पूर्वोत्तर के राज्यों से हाथियों को दूर-दराज के इलाकों में भेजे जाने के मामले पर पशु कल्याण से जुड़े कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार के सामने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनिमल राइट्स ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पूर्वोत्तर से हाथियों के स्थानांतरण पर तत्काल रोक लगाने की अपील की है। संस्था का कहना है कि इन हाथियों की उत्पत्ति, उनके मालिकाना हक और स्थानांतरण से जुड़े वित्तीय लेन-देन की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए।
तमिलनाडु भेजे गए पांच युवा हाथी, छह अन्य की तैयारी
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को सोमवार को भेजे एक पत्र में संस्था के संस्थापक आलोक हिसारवाला गुप्ता ने बताया कि पांच युवा हाथियों, दुर्गा, रूपसिंग, शिव, हीरालाल और बिजली को पूर्वोत्तर से 2,500 किलोमीटर से अधिक दूर तमिलनाडु ले जाया जा चुका है। इसके साथ ही संस्था ने 1 अक्टूबर को 55 पशु संरक्षण और वन्यजीव संगठनों की ओर से की गई एक संयुक्त अपील का भी हवाला दिया। उस अपील में दावा किया गया था कि छह और हाथियों को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया चल रही है।
कानूनी सुरक्षा और नियमों की अनदेखी का आरोप
संस्था ने हाथियों के निजी स्वामित्व में जाने की कानूनी वैधता और सत्यापन प्रक्रिया पर गहरी चिंता व्यक्त की है। पत्र में इस बात को रेखांकित किया गया कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत हाथियों को अनुसूची I (शेड्यूल I) का सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है। वहीं दूसरी ओर कैप्टिव एलिफेंट (ट्रांसफर या ट्रांसपोर्ट) रूल्स, 2024 के तहत उनके स्थानांतरण के लिए बेहद कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं। संगठन के अनुसार, 2024 के नियमों का नियम 7(1) यह स्पष्ट करता है कि केवल उन्हीं हाथियों का स्थानांतरण किया जा सकता है जिनके मालिकाना प्रमाण पत्र 14 मार्च 2024 से पहले के बने हों। इसके अलावा नियम 7(3) के अनुसार किसी भी स्थानांतरण से पहले हाथियों का जेनेटिक प्रोफाइल केंद्रीय मंत्रालय के डेटाबेस में दर्ज होना अनिवार्य है। गुप्ता ने अपने पत्र में कहा कि इन सुरक्षा उपायों का मकसद जंगली हाथियों को पकड़कर निजी हाथों में सौंपने पर रोक लगाना था, लेकिन जमीनी स्तर पर ये उपाय निष्फल साबित हो रहे हैं।
डेटाबेस के आंकड़ों से उठे सवाल
संगठन ने फरवरी 2026 में आयोजित कैप्टिव एलिफेंट हेल्थकेयर एंड वेलफेयर कमेटी की बैठक में पेश किए गए आंकड़ों का भी उल्लेख किया। इन आंकड़ों के अनुसार, कुल 2,075 हाथियों के किए गए प्रोफाइलिंग में से 40.5 फीसदी हाथियों की उत्पत्ति अज्ञात पाई गई। वहीं 34.1 फीसदी को बंधक स्थिति में जन्मा दर्ज किया गया और 25.4 फीसदी हाथियों को जंगलों से पकड़ा हुआ पाया गया। इन आंकड़ों पर बात करते हुए गुप्ता ने कहा कि प्रोफाइल किए गए लगभग हर तीन में से दो हाथियों के मामले में वैध रूप से बंधक स्थिति में जन्म साबित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इससे इस बात की पुष्टि होती है कि कड़े वैधानिक नियमों के बावजूद जंगलों से पकड़े गए युवा हाथियों को बंधक बनाकर निजी स्वामित्व में धकेला जा रहा है।
उपहार के नाम पर व्यावसायिक लेन-देन का संदेह
संस्था ने यह गंभीर आरोप भी लगाया है कि हाथियों के कुछ स्थानांतरण असल में उपहार का रूप देकर किए गए व्यावसायिक सौदे हो सकते हैं। इस सिलसिले में गौहाटी उच्च न्यायालय की 2021 की एक कार्यवाही का हवाला दिया गया, जिसमें दो हाथियों के लिए पैसे के लेन-देन से जुड़े आरोपों का रिकॉर्ड दर्ज था। इसके अलावा 2019 में तिरुवन्नामलाई के एक मंदिर के लिए दानदाताओं के सहयोग से हाथी की खरीद के प्रस्ताव और 2025 में जोयमोती नामक हाथी की कथित खरीद और पुनर्विक्रय से जुड़ी रिपोर्टों का भी जिक्र किया गया।
स्वतंत्र जांच और पांच साल की चरणबद्ध योजना की मांग
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनिमल राइट्स ने पहले भेजे जा चुके पांच हाथियों और प्रस्तावित छह अन्य हाथियों के स्थानांतरण के पूरे मामले की समयबद्ध स्वतंत्र जांच कराने का आग्रह किया है। इसमें हाथियों के जन्म और हिरासत के रिकॉर्ड, मालिकाना हक के दस्तावेज, जेनेटिक रिकॉर्ड, वित्तीय लेन-देन और स्थानांतरण के आधार की पड़ताल शामिल होनी चाहिए। संगठन ने मांग की कि सभी संबंधित आवेदन, निरीक्षण रिपोर्ट और फैसलों को सार्वजनिक किया जाए, साथ ही हाथियों की खरीद और स्थानांतरण पर वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो की अगस्त 2024 की जांच रिपोर्ट और उस पर हुई कार्रवाई का भी खुलासा किया जाए। इसके साथ ही धार्मिक संस्थानों, वन विभागों, पशु कल्याण संगठनों, पशु चिकित्सकों और महावतों के साथ एक राष्ट्रीय स्तर के विचार-विमर्श का प्रस्ताव रखा गया, ताकि आगे हाथियों के अधिग्रहण पर रोक लगाने और अगले पांच वर्षों में मंदिरों में हाथियों के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने पर सहमति बन सके। संगठन ने यह भी सुझाव दिया कि इस पूरी योजना में मौजूदा बंधक हाथियों की आजीवन देखभाल और सेवानिवृत्ति के साथ-साथ महावतों की आजीविका के लिए वित्तीय सहायता का प्रावधान होना चाहिए।



















