इलेक्ट्रिक वाहनों की तेजी से बढ़ती मांग के बीच उनकी बैटरी की क्षमता और लाइफस्पैन को बनाए रखना वाहन निर्माताओं और उपयोगकर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। शहरों के भीड़भाड़ वाले ट्रैफिक में इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लगातार रुकना, तेजी से गति बढ़ाना और अचानक ब्रेक लगाना पड़ता है। इस प्रकार की ड्राइविंग शैली से वाहन की बैटरी पर अचानक अत्यधिक इलेक्ट्रिकल और थर्मल दबाव पड़ता है, जिससे सेल्स का क्षय तेजी से होता है। इस गंभीर समस्या के समाधान के रूप में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक अनूठी हाइब्रिड एनर्जी स्टोरेज तकनीक विकसित की है। यह नया सिस्टम बैटरी के साथ सुपरकैपेसिटर को जोड़कर अचानक पैदा होने वाली पावर डिमांड को संभालता है और बैटरी सेल्स की सुरक्षा करता है। इस इनोवेशन के लिए रिसर्च टीम को पेटेंट भी मिल चुका है।
शहरी ट्रैफिक में इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी पर दबाव के कारण
शहरों की सड़कों पर इलेक्ट्रिक वाहनों का संचालन सामान्य हाईवे ड्राइविंग की तुलना में काफी अलग और जटिल होता है। शहरी आवागमन में वाहनों को लगातार स्टॉप एंड गो परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। ट्रैफिक सिग्नल, जाम और भारी सड़कों पर वाहन चालकों को बार-बार अचानक एक्सीलेटर दबाना पड़ता है और कुछ ही दूरी पर ब्रेक लगाना पड़ता है। जब वाहन को तुरंत गति पकड़ने की आवश्यकता होती है, तब मोटर बहुत कम समय में भारी मात्रा में करंट खींचती है। इसी तरह जब अचानक ब्रेक लगाए जाते हैं, तो रीजेनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम के माध्यम से ऊर्जा की बड़ी मात्रा तेजी से वापस बैटरी की तरफ प्रवाहित होती है।
पारंपरिक इलेक्ट्रिक व्हीकल पावर आर्किटेक्चर में यह सारा करंट लोड सीधे रासायनिक बैटरी सेल्स को झेलना पड़ता है। बार-बार हाई करंट डिस्चार्ज और चार्ज साइकिल्स के कारण बैटरी के अंदर तापमान तेजी से बढ़ता है और इलेक्ट्रिकल स्ट्रेस पैदा होता है। लंबे समय तक ऐसी परिस्थितियां बने रहने से बैटरी पैक की स्टोरेज क्षमता घटने लगती है, जिससे वाहन की रेंज कम हो जाती है और अंततः पूरी बैटरी को समय से पहले बदलना पड़ता है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक आधुनिक एनर्जी मैनेजमेंट सिस्टम (EMS) तैयार किया है जो बैटरी को इस अचानक पड़ने वाले तनाव से बचाता है।
हाइब्रिड एनर्जी स्टोरेज सिस्टम का नया आर्किटेक्चर
एनआईटी राउरकेला द्वारा विकसित इस हाइब्रिड पावर तकनीक की मुख्य विशेषता बैटरी के साथ सुपरकैपेसिटर का एकीकरण है। पारंपरिक रासायनिक बैटरियां ऊर्जा का घनत्व अधिक रखती हैं, लेकिन वे बहुत तेजी से भारी करंट देने या अवशोषित करने के मामले में सुस्त होती हैं। इसके विपरीत, सुपरकैपेसिटर एक ऐसा इलेक्ट्रोस्टैटिक डिवाइस है जो बहुत ही कम समय में अत्यधिक उच्च दर से चार्ज और डिस्चार्ज होने की अद्भुत क्षमता रखता है।
इस नई प्रणाली में जब इलेक्ट्रिक वाहन को अचानक अतिरिक्त पावर की आवश्यकता होती है या जब रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के दौरान ऊर्जा पैदा होती है, तब सुपरकैपेसिटर एक बफर की तरह काम करता है। यह तुरंत हाई-करंट रिस्पांस को अपने ऊपर ले लेता है और मुख्य बैटरी पर झटके नहीं पड़ने देता। इस व्यवस्था से बैटरी से केवल एक स्थिर और नियंत्रित दर पर ही पावर ली जाती है। परिणामस्वरूप, केमिकल सेल्स पर अचानक अत्यधिक करंट देने या लेने का दबाव लगभग समाप्त हो जाता है, जिससे बैटरी का जीवनकाल महत्वपूर्ण रूप से बढ़ जाता है।
मुख्य कंपोनेंट्स और सिंगल कनवर्टर डिजाइन
