दुनियाभर के फैशन ब्रांड्स अब यह सोचने लगे हैं कि उनके कपड़े कहां बनने चाहिए, और ब्रोकरेज फर्म 360 वन कैपिटल की एक नई रिपोर्ट कहती है कि यही बदलाव आखिरकार भारत के टेक्सटाइल और अपैरल सेक्टर को वह लंबा ग्रोथ फेज दे सकता है जिसका इंतजार दो दशक से हो रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक यह कोई अस्थायी उछाल नहीं बल्कि एक बड़ा ढांचागत मौका है, जो कंपनियों के चीन पर निर्भरता कम करने और सोर्सिंग को कई देशों में बांटने की कोशिश से पैदा हुआ है।
ब्रांड्स चीन से दूरी क्यों बना रहे हैं
रिपोर्ट के अनुसार भूराजनीतिक तनाव और मजबूत, कम केंद्रित सप्लाई चेन की जरूरत के चलते अपैरल खरीदार अब सिर्फ एक देश पर निर्भर रहने की बजाय वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग ठिकानों की तलाश कर रहे हैं। भारत लंबे समय से इसी मांग को भुनाना चाहता था। ब्रोकरेज का मानना है कि जिन कंपनियों के पास बड़े पैमाने पर गारमेंट उत्पादन, आपस में जुड़ा हुआ मैन्युफैक्चरिंग ढांचा, ग्राहकों से मजबूत रिश्ते और अनुशासित कामकाज है, उन्हें इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा।
पहले भी चूक चुका है भारत
रिपोर्ट यह नहीं मानती कि यह मौका अपने आप हाथ लग जाएगा। इसमें कहा गया है कि इससे पहले भी भारत को ऐसे मौके मिले थे, लेकिन वह उन्हें टिकाऊ निर्यात बढ़त में नहीं बदल सका, इसलिए सिर्फ अनुकूल ट्रेड पॉलिसी इस बार भी काफी नहीं होगी। आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं, ग्लोबल अपैरल ट्रेड में भारत की हिस्सेदारी सालों से करीब 3 प्रतिशत पर अटकी है, जबकि पिछले दो दशकों में बांग्लादेश की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 9 से 10 प्रतिशत और वियतनाम की करीब 6 से 7 प्रतिशत हो गई है। ब्रोकरेज के मुताबिक भारत की असली लड़ाई अब सस्ते मजदूरों तक सीमित नहीं रह गई है। खरीदार अब सप्लायर को इस आधार पर परखते हैं कि वह कितना उत्पादन कर सकता है, कितनी तेजी से डिलीवरी देता है, उसकी लॉजिस्टिक्स, कंप्लायंस और सस्टेनेबिलिटी कैसी है और उसकी सप्लाई चेन कितनी भरोसेमंद है।
गारमेंटिंग ही सबसे बड़ी कमजोरी और मौका
रिपोर्ट में गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग को भारत की सबसे बड़ी कमजोरी के साथ-साथ सबसे बड़ा मौका भी बताया गया है। यहां उत्पादन इकाइयां बिखरी हुई और आकार में इतनी छोटी हैं कि वे बड़े ग्लोबल ब्रांड्स के भारी ऑर्डर अकेले संभाल नहीं पातीं, जिससे भारतीय कंपनियां जितना काम मिलता है उसमें से पूरा फायदा नहीं उठा पातीं। रिपोर्ट के मुताबिक आगे चलकर तय यह करेगा कि हर मजदूर कितना उत्पादन दे रहा है, फैक्ट्री का रोजमर्रा का कामकाज कैसा है, ऑटोमेशन कितना अपनाया गया है और डिलीवरी समय पर हो रही है या नहीं, न कि सिर्फ मजदूरी कितनी कम है।
कॉटन से आगे बढ़ने की जरूरत
रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत को अपने फाइबर बेस को कॉटन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। ग्लोबल मांग अब मानव निर्मित फाइबर, परफॉर्मेंस अपैरल और टेक्निकल टेक्सटाइल की तरफ बढ़ रही है। इसका मतलब है कि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को एडवांस्ड फाइबर और यार्न बनाने की क्षमता विकसित करनी होगी, साथ ही कॉटन की उत्पादकता, क्वालिटी और उसकी ट्रेसेबिलिटी यानी स्रोत तक पहुंच को भी बेहतर बनाना होगा।
ट्रेड डील तभी काम आएगी जब डिलीवरी हो
हाल में लागू हुए भारत-ब्रिटेन एफटीए जैसे ट्रेड समझौतों से खरीदारों के लिए भारत से सोर्सिंग सस्ती हो सकती है, लेकिन ब्रोकरेज का कहना है कि टैरिफ में मिली छूट तभी नियमित ऑर्डर में बदलेगी जब भारतीय फैक्ट्रियां बड़े पैमाने पर डिलीवरी देने के लिए वाकई तैयार हों। रिपोर्ट में कहा गया, "इंडस्ट्री को इसलिए कई ट्रेड एग्रीमेंट्स के साथ-साथ गारमेंटिंग क्षमता, तकनीकी काबिलियत, कंप्लायंस और मजदूर-प्रधान नए मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर्स में भी ठोस विस्तार चाहिए।"
फायदा आखिर किसे मिलेगा
आगे चलकर ऑटोमेशन, सस्टेनेबिलिटी और ट्रेसेबिलिटी ही तय करेंगे कि कौन सी कंपनी बाकियों से आगे निकलती है, ऐसा ब्रोकरेज का मानना है। रिपोर्ट का निचोड़ यही है कि भारत के टेक्सटाइल सेक्टर के सामने मौका बड़ा और असली है, लेकिन इसका सबसे ज्यादा फायदा उन्हीं कंपनियों को मिलेगा जो पैमाना, इंटीग्रेशन, प्रोडक्टिविटी, प्रोडक्ट इनोवेशन और सोच-समझकर पूंजी लगाने के तरीके को साथ लेकर चलेंगी, न कि सिर्फ अनुकूल ट्रेड पॉलिसी या सस्ती मजदूरी के भरोसे बैठी कंपनियों को।




















