शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव और हालिया मंदी के माहौल के बीच निवेशकों के लिए अपनी रणनीतियों को नए सिरे से परखने का अवसर बना है। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड ने बाजार के आम रुख के विपरीत दिशा में काम करने वाला नया आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल कॉन्ट्रा फंड बाजार में उतारा है। यह एक ओपन-एंडेड इक्विटी योजना है, जो बुनियादी तौर पर कॉन्ट्रेरियन निवेश दर्शन के आधार पर संचालित होती है। इस निवेश रणनीति की नींव इस समझ पर टिकी है कि बाजार में लगातार सभी एसेट्स का मूल्यांकन सही नहीं होता। शेयरों, डेट इंस्ट्रूमेंट्स या फिर रियल एस्टेट जैसे किसी भी एसेट क्लास में स्वाभाविक रूप से गलत कीमत तय होने यानी मिसप्राइसिंग की स्थितियां बनती हैं, जिससे सूझबूझ वाले निवेशकों के लिए नए रास्ते खुलते हैं।
गहन रिसर्च और बाजार की धारणा बदलने के इंतजार पर जोर
यह फंड ऐसे शेयरों और क्षेत्रों की तलाश करता है जो बाजार की आम राय से बाहर हो चुके हैं, लेकिन मजबूत रिसर्च के जरिए उनमें भविष्य की मजबूती नजर आती है। योजना का मुख्य फोकस उन निवेशकों को जोड़ना है जो तुरंत नतीजों की उम्मीद किए बिना लंबी अवधि की सोच के साथ पूंजी लगाना चाहते हैं और बाजार की नकारात्मक धारणा के सामान्य होने तक धैर्य रखने को तैयार हैं। इस पूरी निवेश प्रक्रिया और फंड का संचालन अनुभवी निवेश विशेषज्ञ संकरन नरेन के नेतृत्व में किया जा रहा है। उनके साथ फंड प्रबंधन की इस जिम्मेदारी को धर्मेश कक्कड़, साक्षात गोयल और गौरव साझा कर रहे हैं।
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड के ईडी और सीआईओ संकरन नरेन ने अपनी निवेश सोच साझा करते हुए स्पष्ट किया कि कॉन्ट्रेरियन दृष्टिकोण केवल औने-पौने दाम पर मिल रहे सस्ते शेयरों को जमा कर लेना नहीं है। उनका मानना है कि इसके लिए जमीनी रिसर्च और धैर्यपूर्वक समय देने की सख्त जरूरत होती है। जब किसी स्टॉक में खरीदारों की संख्या काफी घट जाती है और बिकवाली का भारी दबाव पैदा होता है, तब शेयरों के भाव अक्सर वास्तविक मूल्य से नीचे फिसल जाते हैं। यही वह समय होता है जब कॉन्ट्रेरियन फंड उन कंपनियों में हिस्सेदारी जुटाना शुरू करता है।
मल्टी-कैप दायरा और वीसीटीएस फ्रेमवर्क की रणनीति
संकरन नरेन के मुताबिक इस योजना के पास विभिन्न मार्केट कैपिटलाइजेशन वाली कंपनियों में निवेश चुनने की पूरी आजादी रहेगी, यानी यह लार्ज, मिड और स्मॉल कैप में अवसर तलाश सकती है। इसके बावजूद टीम का प्राथमिक लक्ष्य ऐसे मजबूत व्यवसायों की पहचान करना होगा जो हालिया दौर में खराब प्रदर्शन से जूझ रहे हैं। कॉन्ट्रेरियन स्थितियों में किसी भी शेयर का कायापलट तुरंत नहीं होता, इसलिए सही शेयर चुनना और धैर्य से उसका परिणाम देखना बेहद जरूरी माना गया है।
योजना के भीतर सही शेयरों के चयन के लिए विभिन्न कारकों को शामिल किया गया है, जिन्हें वीसीटीएस (VCTS) फ्रेमवर्क के तहत व्यवस्थित किया गया है
- कैलकुलेट (Calculate): किसी भी कंपनी में हिस्सेदारी लेने से पहले गहन विश्लेषण, वित्तीय गणना और ठोस रिसर्च को अनिवार्य रूप से लागू करना।