शोधकर्ताओं ने इस हाइब्रिड सिस्टम को व्यावसायिक उपयोग के लिए उपयुक्त बनाने हेतु इसके डिजाइन को अत्यधिक सरल और प्रभावी बनाया है। इस सिस्टम को मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के आधार पर तैयार किया गया है
- सिंगल कनवर्टर टोपोलॉजी: आमतौर पर बैटरी और सुपरकैपेसिटर दोनों को अलग-अलग नियंत्रित करने के लिए दो अलग कनवर्टर्स और जटिल स्विचिंग सर्किट की आवश्यकता होती है। लेकिन इस नई तकनीक में केवल एक ही कनवर्टर के जरिए दोनों पावर सोर्स को वाहन के इलेक्ट्रिकल सिस्टम से जोड़ा गया है। इससे अतिरिक्त कंपोनेंट्स की जरूरत खत्म हो जाती है और सिस्टम की लागत तथा जटिलता में बड़ी कमी आती है।
- पावर इंडक्टर: करंट के प्रवाह में होने वाले अचानक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए प्रणाली में एक इंडक्टर का उपयोग किया गया है। यह इंडक्टर ट्रांसिएंट करंट को स्मूथ करता है और वाहन के इलेक्ट्रिकल पावर फ्लो को स्थिर बनाए रखता है।
- एकीकृत सिंगल कंट्रोल स्ट्रेटजी: पूरे सिस्टम को कुशलता से संचालित करने के लिए एक यूनिफाइड कंट्रोल एल्गोरिदम लागू किया गया है। यह ड्राइविंग स्थिति के अनुसार स्वचालित रूप से निर्णय लेता है कि किस समय कितना पावर बैटरी से लिया जाएगा और कितना सुपरकैपेसिटर से।
रियल-टाइम ड्राइविंग परिस्थितियों में तकनीक का प्रदर्शन
अचानक एक्सीलरेशन और ब्रेकिंग जैसी वास्तविक ड्राइविंग परिस्थितियों में यह हाइब्रिड सिस्टम बहुत ही सुचारू रूप से कार्य करता है। जब चालक वाहन को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए थ्रॉटल दबाता है, तो मोटर को तुरंत उच्च टॉर्क की आवश्यकता होती है। पारंपरिक ईवी में यह पूरा लोड बैटरी से आता है, जिससे करंट स्पाइक उत्पन्न होता है। लेकिन इस नई प्रणाली में सुपरकैपेसिटर मिलीसेकंड्स के भीतर इस अतिरिक्त पावर डिमांड को पूरा कर देता है, जिससे मुख्य बैटरी पर कोई झटका नहीं पड़ता।
इसी तरह जब वाहन चालक ब्रेक लगाता है, तब रीजेनरेटिव ब्रेकिंग से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का बड़ा हिस्सा सुपरकैपेसिटर तुरंत सोख लेता है। आमतौर पर अचानक आने वाली यह रीजेनरेटिव एनर्जी बैटरी सेल्स को ओवरहीट कर सकती है, लेकिन सुपरकैपेसिटर के कारण यह ऊर्जा सुरक्षित रूप से स्टोर हो जाती है और बाद में दोबारा एक्सीलरेशन के समय काम में लाई जा सकती है। इससे ऊर्जा की खपत में भी सुधार होता है।
48 वोल्ट टेस्टिंग परिणाम और कम वोल्टेज ईवी में उपयोग
एनआईटी राउरकेला की रिसर्च टीम ने प्रयोगशाला में इस हाइब्रिड पावर सिस्टम का व्यापक परीक्षण किया है। टेस्ट बेन्च पर वाहन की गति में बार-बार बदलाव, अचानक ब्रेक लगाने और तेज एक्सीलरेशन जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को सिम्युलेट किया गया। परीक्षण के दौरान इस सिस्टम ने 48 वोल्ट का अत्यंत स्थिर आउटपुट वोल्टेज बनाए रखा। इसके साथ ही बैटरी करंट में होने वाले अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में यह प्रणाली पूरी तरह सफल रही।
यह तकनीक मुख्य रूप से 24 वोल्ट से 60 वोल्ट DC प्लेटफॉर्म पर चलने वाले लो-वोल्टेज इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए आदर्श मानी गई है। भारत के शहरी परिवहन परिदृश्य को देखते हुए यह खोज बेहद प्रासंगिक है। इस सिस्टम का उपयोग आने वाले समय में दोपहिया इलेक्ट्रिक वाहनों, ई-रिक्शा, थ्री-व्हीलर्स और लास्ट-माइल डिलीवरी वाहनों में व्यापक रूप से किया जा सकता है। कम लागत और सरल डिजाइन के कारण इसे मौजूदा वाहन विनिर्माण लाइनों में आसानी से एकीकृत किया जा सकता है।


















