भीलवाड़ा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में बारिश का मौसम शुरू होते ही पोल्ट्री फार्म मालिकों के लिए प्रबंधन चुनौतियां बढ़ जाती हैं। मानसून के दौरान हवा में आर्द्रता और शेड के भीतर सीलन बढ़ने से रोगजनक कीटाणु तेजी से पनपने लगते हैं। यदि फार्म में बिछाई गई लिटर यानी बिछावन गीली हो जाए, तो वह मुर्गियों में जानलेवा संक्रमण का मुख्य कारण बनती है। ऐसे में पोल्ट्री पालकों को शेड की सुरक्षा, वायु प्रवाह और दैनिक सफाई पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
शेड का रखरखाव और वेंटिलेशन
बरसात के पानी को शेड के भीतर घुसने से रोकना प्राथमिक सुरक्षा उपाय है। इसके लिए छत और दीवारों में मौजूद किसी भी प्रकार के रिसाव या लीकेज की समय पर मरम्मत कराएं। शेड को चारों तरफ से पूरी तरह बंद करने की गलती न करें, क्योंकि इससे अंदर नमी जमा हो जाती है। इसके बजाय ऐसी व्यवस्था बनाएं जिससे ताजी हवा का आवागमन लगातार बना रहे और जहरीली गैसें बाहर निकल सकें।
लिटर प्रबंधन और जल प्रणालियों की जांच
मानसून में लिटर की स्थिति पर सबसे अधिक निगरानी रखनी चाहिए। शेड में बिछाए गए भूसे, लकड़ी के बुरादे या धान की भूसी में जहां भी नमी नजर आए, उस हिस्से को तुरंत बाहर निकालकर सूखी लिटर बिछानी चाहिए। इसके अलावा समय-समय पर लिटर को उलट-पलट करते रहना आवश्यक है। गीली बिछावन से निकलने वाली बदबू और अमोनिया गैस मुर्गियों की श्वसन प्रणाली को नुकसान पहुंचाती है। साथ ही, पानी की टंकी, सप्लाई पाइप और ड्रिंकर की रोजाना जांच करें ताकि टपकता हुआ पानी लिटर को गीला न कर सके।
मुर्गियों में होने वाले रोग और शुरुआती लक्षण
बरसात के दिनों में पोल्ट्री पक्षियों में दस्त, श्वसन संबंधी बीमारियां, आंख और नाक से पानी गिरना, शारीरिक कमजोरी, भूख में कमी तथा कोक्सीडियोसिस जैसी समस्याएं प्रमुखता से सामने आती हैं। दूषित जल, गीली बिछावन और गंदगी इन रोगों के फैलने की गति को बढ़ा देती हैं। यदि कोई मुर्गी सुस्त दिखाई दे, समूह से अलग बैठी हो या उसका मल असामान्य हो, तो उसे तुरंत स्वस्थ पक्षियों से अलग थलग कर देना चाहिए। बिना डॉक्टरी जांच के बीमारी का सही कारण जानना संभव नहीं होता, इसलिए गंभीर स्थिति में पशु चिकित्सक का परामर्श आवश्यक है।
देसी उपाय, स्वच्छता और जैव-सुरक्षा के नियम
फार्म को रोगों से मुक्त रखने के लिए स्वच्छता और सूखापन सबसे प्रभावी देसी उपाय हैं। गीले स्थानों को तुरंत साफ करें, पीने के बर्तनों की रोजाना धुलाई करें और दाने-चारे को जमीन से ऊपर सूखी जगह पर रखें। नमी वाले या फफूंद लगे चारे का सेवन मुर्गियों के लिए घातक हो सकता है। फार्म के आसपास मक्खी, मच्छर और चूहों की रोकथाम करें। बाहर से आने वाले व्यक्तियों और अन्य पक्षियों का प्रवेश शेड में प्रतिबंधित रखें। नीम की पत्तियां रखने जैसे पारंपरिक उपाय सहायक हो सकते हैं, लेकिन इन्हें इलाज मानने के बजाय सफाई और जैव-सुरक्षा को ही बचाव का मुख्य आधार बनाएं।
टीकाकरण और दवाओं के सही इस्तेमाल के निर्देश
मुर्गियों को हमेशा स्वच्छ और ताजा पीने का पानी उपलब्ध कराएं और उनके नियमित टीकाकरण की समय-सारणी का कड़ाई से पालन करें। इस मौसम में पानी और चारे की गुणवत्ता का निरंतर परीक्षण जरूरी है। फार्म में उपयोग होने वाले बर्तनों, फीडर और ड्रिंकर को नियमित रूप से डिसइन्फेक्ट करें। बीमारी फैलने पर बिना पशु चिकित्सक की सलाह के खुद से एंटीबायोटिक या अन्य दवाएं न दें, क्योंकि गलत दवा का प्रयोग पक्षियों के स्वास्थ्य को अधिक नुकसान पहुंचा सकता है।
दैनिक निरीक्षण और आपातकालीन स्थिति में कदम
मुर्गी पालकों को सुबह और शाम के समय कुछ मिनट निकालकर शेड का गहन निरीक्षण करना चाहिए ताकि प्रारंभिक स्तर पर ही बीमारी का पता लगाया जा सके। यदि मुर्गियों में अचानक अधिक संख्या में मौतें होने लगें, सांस लेने में गंभीर समस्या दिखे, गर्दन टेढ़ी होने के लक्षण नजर आएं या बीमारी तेजी से फैलने लगे, तो घरेलू उपचारों के भरोसे न रहें। ऐसी आपात स्थिति में बिना समय गंवाए निकटतम पशु चिकित्सक या पशुपालन विभाग के अधिकारियों से संपर्क करें।



















