उत्तर प्रदेश का मऊ जिला अपने अनूठे पारंपरिक व्यंजनों और खास मिठाइयों के लिए अपनी एक अलग पहचान रखता है। यहां के स्थानीय खानपान की कई वैराइटी ऐसी हैं जो न केवल क्षेत्रीय स्तर पर लोकप्रिय हैं, बल्कि दूर-दराज के महानगरों और अन्य प्रांतों तक पसंद की जाती हैं। इन्हीं जायकेदार मिठाइयों में बालूशाही का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिसकी बनावट बाहर से हल्की खस्ता और अंदर से बेहद नरम होती है। मऊ के रानीपुर बाजार में तैयार होने वाली यह बालूशाही अब अपनी खास खूशबू और मिठास के कारण विदेशों तक में अपनी पैठ बना चुकी है और ग्लोबल स्तर पर पसंद की जा रही है।
जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रानीपुर बाजार में रविंद्र स्वीट हाउस नाम की दुकान पर पिछले करीब 20 वर्षों से लगातार बालूशाही बनाई जा रही है। दुकान संचालक रविंद्र के अनुसार, इस लजीज मिठाई का स्वाद चखने के लिए दूर-दराज के इलाकों से लोग खींचे चले आते हैं। मऊ के स्थानीय निवासियों के अलावा देश के अन्य बड़े शहरों से भी लोग विशेष तौर पर इस मिठाई की मांग करते हैं। इतना ही नहीं, विदेश यात्रा पर जाने वाले प्रवासी भी यहां से आर्डर देकर विशेष रूप से बालूशाही पैक करवाते हैं और अपने साथ विदेश ले जाते हैं। इस मिठाई की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह लंबे समय तक खराब नहीं होती है, जिससे इसकी मांग लगातार बनी रहती है।
पारंपरिक तरीके से बालूशाही तैयार करने की प्रक्रिया में सबसे पहले शुद्ध मैदा का इस्तेमाल किया जाता है। मैदे में निश्चित मात्रा में घी और थोड़ा सा सोडा मिलाकर इसे अच्छी तरह गूंथा और मिलाया जाता है। इसके पश्चात तैयार किए गए मिश्रण को कुछ देर के लिए रख दिया जाता है ताकि आटा अच्छी तरह सेट हो जाए। इसके बाद गुंथे हुए मिश्रण से छोटे-छोटे हिस्से तोड़कर उन्हें गोल आकार दिया जाता है। इन गोल टुकड़ों को बेहद धीमी से मध्यम आंच पर बहुत ही इत्मीनान से फ्राई किया जाता है। बालूशाही को कभी भी तेज आंच पर नहीं तला जाता है, क्योंकि धीमी आंच पर पकाने से ही इसका बाहरी आवरण कुरकुरा और भीतर का हिस्सा मुलायम बनता है।
जब बालूशाही को सुनहरे रंग में तल लिया जाता है, उसके बाद चीनी और पानी का उपयोग करके चाशनी तैयार की जाती है। चाशनी को सही गाढ़ापन आने तक धीमी आंच पर उबाला जाता है ताकि उसकी चाशनी परफेक्ट बने। इसके बाद तली हुई बालूशाही को इस तैयार चाशनी में डुबोया जाता है और कुछ समय पश्चात बाहर निकाल लिया जाता है। चाशनी की एक समान परत चढ़ने के बाद इस मिठाई का स्वाद और भी अधिक बढ़ जाता है। बाहर से हल्की कुरकुरी और अंदर से रसभरी व नरम होने की यही खासियत इस मिठाई को ग्राहकों के बीच बेहद लोकप्रिय बनाती है।
दुकानदार रविंद्र बताते हैं कि उनकी दुकान पर बालूशाही बनाने का सिलसिला सुबह लगभग 5 बजे से ही शुरू हो जाता है। तड़के की मेहनत के बाद सुबह 6 से 7 बजे के बीच बालूशाही की पहली खेप बनकर पूरी तरह तैयार हो जाती है। इसके तुरंत बाद दुकान पर इसकी बिक्री का कार्य आरंभ हो जाता है और कई बार तो दोपहर होते-होते ही सारी बालूशाही हाथों-हाथ बिक जाती है और स्टॉक खत्म हो जाता है।
यदि किसी खरीदार को एक साथ बहुत बड़ी मात्रा में बालूशाही की आवश्यकता होती है, तो उसे कम से कम एक दिन पहले अपना आर्डर देना पड़ता है। विशेष रूप से जो लोग इस मिठाई को दूसरे शहरों या विदेश ले जाना चाहते हैं, वे एडवांस में आर्डर देकर इसे तैयार करवाते हैं ताकि समय पर फ्रेश माल मिल सके।
रविंद्र के अनुसार, उनकी दुकान पर बालूशाही की कीमत बेहद किफायती रखी गई है और इसे 180 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जाता है। स्थानीय ग्राहकों के साथ-साथ अन्य शहरों और विदेशों की यात्रा करने वाले लोगों की तरफ से भी इसकी लगातार मांग आती रहती है। यही मुख्य वजह है कि रानीपुर की यह पारंपरिक बालूशाही आज भी लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाए हुए है और लगातार लोकप्रियता के नए आयाम छू रही है।



















