राजधानी के रामलीला मैदान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के विरोध में विपक्षी गठबंधन के विशाल जुटान के बाद सियासी पारा पूरी तरह चढ़ चुका है. इस बड़े शक्ति प्रदर्शन में उमड़े जनसमूह के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सत्तापक्ष पर सीधा राजनीतिक हमला बोला है. सिब्बल ने न केवल चुनावी तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए, बल्कि हाल के दिनों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान उपजे हालातों और राजनीतिक फंडिंग के पूरे ढांचे को कठघरे में खड़ा किया है.
रामलीला मैदान का नजारा और सिब्बल का प्रत्यक्ष अनुभव
सिब्बल ने बताया कि मैदान और उसके आसपास उमड़े विशाल जनसमूह को उन्होंने स्वयं देखा, क्योंकि वे खुद बस के जरिए वहां पहुंचे थे. इलाके में इतनी व्यापक संख्या में लोग जमा थे कि रामलीला मैदान तक पहुंचने में उन्हें तकरीबन एक से डेढ़ घंटे का वक्त लग गया. जब वे आयोजन स्थल पर पहुंचे, तो चारों तरफ सुरक्षा बैरिकेड्स लगे हुए थे और मैदान का हर एक कोना खचाखच भरा हुआ था.
सिब्बल के आकलन के अनुसार, लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के आह्वान पर लगभग 5 से 6 लाख नागरिक वहां पहुंचे थे. उन्होंने विशेष तौर पर रेखांकित किया कि इतने विशाल जुटान के बावजूद यह पूरा आयोजन असाधारण रूप से शांतिपूर्ण रहा. इतने बड़े पैमाने पर लोग इकट्ठा होने पर भी कहीं से किसी भी तरह की अप्रिय घटना, उपद्रव या अव्यवस्था की कोई खबर सामने नहीं आई, जो नागरिकों के लोकतांत्रिक अनुशासन को दर्शाती है.
विरोधियों के अभियानों पर तंज और जंतर-मंतर की घटनाओं पर सवाल
सत्तारूढ़ दल द्वारा चलाए गए जवाबी कार्यक्रमों पर कटाक्ष करते हुए सिब्बल ने दोनों आयोजनों के आकार की तुलना की. उन्होंने कहा कि एक तरफ जहां रामलीला मैदान में लाखों साधारण नागरिक अपने अधिकारों के लिए एकत्र थे, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष महज 100 से 200 समर्थकों की मौजूदगी के साथ अपनी 'लोकतंत्र बचाओ' पदयात्रा निकालने पहुंचे थे. इस भारी अंतर का उल्लेख करते हुए उन्होंने जनता के वास्तविक समर्थन का दावा किया.
इसके साथ ही सिब्बल ने जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए युवा आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा का मुद्दा प्रमुखता से उठाया. उन्होंने तर्क दिया कि जब 5 से 6 लाख की भारी भीड़ बिना किसी गड़बड़ी के शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठा सकती है, तो जंतर-मंतर पर पहली बार उतरे युवाओं के प्रदर्शन में अचानक अशांति कैसे फैल गई. सिब्बल ने सीधा आरोप लगाया कि वह हिंसा प्रायोजित थी ताकि युवाओं के वैध आक्रोश को बदनाम किया जा सके. उनके अनुसार, माहौल खराब करके उसका दोष बेकसूर युवाओं पर मढ़ना एक पुरानी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहा है.
शांतिपूर्ण जनआंदोलनों का ऐतिहासिक संदर्भ
भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा का हवाला देते हुए सिब्बल ने कहा कि देश का इतिहास कभी भी फ्रांस, स्पेन या अल्बानिया जैसे हिंसक संघर्षों जैसा नहीं रहा है. भारत की जमीन हमेशा से अहिंसक और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों की गवाह रही है. उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्षी मोर्चे का यह लोकतांत्रिक संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक गठबंधन अपने बुनियादी राजनीतिक और संवैधानिक लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर लेता.
2017 से चुनावी फंडिंग और 'वोट चोरी' का पूरा घटनाक्रम
चुनावी व्यवस्था और चंदे की निष्पक्षता पर विस्तृत चर्चा करते हुए सिब्बल ने सिलसिलेवार ढंग से अपनी बात रखी. उन्होंने दावा किया कि चुनावी प्रक्रिया में असमानता और जनादेश की कथित चोरी की असल शुरुआत साल 2017 में हुई थी. सिब्बल के अनुसार, उस दौरान वित्त कानून में संशोधन करके कॉरपोरेट जगत और कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को असीमित चंदा देने का कानूनी रास्ता खोल दिया गया था, जिससे वित्तीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया.
इसके बाद के घटनाक्रम को जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि साल 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड योजना लागू की गई. इस योजना के जरिए अकेले बीजेपी के खाते में 6,000 करोड़ रुपये से अधिक की भारी धनराशि पहुंची. सिब्बल का तर्क है कि धनबल के इस असीमित और एकतरफा प्रवाह ने लोकतांत्रिक चुनावों में बराबरी के अवसर को खत्म कर दिया, जिसे उन्होंने वोट और जनादेश की निष्पक्षता पर सबसे बड़ा आघात करार दिया. उनके इस विस्तृत बयान से साफ है कि आने वाले समय में चुनावी सुधार, फंडिंग और प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक व कानूनी जंग और तेज होने वाली है.
























