हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसी कई मिसालें दर्ज हैं जहां शुरुआती तौर पर नाकाम दिख रही किसी रचना ने आगे चलकर सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। ऐसी ही एक अनूठी दास्तान वर्ष 1967 में बड़े पर्दे पर प्रदर्शित हुई जासूसी थ्रिलर शैली की पेशकश की है, जिसमें मुख्य अभिनेता के तौर पर जितेंद्र और उनकी जोड़ीदार के रूप में बबीता ने काम किया था। यह वही परियोजना थी जिसके बलबूते अभिनेता ने फिल्म उद्योग में अपने पैर मजबूती से जमाए, जबकि शुरुआती बारह सप्ताह तक आलम यह था कि सिनेमाघरों के भीतर सन्नाटा पसरा हुआ था और टिकट खिड़कियों पर खरीदार नहीं पहुंच रहे थे।
शीर्ष सितारों की बेरुखी और रात्रिकालीन फिल्मांकन की चुनौती
इस जासूसी परियोजना के निर्माण से पहले भूमिका के चयन को लेकर निर्माताओं को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। निर्माण दल की प्राथमिक इच्छा थी कि मुख्य किरदार फिरोज खान अदा करें। निर्माताओं के सामने समय सीमा का कड़ा दबाव था, जिसके चलते वे दृश्य विन्यास को शीघ्रता से निपटाने के लिए रात की पाली में भी काम जारी रखना चाहते थे। फिरोज खान रात्रिकालीन काम के पक्षधर नहीं थे, इसी व्यावहारिक असहमति की वजह से उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।
इसके उपरांत निर्माण दल ने मनोज कुमार तथा शशि कपूर जैसे स्थापित नामों से संपर्क साधा। इन दोनों अभिनेताओं के साथ भी विभिन्न कारणों से सहमति नहीं बन पाई। जब कई बड़े नाम इस परियोजना से अलग हो गए, तब जाकर यह केंद्रीय किरदार जितेंद्र की झोली में आया। उस दौर में शायद ही किसी समीक्षक अथवा व्यापार विशेषज्ञ ने यह अनुमान लगाया होगा कि यह साधारण सा लगने वाला फैसला अभिनेता के सफर का सबसे मजबूत स्तंभ साबित होगा।
रचनात्मक दल और तकनीकी सहयोगियों का जमावड़ा
विजय लक्ष्मी पिक्चर्स के बैनर तले साकार हुई इस परियोजना का वित्तीय दायित्व सुंदरलाल नहाटा और डूंडी के कंधों पर था। वहीं निर्देशन की संपूर्ण कमान रविकांत नगाइच के पास थी, जिन्होंने न केवल दृश्यों का संयोजन किया बल्कि कैमरे के संचालन और सिनेमैटोग्राफी का प्रभार भी स्वयं संभाला। उनकी इस दोहरी जिम्मेदारी ने पर्दे पर एक गतिशील तकनीकी कसावट पेश की।
जितेंद्र और बबीता की मुख्य जोड़ी के समानांतर इस कथा संसार को जीवंत बनाने के लिए कई मंझे हुए सह कलाकारों को शामिल किया गया था। इनमें सज्जन, आगा, राजेंद्र कलेश्वर राव, नागेश, मुकरी, मोहन चोटी, डेविड अब्राहम चेउलकर तथा अरुणा ईरानी ने अपने-अपने किरदारों से कहानी के ताने-बाने को रोचक और समृद्ध बनाया।
संगीत का आकर्षण और निर्माण लागत का गणित
इस कृति की दीर्घकालिक लोकप्रियता का एक बहुत बड़ा आधार इसका संगीतमय पक्ष रहा। धुनों की रचना लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की ख्यातिप्राप्त जोड़ी ने की थी, जबकि गीतों के बोल आनंद बख्शी की कलम से निकले थे। इनके गानों की ताजगी ने धीरे-धीरे आम श्रोताओं के बीच गहरी पैठ बनाई।
निर्माण लागत की बात करें तो शुरुआत में इस पर करीब 8 लाख रुपये का व्यय निर्धारित हुआ था। हालांकि, बाद के दौर में जब परिस्थितियां पूरी तरह बदलीं और वितरकों की मांग बढ़ी, तो अतिरिक्त कॉपियां तैयार करवानी पड़ीं। इन अतिरिक्त व्यवस्थाओं के जुड़ने से कुल लागत बढ़कर लगभग 20 लाख रुपये तक पहुंच गई। लागत में इजाफे के बावजूद जब फिल्म का अंतिम बहीखाता तैयार हुआ, तो इसने लगभग ढाई करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज कराकर सबको हैरत में डाल दिया।
थिएटर मालिकों की नाराजगी और अभिनेता का साहसिक समझौता
शुरुआती दौर इस परियोजना के लिए बेहद निराशाजनक साबित हो रहा था। प्रदर्शन के शुरुआती 12 हफ्तों तक दर्शकों की संख्या बेहद सीमित रही और हॉल लगभग खाली नजर आते थे। लगातार हो रहे नुकसान से तंग आकर सिनेमाघर संचालकों ने इसे अपने पर्दों से उतारने का पक्का मन बना लिया था।
परियोजना को असमय हटने से बचाने के लिए जितेंद्र ने व्यक्तिगत स्तर पर एक जोखिम भरा दांव खेला। उन्होंने प्रदर्शकों से आग्रह किया कि वे इसे कम से कम 15 सप्ताह तक चलने दें। अभिनेता ने संचालकों को स्पष्ट वचन दिया कि यदि पंद्रह हफ्ते पूरे होने पर भी दर्शक नहीं आते हैं, तो टिकटों की बिक्री में रहने वाली पूरी कमी का भुगतान वे अपनी जेब से करेंगे। इस आश्वासन के बाद प्रदर्शन जारी रहा और चमत्कारिक रूप से पंद्रहवें हफ्ते के बाद दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ने लगी। मांग इतनी बढ़ी कि अतिरिक्त प्रिंट छपवाने पड़े और यह फ्लॉप की कगार से उठकर एक ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर में तब्दील हो गई।



















