अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महाशक्तियों के बीच गहराते तनाव के साए में अमेरिकी रक्षा हलकों ने अपनी पुरानी युद्धक प्राथमिकताओं को पूरी तरह बदलना शुरू कर दिया है। पिछले कई दशकों तक आतंकवाद विरोधी सीमित अभियानों में उलझे रहने के बाद अब सेना बड़े पैमाने के पारंपरिक सैन्य संघर्ष के गंभीर परिदृश्यों पर काम कर रही है। इसी कड़ी में कोर सस्टेनमेंट कमांड और इंजीनियरिंग विंग ने एक विशेष अभ्यास को अंजाम दिया है, जिसमें भारी मशीनों के जरिए युद्धक्षेत्र में सामूहिक अस्थायी समाधि स्थल बनाने की प्रक्रिया परखी गई। पिछले सत्तर सालों में ऐसा पहली बार देखा जा रहा है जब इतने व्यापक स्तर पर शव प्रबंधन और ट्रेंच खुदाई का अभ्यास अनिवार्य तौर पर शामिल किया गया हो।
कोरियाई संघर्ष के सात दशक बाद बदली रणनीति
द्वितीय विश्व युद्ध और कोरियाई युद्ध के दौरान सैन्य हताहतों की संख्या अत्यंत भयानक स्तर पर पहुंच गई थी। उस दौर के बाद इराक और अफगानिस्तान जैसे अभियानों में अमेरिकी सैनिकों की शहादत का आंकड़ा तुलनात्मक रूप से सीमित रहा। उन अभियानों में लॉजिस्टिक्स नेटवर्क इतना सुगम था कि मारे गए जवानों के पार्थिव शरीर को विशेष सैन्य विमानों के माध्यम से तुरंत उनके गृह नगरों तक पहुंचाया जा सकता था। हालांकि आज की भू-राजनीतिक परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। अगर चीन, रूस या ईरान जैसी सैन्य शक्तियों से सीधा टकराव होता है, तो जंग के शुरुआती घंटों में ही हजारों सैनिकों के हताहत होने का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे गंभीर हालात में हवाई सीमाएं बंद हो सकती हैं और तत्काल एयरलिफ्ट सेवा संभव नहीं रह जाएगी।
हर घंटे सौ शवों के हिसाब से अस्थायी ट्रेंच तैयार करने की क्षमता
हालिया अभ्यास में इंजीनियरिंग ब्रिगेड ने आधुनिक बुलडोजरों और भारी उत्खनन यंत्रों का इस्तेमाल किया। इस ड्रिल को यथार्थवादी बनाने के लिए मॉक कंकालों तथा पानी से लदे भारी बक्सों का प्रयोग किया गया। इंजीनियरिंग दलों ने लंबी-लंबी खाइयां खोदकर यह साबित किया कि यदि एक पूरी यूनिट लगातार चौबीस घंटे सक्रिय रहे, तो वह 2,400 सैनिकों के लिए सुरक्षित और व्यवस्थित अस्थायी कब्रें बना सकती है। इसका गणितीय औसत देखा जाए तो यह प्रति घंटा सौ शवों को सम्मानजनक और स्वास्थ्य मानकों के अनुसार भूमिगत करने के बराबर है। इसके अलावा दो दशकों से ज्यादा समय बाद सैन्य पादरियों को भी इस अभ्यास से जोड़ा गया, ताकि जंग के मैदान में बिना किसी विलंब के धार्मिक विधियों से भूमि का संस्कार किया जा सके।
सैन्य गाइडलाइन और फासले के नियमों में जरूरी फेरबदल
इस अभ्यास के दौरान पुराने सैन्य मैन्युअल की कई व्यावहारिक खामियां भी खुलकर सामने आईं। पेंटागन के पुराने नियमों में कब्रों की कतारों के बीच केवल 7 फीट का अंतर रखने का निर्देश दर्ज था। जब आधुनिक बुलडोजर और हैवी अर्थमूविंग मशीनें मैदान में उतरीं, तो यह जगह मशीनों के सुगम संचालन के लिए बहुत तंग साबित हुई। इस अनुभव के बाद रक्षा विभाग अपनी तकनीकी नियमावली को संशोधित कर रहा है ताकि भविष्य में भारी उपकरणों की आवाजाही बाधित न हो।
सार्जेंट फर्स्ट क्लास डेलबर्ट रुएडे के अनुसार, इस पूर्व अभ्यास के बिना कल युद्ध के मैदान में केवल अंधेरे में हाथ-पांव मारने जैसी स्थिति बनती।
महामारी की रोकथाम और पार्थिव देह की पहचान का चक्र
युद्धक्षेत्र में शवों को खुला छोड़ना गंभीर स्वास्थ्य संकट और संक्रामक बीमारियों का सबब बन सकता है। सेना की नई कार्यप्रणाली का मुख्य उद्देश्य हर जवान की सटीक बायोमेट्रिक और पहचान प्रविष्टियां दर्ज करके उन्हें सुरक्षित रूप से अस्थायी कब्रों में रखना है। जंग समाप्त होने पर इन शरीरों को ससम्मान निकालकर औपचारिक रीति-रिवाजों के साथ परिजनों को सौंपा जाएगा। इसके समानांतर 2027 में एक अगला चरण भी निर्धारित किया गया है, जिसके तहत अग्रिम मोर्चों पर विशेष मेडिकल ढांचा और अस्थायी शवगृह तैयार करने की तकनीक का परीक्षण होगा। यह संपूर्ण कदम संकेत देता है कि रक्षा रणनीतिकार अब छिटपुट उग्रवाद के बजाय सीधे और विनाशकारी वैश्विक युद्धों की संभावनाओं से निपटने की तैयारी में हैं।



















