सिनेमाई पर्दे पर जब संवाद अदायगी की बात आती है, तो एक चेहरा बिना किसी बनावटी तामझाम के दर्शकों के जेहन में उभरता है। कभी समाज के दोहरे चरित्र को बेनकाब करता कानून का रखवाला, तो कभी माफिया की दुनिया में खौफ पैदा करता अपराधी, और कभी अपनी चुटीली हरकतों से ठहाके लगवाता आम इंसान। अपनी दमदार आवाज और संजीदा अभिनय के दम पर उन्होंने मराठी और हिंदी दोनों सिनेमाई फलकों पर एक अमिट छाप छोड़ी। मगर चकाचौंध से भरी इस दुनिया के पीछे का सच बेहद खुरदरा और आंसुओं से भीगा रहा है। कंगाली के दिनों में बचपन की कुर्बानियां, पहले बच्चे को खोने का असहनीय आघात, सिगरेट की लत से निजात और जमीनी जुड़ाव से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं, जो उनके संघर्ष को बिल्कुल अलग नजरिए से सामने लाते हैं।
मुरुड-जंजीरा से जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स तक का सफर
इस मंझे हुए कलाकार का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा इलाके में हुआ था। घर-परिवार में माता-पिता ने उनका नाम विश्वनाथ पाटेकर रखा था। बचपन के दिनों में परिजन और करीबी उन्हें लाड़ से एक छोटा नाम देकर बुलाने लगे, और वही पुकार आगे चलकर पूरी दुनिया में उनकी स्थाई पहचान बन गई। आज फिल्मी गलियारों में सब उन्हें इसी नाम से सम्मान देते हैं। कला के प्रति उनकी स्वाभाविक रुचि थी, इसलिए उन्होंने मुंबई के विख्यात जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स का रुख किया। वहां उन्होंने कमर्शियल आर्ट की विधिवत शिक्षा हासिल की। रंगों, रेखाओं और विजुअल कंपोजिशन की यही तकनीकी समझ बाद में उनके जीवन के कठिन मोड़ों पर जीविका चलाने तथा किरदारों को गढ़ने में बेहद मददगार साबित हुई।
तेरह साल का बालक, चूनाभट्टी की धूप और पैंतीस रुपये का वेतन
बचपन में खेलकूद और पढ़ाई की उम्र में उन पर जिम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ा था। पिता के व्यापार में एकाएक इतना भारी नुकसान हुआ कि पूरे परिवार की आर्थिक रीढ़ टूट गई। घर के चूल्हे को जलता रखने और बड़ों का हाथ बंटाने के लिए उन्होंने मात्र 13 वर्ष की कच्ची उम्र में पसीना बहाना शुरू कर दिया। वे स्कूल की कक्षाएं खत्म होते ही मुंबई के चूनाभट्टी इलाके का रुख करते थे, जहां उन्हें सिनेमाई पोस्टरों पर हाथ से रंग भरने की मजदूरी मिली। उस दौर में इस हाड़-तोड़ मेहनत के बदले उन्हें महीने के आखिर में कुल 35 रुपये की राशि थमाई जाती थी। कभी-कभार मेहनताने के साथ एक वक्त का निवाला नसीब हो जाता था। पैसे बचाने की खातिर वे तपती धूप में कई किलोमीटर का फासला पैदल ही नापते थे। बचपन के उन दिनों में झेली गई भूख और तिरस्कार ने उन्हें जीवन की कड़वी सच्चाइयों का ऐसा पाठ पढ़ाया, जिसने उनके व्यक्तित्व को फौलादी बना दिया।
तीसरी कक्षा में रंगमंच का आकर्षण और हिंदी सिनेमा में पहला कदम
अभिनय की दुनिया से उनका नाता काफी पुराना था, जिसकी जड़ें उनके गांव में फैली थीं। जब वे तीसरी कक्षा में पढ़ रहे थे, तभी से ग्रामीण नाटकों और स्थानीय मंचों पर उतरने लगे थे। यह शौक केवल वक्त बिताने का साधन नहीं था, बल्कि अपनी आंतरिक ऊर्जा और भावनाओं को बाहर निकालने का सबसे सशक्त माध्यम बन चुका था। आगे चलकर उन्होंने मराठी थिएटर में पसीना बहाया, जहां उनकी अदायगी को खूब तराशा गया। रंगमंच के इसी मजबूत आधार ने उनके लिए बड़े पर्दे के दरवाजे खोले। इसके बाद साल 1978 में जब फिल्म ‘गमन’ सामने आई, तो दर्शकों को हिंदी सिनेमा में एक नए और प्रभावशाली कलाकार की आमद का अहसास हुआ।
पचास रुपये का कलाकार और बैंक में नौकरी करती हमसफर
