रतिदिन खाई जाने वाली पारंपरिक गोलियों के मौजूदा वार्षिक खर्च के लगभग बराबर ही बैठती है। लागत समान होने के बावजूद साल में केवल दो बार लगने के कारण यह इंजेक्शन मरीजों के लिए गोलियों की तुलना में कहीं अधिक सुविधाजनक और व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत करता है। अत्यधिक जोखिम वाले समूहों पर किए गए दो व्यापक अध्ययनों के परिणाम दर्शाते हैं कि इस इंजेक्शन ने नए संक्रमणों के मामलों को लगभग शून्य के स्तर तक पहुंचा दिया।
यूनिटएड में एचआईवी मामलों की प्रमुख कारमेन पेरेज कासास ने स्पष्ट किया कि दैनिक गोलियों के नियम का पालन करना हर व्यक्ति के लिए हमेशा संभव नहीं हो पाता, और यदि कोई व्यक्ति नियमित दवा नहीं लेता तो वह संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह सकता। कासास ने रेखांकित किया कि लेनाकापाविर की प्रभावशीलता और निरंतरता को लेकर व्यापक उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष संपूर्ण विश्व में 4.1 करोड़ लोग एचआईवी संक्रमण के साथ जीवन यापन कर रहे थे और इस बीमारी के चलते 570,000 मरीजों की मृत्यु दर्ज की गई थी।



