- लीवरेज (Leverage): भारी कर्ज के बोझ तले दबी कंपनियों के शेयरों को लेकर विशेष सतर्कता और सावधानी बरतना।
- ओनरशिप (Ownership): जिन कंपनियों में बड़े संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी तुलनात्मक रूप से कम हो, उन्हें चयन प्रक्रिया में उपयोगी आधार बनाना।
- अपसाइड (Upside): केवल उन्हीं कंपनियों के चयन को प्राथमिकता देना जिनमें आगे चलकर भाव में तेज सुधार और मुनाफे की स्पष्ट गुंजाइश दिखाई दे।
- डिसरप्शन (Disruption): इंडस्ट्री या तकनीकी बदलावों से पैदा होने वाले जोखिमों को बारीकी से समझना और बिना पूरी जांच के किसी फैसले में जल्दबाजी न करना।
पोर्टफोलियो निर्माण और बाहर निकलने का स्पष्ट नियम
फंड की प्रबंधन टीम निवेश प्रक्रिया के दौरान बाजार की मौजूदा भीड़ के रुख से हटकर निर्णय लेती है। टीम ऐसी कंपनियों की पड़ताल करती है जिनका डेट-टू-इक्विटी अनुपात संतुलित और मजबूत हो। इसके अलावा संस्थागत शेयरधारिता के स्तर पर नजर रखी जाती है और ऐसे अवसरों को खोजा जाता है जहां सेंटीमेंट बेहद कमजोर हो चुके हों, लेकिन कंपनी की सामान्य होती अर्निंग्स के दम पर कारोबार में वापस तेजी आने की उम्मीद हो। साथ ही उन सेक्टरों का भी लगातार आकलन किया जाता है जिनमें हाल ही में बड़े संरचनात्मक बदलाव या तेज उथल-पुथल देखने को मिली है।
किसी शेयर से बाहर निकलने यानी एग्जिट की रणनीति भी पहले से तय सिद्धांतों पर चलती है। जब बाजार की गलत समझ के कारण बनी सस्ती कीमत का अंतर समाप्त हो जाता है, कंपनी को लेकर व्यापक बाजार धारणा पूरी तरह सकारात्मक हो जाती है, या फिर टीम को उससे बेहतर निवेश का कोई दूसरा विकल्प मिल जाता है, तब उस शेयर को बेचकर मुनाफा बुक कर लिया जाता है।
वैश्विक दबाव और वैल्यूएशन की मौजूदा चुनौतियां
बाजार के विभिन्न हिस्सों में होने वाली गलत प्राइसिंग ही कॉन्ट्रेरियन अवसरों की मुख्य वजह बनती है। वर्तमान समय में इस पूरी प्रक्रिया को कई वैश्विक और घरेलू कारक प्रभावित कर रहे हैं। इनमें दुनिया भर में आर्थिक वृद्धि की चिंताएं, पश्चिम एशिया में बना तनाव, विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई द्वारा पूंजी की निकासी, कई सेक्टरों में आने वाले बुनियादी बदलाव, केंद्रीय बैंकों की सख्त मॉनेटरी पॉलिसी, चक्रीय मंदी, बहुत अधिक कर्ज वाली कंपनियों का जोखिम, वैल्यूएशन तथा कंपनियों की अर्निंग्स के साथ-साथ गिरते रुपये का असर भी प्रमुखता से शामिल है।
वैश्विक स्तर पर संकेंद्रण का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि अमेरिका में एसएंडपी 500 इंडेक्स की शीर्ष 10 कंपनियों की कुल हिस्सेदारी बढ़कर अब 38% पर पहुंच चुकी है, जबकि वर्ष 2016 में यह हिस्सा मात्र 19% था। यह असामान्य फैलाव इसलिए हुआ है क्योंकि मुट्ठी भर तकनीकी कंपनियों का दबदबा और एआई को लेकर बना भारी उत्साह उनके वैल्यूएशन को ऐतिहासिक ऊंचाई पर खींच ले गया है। इसके विपरीत भारतीय बाजार में कंपनियों की भागीदारी कहीं अधिक व्यापक दिखाई देती है, हालांकि विभिन्न सेक्टरों से निवेशकों को मिलने वाला रिटर्न काफी मिलाजुला और असमान रहा है। यही असमानता कॉन्ट्रेरियन नजरिए वाले निवेशकों के लिए रिसर्च आधारित खरीदारी के रास्ते खोलती है।



















