भारतीय मिड-साइज एसयूवी बाजार में पारंपरिक गियरबॉक्स की लोकप्रियता अभी भी कम नहीं हुई है। ट्रैफिक की समस्याओं के बढ़ने और बाजार में तमाम ऑटोमैटिक वेरिएंट्स की उपलब्धता के बावजूद अधिकांश ग्राहक थ्री-पेडल सिस्टम वाली गाड़ियां खरीदना ही पसंद कर रहे हैं। ऑटोमोटिव बाजार के आंकड़ों से यह बात सामने आई है कि साल 2026 की पहली छमाही के दौरान इस सेगमेंट की कुल बिक्री में मैनुअल गियरबॉक्स वाली कारों की हिस्सेदारी 71.4 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि ऑटोमैटिक वेरिएंट्स का आंकड़ा मात्र 28.6 प्रतिशत पर ही सिमट कर रह गया है।
कीमत का अंतर और बजट की सीमा
इस प्राथमिक पसंद के पीछे सबसे बड़ी वजह पेट्रोल मैनुअल और पेट्रोल ऑटोमैटिक मॉडल्स के बीच मिलने वाला वित्तीय अंतर है। दोनों ट्रांसमिशन विकल्पों के दामों में औसतन डेढ़ लाख रुपये का बड़ा फर्क देखने को मिलता है। इस सेगमेंट में वाहन खरीदने वाले अधिकांश ग्राहक पहले से ही अपने वित्तीय संसाधनों के अंतिम छोर पर खड़े होते हैं और सीमित बजट के साथ बाजार में उतरते हैं। ऐसे हालात में खरीदार इस अतिरिक्त खर्च को उठाने से बचते हैं, क्योंकि वे समझदारी इसी में देखते हैं कि पैसे बचाए जाएं।
जब कोई ग्राहक बैंक से लोन लेकर वाहन खरीदता है, तो ऑटोमैटिक वेरिएंट के कारण आने वाला अतिरिक्त वित्तीय बोझ उसकी मासिक ईएमआई को भी बढ़ा देता है। इसके अलावा खरीदार के सामने यह असमंजस भी रहता है कि वे इस अतिरिक्त राशि को गियरबॉक्स पर खर्च करें या फिर किसी उच्च वेरिएंट के बेहतर फीचर्स और अलग पावरट्रेन विकल्प पर लगाएं।
सुविधा पर भारी पड़ता है खर्च
शहरी इलाकों में लगातार बढ़ रहा यातायात और भारी जाम आमतौर पर ऑटोमैटिक कारों की मांग को बढ़ावा देने वाला कारक माना जाता है। बार-बार क्लच दबाने की झंझट से मुक्ति मिलने के कारण ड्राइंग कम थकान भरी होती है। हालांकि, आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि केवल ड्राइविंग की यह सुविधा कीमत के इस भारी अंतर को पाटने में नाकाम साबित हो रही है।
तमाम वाहन चालक लंबे समय से मैनुअल गाड़ियां चलाने के आदी हैं और उन्हें इसमें किसी बड़े बदलाव की आवश्यकता महसूस नहीं होती। विशेष तौर पर छोटे शहरों और कस्बों में मैनुअल मॉडल आज भी अधिक सरल और मेंटेनेंस के लिहाज से सस्ते माने जाते हैं।
ट्रांसमिशन विकल्पों की विविधता
ऑटोमैटिक सेगमेंट के भीतर भी कई तरह की तकनीकें मौजूद हैं, जो ग्राहकों के फैसले को प्रभावित करती हैं। एएमटी यानी ऑटोमेटेड मैनुअल ट्रांसमिशन तुलनात्मक रूप से सस्ती होती है और कीमत के गैप को थोड़ा कम कर सकती है। इसके विपरीत सीवीटी, टॉर्क कन्वर्टर और ड्यूल-क्लच जैसे एडवांस्ड ट्रांसमिशन सिस्टम काफी महंगे साबित होते हैं, जो बजट को और ज्यादा प्रभावित करते हैं।
भविष्य का रुख और पावरट्रेन के आंकड़े
आने वाले समय में बाजार की तस्वीर बदलने की उम्मीद जताई जा रही है। क्रिसिल के सीनियर प्रैक्टिस लीडर हेमल एन ठक्कर का मानना है कि वाहन बाजार में तेजी से बदलाव आ रहा है और वर्ष 2030 तक एसयूवी वाहनों में ऑटोमैटिक गियरबॉक्स की हिस्सेदारी पचास प्रतिशत के आंकड़े को पार कर सकती है। वहीं, अगर पावरट्रेन के इस्तेमाल की बात की जाए, तो साल 2026 की पहली छमाही के दौरान पेट्रोल इंजन की हिस्सेदारी 50.8 प्रतिशत, डीजल की 31.3 प्रतिशत, सीएनजी की 10.8 प्रतिशत और इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 7.1 प्रतिशत दर्ज की गई है।



















