बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त ने अपने जीवन के सबसे विवादित दौर और 1993 के हथियार मामले पर खुलकर अपनी बात रखी है। अतीत के फैसलों पर मंथन करते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय अपने भीतर की चेतावनी को अनसुना करना उनकी बहुत बड़ी चूक थी। उन्हें उस वक्त लगा था कि हथियारों को थोड़े समय के लिए अपने पास संभालकर रखना कोई गंभीर संकट पैदा नहीं करेगा, लेकिन वही एक कदम उनके जीवन का सबसे लंबा कानूनी संघर्ष बन गया।
टॉक शो में साझा किए जिंदगी के पुराने पन्ने
शेखर सुमन के कार्यक्रम शेखर टुनाइट में बातचीत के दौरान संजय दत्त ने उन दर्दनाक पलों की यादें ताजा कीं। इस दौरान उन्होंने पुलिस हिरासत में जाने के वाकये, सलाखों के पीछे गुजारे कठिन समय और परिवार पर पड़े गहरे असर का जिक्र किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि गलत फैसलों की श्रृंखला ने उनकी जिंदगी को बेहद पेचीदा और मुश्किल राह पर ला खड़ा किया था।
अंतरात्मा की चेतावनी को नजरअंदाज करने का मलाल
संजय दत्त के अनुसार जब पहली बार उन हथियारों को उनके सामने लाकर रखने को कहा गया, तब उनके मन ने तुरंत आगाह किया था कि यह कदम सही नहीं है। अपनी उस मानसिक उलझन को याद करते हुए उन्होंने कहा, 'गलती मेरी थी।' उन्होंने माना कि इंसान को हमेशा अपने दिल और नैतिक समझ की सुननी चाहिए, न कि दिमागी तर्कों में उलझकर गलत दिशा पकड़नी चाहिए। चेतावनी मिलने के बावजूद उस पर ध्यान न देना उनके लिए भारी पड़ गया।
हथकड़ी देखकर टूट गए थे सुनील दत्त
इस बातचीत में अभिनेता ने एक नागरिक के तौर पर अपने मुल्क के कायदे-कानूनों की पूरी समझ रखने की जरूरत पर भी जोर दिया। गिरफ्तारी के लम्हे को याद करते हुए उन्होंने बताया कि जब पुलिस ने उनके हाथों में हथकड़ियां पहनाईं, तब उनके पिता सुनील दत्त गहरे सदमे में चले गए थे। पिता की आंखों से बहते आंसुओं और उनकी बेबसी को बयां करते हुए उन्होंने कहा कि सुनील दत्त यह यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि उनका बेटा ऐसा कदम उठा सकता है, और वे भीतर से बिखर गए थे।
1993 के घटनाक्रम से लेकर रिहाई तक का सफर
यह पूरा कानूनी विवाद 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों की जांच के दौरान सामने आया था। तफ्तीश आगे बढ़ी तो अभिनेता के पास अवैध असलहा मौजूद होने की जानकारी उजागर हुई, जिसमें एके-56 राइफल, पिस्तौल और जिंदा कारतूस शामिल थे। इसके चलते अप्रैल 1993 में पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। आगे चलकर नवंबर 2006 में एक विशेष अदालत ने उन्हें प्रतिबंधित हथियार रखने के आरोप में आर्म्स एक्ट के तहत मुजरिम ठहराया, हालांकि उन्हें बम धमाकों की साजिश में शामिल होने का दोषी नहीं माना गया। पूरी सजा काटने के उपरांत फरवरी 2016 में उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।



















