भारतीय सिनेमा के लंबे इतिहास में कुछ नगमे ऐसे बने हैं जो समय बीतने के साथ पुराने होने के बजाय और भी अधिक गहरे और असरदार होते चले जाते हैं। नब्बे के दशक में ऐसे कई गीतों ने जन्म लिया, लेकिन 1994 में प्रदर्शित हुई फिल्म दिलवाले का दर्दभरा गीत जीता था जिसके लिए, उसके लिए मरता था एक अलग ही मुकाम रखता है। लगभग 32 साल पहले जब इस गाने की रचना की जा रही थी, तब इसे बनाने वाले कलाकारों के भीतर का दर्द आंसुओं के रूप में छलक पड़ा था। आज रिलीज के 30 साल बाद भी यह गीत मिलेनियल्स और जेन ज़ी की प्लेलिस्ट में शीर्ष पर बना हुआ है और सोशल मीडिया पर अपनी टूटे दिल की भावनाओं को व्यक्त करने का पसंदीदा जरिया बना हुआ है।
मोमबत्ती की रोशनी और वो दर्दनाक लम्हा
इस अमर गीत की रचना के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प और भावुक घटना जुड़ी हुई है। जब इस गाने की धुन और बोल तैयार किए जा रहे थे, तब अचानक स्टूडियो की बिजली गुल हो गई और पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया। अंधेरा होने पर मशहूर गीतकार समीर ने सुझाव दिया कि काम को अगली रिकॉर्डिंग तक के लिए टाल दिया जाए। हालांकि, संगीतकार जोड़ी नदीम और श्रवण ने इस प्रस्ताव को तुरंत ठुकरा दिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि उस क्षण जो सच्चा दर्द, उदासी और भावनाएं उनके दिलों में उमड़ रही थीं, वे काम टालने पर दोबारा शायद उस तीव्रता से वापस नहीं आ पाएंगी।
इसके बाद कमरे में मोमबत्तियां जलाई गईं। मोमबत्तियों की मद्धम रोशनी के बीच यादों और टूटे रिश्तों का दर्द इस कदर हावी हुआ कि गीतकार समीर के साथ-साथ संगीतकार नदीम और श्रवण तीनों की आंखों से आंसू बहने लगे। समीर के अनुसार, उन्होंने यह गीत अपने जीवन के एक बेहद व्यक्तिगत और तकलीफदेह दौर को याद करते हुए लिखा था। वे अपनी उस बेइंतहा मोहब्बत की यादों को शब्दों में पिरो रहे थे, जिससे वे कभी बेहद प्यार करते थे। तीनों रचनाकारों की इच्छा यही थी कि जो गहरी वेदना वे खुद महसूस कर रहे थे, ठीक वही अहसास सुनने वाले दर्शकों के दिलों तक भी पहुंचे।
जब सिनेमाघर में दर्शकों की आंखें हो गईं नम
अपनी इस कोशिश और अहसास को परखने के लिए समीर, नदीम और श्रवण खुद फिल्म दिलवाले का शो देखने थिएटर पहुंचे। जैसे ही बड़े पर्दे पर यह गाना शुरू हुआ और मशहूर गायक कुमार सानू की आवाज गूंजी, तीनों ने देखा कि हॉल में बैठे दर्शकों की आंखें भी आंसुओं से भीगी हुई थीं। उस भावुक मंजर को देखकर समीर को यकीन हो गया कि जब कोई कलाकृत सीधे दिल की गहराइयों से बनाई जाती है, तो वह सीधे सामने वाले के दिल तक पहुंचती है। समीर, नदीम-श्रवण और कुमार सानू के इस अद्भुत संगम ने इस गाने को भारतीय संगीत इतिहास में अमर बना दिया।
मात्र 2 करोड़ के बजट में बनी फिल्म ने की 12 करोड़ की कमाई
फिल्म दिलवाले का निर्देशन करण राजदान ने किया था। इस फिल्म में सुनील शेट्टी, परेश रावल और गुलशन कुमार जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों ने बेहद प्रभावी भूमिकाएं निभाई थीं। महज 2 करोड़ रुपये के सीमित बजट में तैयार हुई इस फिल्म ने दुनिया भर के बॉक्स ऑफिस पर लगभग 12 करोड़ रुपये की बंपर कमाई की और उस दौर की सबसे बड़ी सुपरहिट फिल्मों में शुमार हुई।
तीन दशकों बाद भी बरकरार है इस नगमे का जादू
बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों और वित्तीय सफलता से कहीं बढ़कर इस गाने का सामाजिक और भावनात्मक प्रभाव रहा है। यह न तो कोई शोरगुल से भरा गाना था और न ही इसमें कोई भारी-भरकम आधुनिक संगीत प्रयोग किए गए थे। यह खामोश दिल के दर्द को सुरीले सुरों में पिरोने की एक अत्यंत सच्ची और सादी कोशिश थी। यही वजह है कि रिलीज के 30 साल बीत जाने के बाद भी यह गीत आज भी प्यार, जुदाई और अनकही मोहब्बत के एहसास को बयां करने के लिए सबसे सटीक माना जाता है।



















