भारत के टेक और कॉर्पोरेट जगत में इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा डिक्सन टेक्नोलॉजीज और वीवो के बीच होने वाली बड़ी साझेदारी की हो रही है, और इसका सीधा असर मंगलवार को शेयर बाजार पर भी दिखा। दोनों कंपनियों के बीच लंबे समय से अटके इस जॉइंट वेंचर को सरकार की ओर से बहुत जल्द औपचारिक मंजूरी मिलने की उम्मीद है। इसी खबर के दम पर डिक्सन का शेयर इंट्राडे कारोबार में 3.15 प्रतिशत की छलांग लगाकर 12,082 रुपये के स्तर पर पहुंच गया। यह सौदा भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र के लिए बड़ा मोड़ साबित हो सकता है, क्योंकि इसके बाद एक टॉप स्मार्टफोन ब्रांड का देश में होने वाला उत्पादन पूरी तरह भारतीय प्रबंधन के हाथ में आ जाएगा।
इस बड़े प्रशासनिक और विनिर्माण समझौते को इंटर-मिनिस्ट्रियल ग्रुप (आईएमजी) पहले ही सैद्धांतिक तौर पर हरी झंडी दे चुका है। अब इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से आखिरी औपचारिक पत्र जारी होने की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। फिलहाल इस पूरे मामले पर डिक्सन या वीवो की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। माना जा रहा है कि इस कदम से चीनी कंपनियों के लिए भारत में नियामकीय जोखिम कम होंगे और आत्मनिर्भर भारत के तहत लोकल वैल्यू एडिशन को भी अच्छा बढ़ावा मिलेगा।
नोएडा प्लांट की कमान बदलेगी
इस वेंचर का सबसे अहम रणनीतिक पहलू यह है कि वीवो के नोएडा वाले विशाल विनिर्माण प्लांट को भी इसी नए ढांचे में शामिल किया जा रहा है। व्यवस्था लागू होते ही डिक्सन टेक्नोलॉजीज की एक सहायक कंपनी इस प्लांट के संचालन और स्मार्टफोन के ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग यानी ओईएम ऑर्डर्स की पूरी जिम्मेदारी अपने हाथ में ले लेगी। कमान भारतीय स्वामित्व वाली कंपनी के पास जाने से वीवो को भारतीय एजेंसियों के सामने अपने नियामकीय जोखिम घटाने का सुरक्षित रास्ता मिल जाएगा। दूसरी ओर डिक्सन के रेवेन्यू में जबरदस्त उछाल आना तय है, क्योंकि वीवो ने साल 2025 में करीब 3.5 करोड़ हैंडसेट बेचे हैं और खुद डिक्सन ने भी 3.2 करोड़ मोबाइल फोन बनाए हैं।
आंकड़ों में डिक्सन की मजबूत पकड़
अगर डिक्सन टेक्नोलॉजीज के वित्तीय प्रदर्शन को देखें तो कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 48,873 करोड़ रुपये का रेवेन्यू दर्ज किया है। इसमें अकेले मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (ईएमएस) वर्टिकल की हिस्सेदारी 44,257 करोड़ रुपये रही है। ये आंकड़े बताते हैं कि कंपनी के पूरे कारोबार में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं, और वीवो के जुड़ने के बाद इसमें और रफ्तार आना तय है। इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में मार्जिन वैसे तो कम रहता है, लेकिन वीवो के महंगे हैंडसेट और बड़े वॉल्यूम के चलते डिक्सन के एब्सोल्यूट एबिटडा में जोरदार सुधार देखने को मिल सकता है।
मोतीलाल ओसवाल और निप्पॉन ने झोंका पैसा
इस सौदे की भनक लगते ही बाजार के बड़े फंड हाउसों ने डिक्सन के शेयर आक्रामक अंदाज में खरीदने शुरू कर दिए हैं। इनमें सबसे बड़ा खरीदार रहा मोतीलाल ओसवाल म्यूचुअल फंड, जिसने 13,307.96 रुपये प्रति शेयर की औसत कीमत पर डिक्सन के 14.45 लाख शेयर खरीदे हैं। इस खरीद के बाद कंपनी में उसकी कुल हिस्सेदारी 2.24 प्रतिशत से सीधे बढ़कर 4.63 प्रतिशत पर पहुंच गई है। इसके साथ ही निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट लिमिटेड ने भी कंपनी पर भरोसा जताते हुए करीब 26.8 करोड़ रुपये की वैल्यू वाले 22.13 लाख से ज्यादा शेयर अपने पोर्टफोलियो में जोड़े हैं। यह डिक्सन की कुल इक्विटी का 3.62 प्रतिशत हिस्सा है, और इससे साफ झलकता है कि बड़े निवेशक कंपनी के आने वाले कल को लेकर कितने भरोसेमंद हैं।