साल 1978 में ही उन्होंने नीलकांति पाटेकर के साथ सात फेरे लिए। उस दौर में दोनों के आर्थिक हालात में जमीन-आसमान का फर्क था। नीलकांति एक बैंक में कार्यरत थीं और हर महीने तकरीबन 2,500 रुपये का पक्का वेतन पाती थीं। दूसरी तरफ, रंगमंच पर संघर्ष कर रहे अभिनेता को किसी नाटक के एक शो के लिए मात्र 50 रुपये के आसपास मिलते थे। कमाई के इस भारी अंतर के बावजूद जीवनसंगिनी ने उनका हौसला कभी टूटने नहीं दिया। उन्होंने हमेशा विश्वास दिलाया कि प्रतिभा के दम पर हालात जरूर बदलेंगे और वे अभिनय के रास्ते पर डटे रहें। हालांकि समय बीतने के साथ परिस्थितियां ऐसी बनीं कि दोनों वर्षों तक अलग-अलग रहने लगे, मगर उन्होंने अपने रिश्ते को कानूनी तौर पर कभी खत्म नहीं किया और तलाक की नौबत नहीं आने दी।
बड़े बेटे दुर्वासा की असमय विदाई और भीतर की आत्मग्लानि
पारिवारिक जीवन में सबसे बड़ा वज्रपात तब हुआ जब उनके पहले बेटे दुर्वासा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। वह बच्चा पैदाइश के समय से ही गंभीर शारीरिक व्याधियों और नाजुक सेहत से जूझ रहा था। महज ढाई वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उसने दम तोड़ दिया। इस भयानक आघात ने पिता के मन को अंदर तक झकझोर दिया था। बरसों बाद इस दर्दनाक वाकये को याद करते हुए उन्होंने माना था कि उस नाजुक वक्त में वे इस बात को लेकर ज्यादा फिक्रमंद हो गए थे कि दुनिया उनके बेटे को देखकर क्या राय बनाएगी। बाद में उन्हें इस बात का गहरा पछतावा हुआ कि उन्हें सामाजिक धारणाओं की परवाह छोड़कर केवल अपने बच्चे के दर्द को समझना चाहिए था। हालांकि बाद में उनके घर दूसरे बेटे मल्हार का आगमन हुआ, लेकिन पहले मासूम के बिछड़ने की टीस उनके दिल में हमेशा जिंदा रही।
दिन भर में साठ सिगरेट का धुआं और बहन की एक बात पर फैसला
एक समय ऐसा भी आया जब वे तंबाकू के धुएं के गंभीर शिकंजे में फंस चुके थे। इस बुरी आदत की गिरफ्त का आलम यह था कि वे चौबीस घंटे के भीतर लगभग 60 सिगरेट फूंक जाते थे। यहां तक कि स्नान करते वक्त भी उनके हाथ में सुलगती हुई सिगरेट मौजूद रहती थी। उनकी कार में तंबाकू की दुर्गंध इस कदर बस चुकी थी कि परिचित और अजनबी उसमें सफर करने से कतराते थे। इस खतरनाक लत पर लगाम तब लगी, जब उनकी बहन ने एक दिन उन्हें बेतहाशा खांसते देखा। उस समय बहन अपने खुद के बच्चे को खोने के गहरे सदमे से गुजर रही थी। अपने भाई को ऐसी दयनीय हालत में देखकर बहन के मुंह से निकला कि समझ नहीं आता अभी आगे और क्या-क्या देखना बाकी है। बहन के इन शब्दों ने सीधे उनके दिल पर वार किया। उन्होंने पल भर की देर किए बिना उसी क्षण सिगरेट को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
कैमरे के पीछे मास्टर शेफ और सौ लोगों के लिए दावत
कलाकारी के अलावा उन्हें रसोई संभालने और दूसरों को अपने हाथ का बना खाना परोसने का जबर्दस्त चाव रहा है। वे कई मर्तबा यह बात सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि लोगों का पेट भरने में उन्हें आत्मिक सुकून मिलता है और वे खुद को एक अदाकार की तुलना में कहीं बेहतर रसोइया मानते हैं। जब भी फिल्मों की शूटिंग चलती, तो वे अक्सर पूरी यूनिट का जिम्मा अपने सिर ले लेते थे। अगर सेट पर 100 से अधिक लोगों का क्रू भी मौजूद होता, तो भी वे खुद चूल्हा संभालकर सबके लिए भोजन पकाने में आगे रहते थे। उनके लिए खाना तैयार करना महज एक शगल नहीं, बल्कि अपने इर्द-गिर्द के लोगों के साथ दिली रिश्ता कायम करने का जरिया था।
सिंहगढ़ की मिट्टी में किसानी और फसलों से गहरा लगाव
लाइट्स और कैमरे की चकाचौंध से परे उन्हें धरती से जुड़कर पसीना बहाने में सुकून मिलता रहा है। पुणे के निकट ऐतिहासिक सिंहगढ़ किले की तलहटी में स्थित अपने फार्म पर वे खुद हल और कुदाल चलाने से कभी पीछे नहीं हटे। वहां वे चावल, मूंगफली, लहसुन तथा प्याज जैसी फसलों की बुवाई और देखभाल खुद अपनी निगरानी में करते थे। वे अक्सर समय निकालकर ग्रामीण परिवेश में चले जाते थे ताकि साधारण जीवन जी सकें। मिट्टी और किसानी से जुड़ा यह गहरा रिश्ता केवल उनके शौक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसानों के दर्द और सूखे की विभीषिका को देखकर उन्होंने जरूरतमंद अन्नदाताओं की मदद के लिए बड़े पैमाने पर सामाजिक कदम भी उठाए।



















