प्रसिद्ध लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने मुस्लिम पर्सनल लॉ और सामाजिक सुधारों की गति को लेकर गंभीर आत्ममंथन की जरूरत बताई है। एक हालिया साक्षात्कार के दौरान उन्होंने तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को प्रतिबंधित किए जाने की प्रक्रिया का हवाला देते हुए पूछा कि इस तरह के आवश्यक बदलाव स्वयं मुस्लिम समुदाय के भीतर से क्यों शुरू नहीं हुए। उनके अनुसार, लंबे समय से चली आ रही कुरीतियों को समाप्त करने के लिए किसी बाहरी राजनीतिक पहल अथवा सरकारी हस्तक्षेप की प्रतीक्षा करना आत्मसम्मान और धर्मनिरपेक्षता के नजरिए से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
कानूनी बदलाव और आजादी के बाद की चुप्पी पर सवाल
अख्तर ने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए ध्यान दिलाया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ वर्ष 1937 में अस्तित्व में आया था, जबकि भारत को आजादी 1947 में हासिल हुई। उनका मुख्य तर्क यह रहा कि स्वतंत्रता के बाद दशकों बीत जाने पर भी इस ढांचे में जरूरी सुधार लाने की दिशा में कोई ठोस आंतरिक प्रयास नहीं दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यवस्था में सामाजिक कुरीतियों को सुधारने की जरूरत थी, तो उसकी पहली आवाज समुदाय के प्रबुद्ध वर्ग से आनी चाहिए थी।
इसी क्रम में उन्होंने सवाल उठाया कि तत्काल तीन तलाक पर पाबंदी लगाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार को कानून का सहारा क्यों लेना पड़ा। इस पूरी स्थिति को उन्होंने असहज करने वाला बताते हुए पूछा कि समाज के भीतर से सुधार की पहल न होना किस तरह का सेक्युलरिज्म दर्शाता है। उनका मानना है कि जब समाज अपनी विसंगतियों को स्वयं दूर नहीं करता, तब बाहरी संस्थाओं को उसमें दखल देने का अवसर मिलता है।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ और 2019 का कानून
भारत में तत्काल तीन तलाक के कानूनी और सामाजिक पहलुओं पर लंबी अदालती बहस चली है। इस सिलसिले में 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए तलाक-ए-बिद्दत को मनमाना और असंवैधानिक करार दिया था। इस न्यायिक निर्णय ने उस पुरानी प्रथा की वैधता को समाप्त कर दिया जो महिलाओं के मूलभूत अधिकारों को प्रभावित करती थी।
सर्वोच्च अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद विधायी स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ी। जुलाई 2019 में संसद ने 'मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम' पारित किया। इस कानून के लागू होने के साथ ही तत्काल तीन तलाक देने को गैरकानूनी और दंडनीय अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया, जिससे इस विषय पर कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो गई।
दूसरों की आलोचना से पहले अपने समाज में सुधार जरूरी
जावेद अख्तर ने इस बात पर विशेष बल दिया कि किसी भी समुदाय को सबसे पहले अपनी आंतरिक कमजोरियों को स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि मुस्लिम समाज का केवल एक बहुत सीमित वर्ग ही रूढ़िवादिता और कमियों के खिलाफ मुखर होकर बोलता है। उनका कहना था कि दूसरों पर उंगली उठाने या बाहरी गलतियों की निंदा करने से पहले अपने घर की व्यवस्था सुधारना अधिक जरूरी है।
स्वयं की पहचान स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही वह नास्तिक हैं, किंतु उनका जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ है। इसी पृष्ठभूमि के कारण वह अपने समुदाय की समस्याओं और सामाजिक कुरीतियों को उजागर करना अपना नैतिक दायित्व और अधिकार दोनों मानते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका प्राथमिक दायित्व अपने समाज की खामियों को दुरुस्त करने के लिए आवाज उठाना है, जिसके बाद ही वह दूसरों की कमियों पर सवाल खड़े करने का नैतिक अधिकार रखते हैं।
विक्टिम कार्ड की प्रवृत्ति और प्रगतिशील सोच का अभाव
अख्तर ने सामाजिक विमर्श में दिखने वाले दोहरे दृष्टिकोण की भी कड़ी निंदा की। उन्होंने इस तथ्य की ओर इशारा किया कि भारत में बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोग फासीवाद और सांप्रदायिकता जैसी बुराइयों के विरुद्ध खुलकर बोलते हैं। इसके विपरीत, मुस्लिम समाज के भीतर पनप रही कट्टरता और पुरानी सोच का विरोध करने वालों का दायरा बहुत संकुचित दिखता है।
उन्होंने कहा कि किसी भी वर्ग या समुदाय को लगातार खुद को केवल पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने से बचना चाहिए। आधुनिक, प्रगतिशील और स्वतंत्र विचार रखने वाले परिवारों के शिक्षित लोगों को आगे आकर दकियानूसी सोच के विरुद्ध मजबूती से खड़ा होना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि समाज में बदलाव चाहने वाले ऐसे विचारशील लोग निश्चित तौर पर मौजूद हैं, परंतु उनमें से कई खुलकर अपनी बात कहने से संकोच करते हैं या डरते हैं।
हिंदू पर्सनल लॉ और 1956 के हिंदू कोड बिल का संदर्भ
अपने विचार को ऐतिहासिक संदर्भ देने के लिए उन्होंने हिंदू समाज में हुए कानूनी सुधारों का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने 1956 में लाए गए हिंदू कोड बिल की चर्चा करते हुए याद दिलाया कि उस दौर में भी परंपरावादी और रूढ़िवादी गुटों ने इसका कड़ा प्रतिरोध किया था। विशेष तौर पर बेटियों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा देने के प्रस्ताव का भारी विरोध हुआ था।
इसके बावजूद समय के साथ कानूनी और सामाजिक बदलाव जारी रहे, जिसका परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2005 में कानून में संशोधन कर बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार प्रदान किया गया। इसी परिप्रेक्ष्य में उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आज जो लोग 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे नारों की वकालत करते हैं, इतिहास में उन्हीं विचारों के पूर्ववर्तियों ने महिलाओं को समान संपत्ति अधिकार दिए जाने का तीखा विरोध किया था।
सामाजिक और सांस्कृतिक मंचों पर निरंतर सक्रियता
जावेद अख्तर लंबे अरसे से राजनीतिक, सामाजिक और सांप्रदायिक सद्भाव से जुड़े प्रश्नों पर अपनी निष्पक्ष राय रखने के लिए पहचाने जाते हैं। अगस्त 2026 में भी उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा वहां रहने वाले हिंदू अल्पसंख्यकों को लेकर दिए गए एक बयान पर खुलकर असहमति जताई थी और सवाल खड़े किए थे।
अपनी साहित्यिक और कलात्मक यात्रा में भी वह धर्मनिरपेक्षता और मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देते रहे हैं। वर्ष 2026 में प्रदर्शित निर्देशक राजकुमार संतोषी की विभाजन पर आधारित फिल्म 'बंटवारा 1947' के लिए उन्होंने संगीतकार एआर रहमान के साथ मिलकर गीत लिखे, जिनके जरिए 1947 के बंटवारे के मानवीय दर्द और त्रासदी को रेखांकित किया गया था। अब तत्काल तीन तलाक और आंतरिक सामाजिक सुधारों पर उनके इस बयान ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत और सामाजिक चर्चाओं को गति दे दी है।


















