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सरगुजा में धान के घाटे से उबरे किसान शिव बालक, डबरी में मछली पालन और सब्जियों से खोली कमाई की नई राहछत्तीसगढ़
6 अक्तू॰ 2026, 8:50 am (1 घंटे पहले)· 0

सरगुजा में धान के घाटे से उबरे किसान शिव बालक, डबरी में मछली पालन और सब्जियों से खोली कमाई की नई राह

पारंपरिक धान की खेती में कम लाभ मिलने पर छत्तीसगढ़ के सरगुजा निवासी किसान शिव बालक ने डबरी बनवाकर मछली पालन और सब्जी उत्पादन शुरू किया, जिससे शुरुआती दौर में ही 25 हजार रुपये तक की कमाई हुई।

पारंपरिक धान की फसल से मनमुताबिक मुनाफा न मिलने पर छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के किसान शिव बालक ने अपनी खेती का तरीका बदला और अतिरिक्त कमाई का मजबूत जरिया तलाश लिया। उन्होंने खेत में बनी डबरी के जरिए जलीय कृषि और सब्जियों की पैदावार का एकीकृत मॉडल अपनाया, जिससे पहले ही प्रयास में संतोषजनक वित्तीय लाभ देखने को मिला है। यह अभिनव कदम अब उनके पूरे परिवार के लिए नियमित आजीविका का मुख्य आधार साबित हो रहा है।

ग्रामीण रोजगार योजना की मदद से तैयार हुआ जल ढांचा

शिव बालक के अनुसार उनके खेत में मौजूद डबरी का निर्माण ग्रामीण रोजगार योजना के अंतर्गत कराया गया था। जल संरक्षण के इस छोटे तालाब के तैयार होते ही उन्होंने इसमें मत्स्य पालन की शुरुआत कर दी। पहले जब वे केवल धान की खेती पर निर्भर थे, तब लागत निकालने के बाद अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता था। डबरी बनने के बाद हालात बदले और अब उन्हें हर मौसम में बेहतर आमदनी हासिल होने की ठोस उम्मीद बन गई है।

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शुरुआती चक्र में 2 क्विंटल उत्पादन और 25 हजार तक का मुनाफा

मछली पालन के पहले ही दौर में शिव बालक ने लगभग 2 क्विंटल मछलियों की बिक्री की, जिससे उन्हें 20 से 25 हजार रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई। इस शुरुआती कामयाबी से उनका हौसला काफी बढ़ा है। मौजूदा सत्र में वे मछलियों की खुराक और बेहतर दाना प्रबंधन पर विशेष ध्यान दे रहे हैं, ताकि उत्पादन दर में तेजी आए। उन्हें भरोसा है कि बेहतर देखभाल के दम पर आने वाले दिनों में मछलियों का वजन बढ़ेगा और बिक्री से होने वाली कमाई में और अधिक इजाफा दर्ज होगा।

चार प्रमुख प्रजातियों का संतुलित मिश्रित पालन

डबरी की गहराई और उसमें मौजूद पानी का अधिकतम दोहन करने के लिए शिव बालक ने एकल किस्म के बजाय मिश्रित मत्स्य पालन की तकनीक अपनाई है। उनके जल भंडार में रोहू, कतला, मृगल और ग्रास कार्प जैसी मांग वाली मछलियां एक साथ पाली जा रही हैं। जल स्तर की विभिन्न परतों में पलने वाली इन अलग-अलग प्रजातियों के संयोजन से डबरी के स्थान और प्राकृतिक भोजन का शत-प्रतिशत सदुपयोग सुनिश्चित होता है, जिससे किसी भी तरह की बर्बादी नहीं होती।

गर्मी के महीनों में सिंचाई और सब्जी उत्पादन से दोहरा लाभ

इस जल संरचना की उपयोगिता केवल जलीय जीवों के संवर्धन तक सीमित नहीं रहती। खरीफ सीजन में धान की कटाई पूरी होने के बाद, शिव बालक भीषण गर्मी के दिनों में इसी डबरी के संचित जल से सब्जियों की सिंचाई करते हैं। जल का यह चक्रीय प्रबंधन पानी की बर्बादी रोकता है और सूखे के महीनों में परिवार को ताजा सब्जियों की बिक्री से अतिरिक्त नकदी उपलब्ध कराता है। घाटे वाली परंपरागत खेती के मुकाबले यह बहुआयामी मॉडल उनके लिए आजीविका का स्थायी और भरोसेमंद समाधान बन चुका है।

सवाल-जवाब

किसान शिव बालक ने धान के अलावा क्या नया काम शुरू किया?
उन्होंने अपने खेत की डबरी में मछली पालन और गर्मी के मौसम में सब्जियों की खेती शुरू की है।
डबरी का निर्माण किस योजना के तहत हुआ था?
डबरी का निर्माण ग्रामीण रोजगार योजना के माध्यम से कराया गया था।
मछली पालन से शुरुआती दौर में कितनी कमाई हुई?
उन्होंने करीब 2 क्विंटल मछली बेचकर 20 से 25 हजार रुपये की कमाई की।
डबरी में कौन-कौन सी किस्मों की मछलियां पाली जा रही हैं?
डबरी में कतला, रोहू, मृगल और ग्रास कार्प जैसी किस्मों का मिश्रित पालन किया जा रहा है।
डबरी के पानी का दूसरा उपयोग क्या है?
धान की कटाई के बाद गर्मी के मौसम में इस पानी का उपयोग सब्जियों की सिंचाई के लिए किया जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Ravikash Gupta@ravikash·9 मिनट पहले

पारंपरिक खेती के भरोसे बैठने से बेहतर है कि किसान ऐसे छोटे प्रयोग करें। पानी का सही इस्तेमाल और मछली पालन से आमदनी का जरिया मिलना वाकई राहत की बात है, खासकर जब बाजार में उतार-चढ़ाव लगातार बने रहते हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 मिनट पहले

रवि जी, आपकी बात बिल्कुल सही है। पर क्या रोजगार गारंटी योजना के तहत बनने वाली ऐसी डबरी हर किसान को आसानी से मिल जाती है?

Rohan Verma@rohan-verma·29 मिनट पहले

धान के भरोसे बैठ रहने से अच्छा है किसान ऐसे नए रास्ते अपनाएं, तभी आमदनी सुधरेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·28 मिनट पहले

रोहन भाई, बात तो सही है। कई बार किसान अवैध कर्ज़ के जाल में ऐसे ही फंस जाते हैं, अगर समय रहते ऐसा कुछ न सोचें।

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