राजस्थान के टोंक जिले में सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। जिला स्पेशल टीम यानी डीएसटी ने सरकारी दवाओं के अवैध भंडारण और चोरी के शक में एक निजी क्लीनिक पर अचानक दबिश दी। इस छापेमारी के दौरान निजी परिसर के भीतर से भारी तादाद में सरकारी नशीली दवाएं बरामद की गई हैं। इस पूरी कार्रवाई के केंद्र में सआदत अस्पताल का एक सरकारी मेल नर्स अकबर खान आया है, जिसे मौके से पकड़ा गया है। सामने आई जानकारी के मुताबिक, सरकारी अस्पताल में अपनी सेवाएं देने वाला यह स्वास्थ्य कर्मी समानांतर रूप से अपना निजी क्लीनिक भी संचालित कर रहा था।
डीएसटी और कोतवाली पुलिस की संयुक्त दबिश
इस पूरी कार्रवाई की कमान डीएसटी प्रभारी ओमप्रकाश चौधरी संभाल रहे थे, जिनके नेतृत्व में गठित टीम ने निजी क्लीनिक पर अचानक छापा मारा। क्लीनिक के कमरों और अलमारियों की तलाशी लेने पर जब सरकारी आपूर्ति वाली दवाओं का इतना विशाल भंडार सामने आया, तो मौके पर मौजूद पुलिसकर्मी भी अवाक रह गए। हालात की गंभीरता और भारी जब्ती को देखते हुए तत्काल कोतवाली थाना पुलिस को सूचित किया गया। इसके बाद कोतवाली थानाधिकारी भंवरलाल वैष्णव भी अपने पुलिस जाब्ते के साथ फौरन घटनास्थल पर पहुंचे और पूरे परिसर को अपने नियंत्रण में लेकर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
बरामद दवाओं की तकनीकी पड़ताल और ड्रग कंट्रोलर की भूमिका
कार्रवाई के दौरान निजी क्लीनिक से जो दवाएं मिली हैं, उनमें बड़े पैमाने पर सरकारी नशीली दवाओं की मौजूदगी दर्ज की गई है। अब जांच का मुख्य दायरा इन दवाओं की सटीक पहचान, उनके कुल वजन व संख्या और अस्पताल के आंतरिक सिस्टम से उनके बाहर निकलने के पूरे रास्ते पर केंद्रित हो गया है। पुलिस प्रशासन ने मामले की आधिकारिक सूचना चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को साझा कर दी है। तय प्रक्रिया के तहत कोटा से अतिरिक्त ड्रग कंट्रोलर टोंक पहुंच रहे हैं। उनकी तकनीकी निगरानी और मौजूदगी में ही इन सभी दवाओं की रासायनिक श्रेणी, निर्माण बैच और इनके स्रोत से जुड़े दस्तावेज जुटाए जाएंगे। यह पड़ताल बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होगा कि ये दवाएं वास्तव में किस स्तर की नशीली श्रेणी में आती हैं।
सआदत अस्पताल के स्टॉक और वितरण प्रणाली पर उठे सवाल
इस सनसनीखेज खुलासे के बाद स्वास्थ्य प्रशासन के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जरूरतमंद मरीजों के लिए आवंटित सरकारी दवाएं एक निजी क्लीनिक की चौखट तक कैसे पहुंचीं। सरकारी चिकित्सालयों में दवाओं की आपूर्ति, स्टॉक रजिस्टर और वितरण का एक कड़ा नियमबद्ध तंत्र मौजूद रहता है। ऐसे में किसी गैर-सरकारी स्थान पर सरकारी दवाओं का इतना बड़ा जखीरा पाया जाना सीधे तौर पर स्टॉक रिकॉर्ड में हेराफेरी की ओर इशारा करता है। इस बात की गहरी आशंका जताई जा रही है कि सआदत अस्पताल के मुख्य दवा भंडार से इतनी बड़ी खेप बिना किसी संगठित मिलीभगत के बाहर नहीं आ सकती और इसमें अन्य लोगों का हाथ भी हो सकता है। हालांकि, स्वास्थ्य विभाग या पुलिस की ओर से अभी किसी अन्य उच्च अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता सिद्ध नहीं की गई है, क्योंकि अंतिम निष्कर्ष विस्तृत विभागीय और फोरेंसिक जांच पूरी होने के बाद ही सामने आ पाएगा।
चिकित्सा विभाग में खलबली और आगामी जांच की दिशा
निजी क्लीनिक से सरकारी नशीली दवाओं का जखीरा बरामद होने की खबर फैलते ही टोंक के समूचे चिकित्सा महकमे में हड़कंप मच गया है। वर्तमान में पुलिस और डीएसटी की संयुक्त टीम जब्त की गई सामग्री से संबंधित सभी डिजिटल और दस्तावेजी सुबूत जुटाने में लगी हुई है। कोटा से अतिरिक्त ड्रग कंट्रोलर के मौके पर पहुंचने के बाद जब दवाओं के बैच नंबर का मिलान सआदत अस्पताल के स्टॉक लेजर से किया जाएगा, तब इस बात का पर्दाफाश होगा कि यह लीकेज कब से चल रहा था। फिलहाल इस घटना ने टोंक के सरकारी अस्पतालों में दवाओं के भंडारण, सुरक्षा जांच और वितरण की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। आगामी जांच में यह स्थापित करना सबसे जरूरी होगा कि इन दवाओं का मूल स्रोत क्या था, अस्पताल के स्टॉक में कितनी कमी दर्ज है और इस पूरे खेल में अकबर खान के अलावा और कौन-कौन शामिल था।























