उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले से एक ऐसी मिसाल सामने आई है जो कम उम्र में कड़ी मेहनत और लगन की अनोखी दास्तान बयां करती है। यहाँ आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला एक किशोर छात्र अपनी स्कूली किताबों के साथ-साथ खेतों की मिट्टी से भी जुड़ रहा है। छात्र दिवांशु मौर्य ने अपनी पढ़ाई के साथ खेती-किसानी की दुनिया में कदम रखा है और वह इन दिनों जैविक तरीके से बोड़ा की फसल तैयार करने में जुटे हुए हैं। कम उम्र में खेती की इस नई राह को चुनकर उन्होंने आसपास के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।
अपनी दिनचर्या के बारे में बात करते हुए दिवांशु मौर्य ने बताया कि वह अपनी पढ़ाई को पूरा समय देते हैं। वह सुबह और शाम के वक्त अपनी पढ़ाई करते हैं और बाकी बचे हुए खाली समय को अपने खेत पर बिताते हैं। खेती के प्रति उनका यह शौक और समर्पण उन्हें बाकी बच्चों से अलग बनाता है। उनका यह प्रयास न केवल उनके अनुशासन को दिखाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि अगर लगन सच्ची हो तो कम उम्र में भी बड़े काम किए जा सकते हैं। इस समय वह लगभग एक बीघे के क्षेत्रफल में बोड़ा की खेती कर रहे हैं और आगे चलकर इस दायरे को और भी अधिक बढ़ाने का पक्का इरादा रखते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य खेती के जरिए न केवल अच्छी कमाई करना है, बल्कि अपने परिवार का आर्थिक रूप से सहारा बनना भी है।
जैविक खाद पर जोर और रासायनिक उर्वरकों से परहेज
आज के दौर में जहाँ अधिकांश किसान रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर निर्भर होते जा रहे हैं, वहीं इस युवा छात्र ने शुरुआत से ही एक अलग रास्ता चुना है। दिवांशु अपनी बोड़ा की फसल में केमिकल यानी रासायनिक खाद का उपयोग बहुत ही कम मात्रा में करते हैं। इसके विपरीत, वह खेतों में जैविक खाद का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं। उनका यह मानना है कि प्राकृतिक और जैविक तरीकों से तैयार की गई फसलों की बाजार में हमेशा से एक अलग और मजबूत मांग बनी रहती है।
इसके साथ ही, जैविक खाद का यह विकल्प मिट्टी की उर्वरता और उसकी सेहत को लंबे समय तक बनाए रखने में भी बेहद मददगार साबित होता है। हालांकि कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का यह भी मानना है कि किसी भी फसल का कुल उत्पादन और उसकी बाजार में बिक्री पूरी तरह से कई अलग-अलग परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसके बावजूद, दिवांशु अपनी इस फसल की बेहतरीन पैदावार और आगामी बिक्री को लेकर बेहद उत्साहित और आशान्वित नजर आ रहे हैं।
लागत और मुनाफे का पूरा गणित
इस पूरी खेती में आने वाले खर्च और मुनाफे की बात करें तो आँकड़े काफी उत्साहजनक नजर आते हैं। दिवांशु मौर्य के अनुसार, एक बीघे जमीन में बोड़ा की फसल उगाने के लिए कुल मिलाकर लगभग आठ हजार रुपये की लागत आई है। इस मामूली निवेश के बाद उन्हें पूरी उम्मीद है कि वह अपनी इस फसल से बाजार में लगभग 40 हजार से 50 हजार रुपये तक की शुद्ध आमदनी हासिल कर लेंगे।
हालाँकि, यह स्पष्ट है कि उनकी यह वास्तविक आमदनी पूरी तरह से फसल के कुल उत्पादन, उस समय के मौजूदा बाजार भाव और सही समय पर होने वाली बिक्री पर निर्भर करेगी। इसके बावजूद, आठवीं कक्षा में पढ़ाई करने के साथ-साथ कृषि जैसे मेहनत वाले कार्य को संभालना इस छात्र की अद्वितीय मेहनत और कृषि के प्रति उसकी गहरी रुचि को साफ तौर पर दर्शाता है। वह एक तरफ जहाँ खेती के दांव-पेंच सीख रहे हैं, वहीं अपनी नियमित पढ़ाई भी पूरी तन्मयता से जारी रखे हुए हैं। उनकी यह अनूठी पहल न केवल उनके हमउम्र बच्चों के लिए, बल्कि क्षेत्र के पारंपरिक किसानों के लिए भी एक बड़ी प्रेरणा बन सकती है।
भविष्य की योजनाएं और उन्नत तकनीक
दिवांशु की यह कोशिश यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके इरादे आने वाले समय के लिए काफी बड़े हैं। उनका कहना है कि वह भविष्य में बोड़ा की खेती के क्षेत्रफल को और अधिक विस्तारित करना चाहते हैं। उनका मुख्य लक्ष्य खेती में आधुनिक तकनीकों का समावेश करना और जैविक खादों के अधिक प्रयोग के जरिए बेहतर से बेहतर फसल उत्पादन प्राप्त करना है। पढ़ाई के साथ-साथ खेती में उनका यह अनूठा कदम उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के ढेरों अवसर प्रदान कर रहा है।


















