मानसून की दस्तक के साथ ही खेतों और चरागाहों में नई घास उगने लगती है, जो पशुपालकों के लिए बड़ी चुनौती बनकर आती है। इस मौसम में हरी घास के साथ-साथ कई ऐसी जंगली और जहरीली वनस्पति भी पनप जाती हैं, जो बकरियों के स्वास्थ्य के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं। चारे में मौजूद हानिकारक कीड़े और दूषित घास का सेवन करने से अक्सर बकरियों की तबीयत बिगड़ जाती है, और समय पर ध्यान न देने से उनकी मौत भी हो सकती है। अपनी बकरियों को इन खतरों से सुरक्षित रखने के लिए पशु विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए कुछ आवश्यक दिशा-निर्देशों का पालन करना बेहद जरूरी है।
चारे के चुनाव में रखें सावधानी
पशु चिकित्सक डॉक्टर अजय रघुवंशी के अनुसार, बरसात के दौरान चारे को लेकर विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। पशुओं को खिलाने से पहले चारे की बारीकी से जांच करना अनिवार्य है। यदि घास में कोई ऐसी वनस्पति दिखाई दे जो सामान्य से अलग या संदेहास्पद हो, तो उसे तुरंत हटा देना चाहिए। बकरियों को हमेशा गीली और दलदली घास खाने से बचाएं। गीला चारा बकरियों में पाचन संबंधी समस्याओं और संक्रमण को बढ़ावा देता है, इसलिए उन्हें केवल सूखा और साफ चारा ही देना सुनिश्चित करें।
रहन-सहन और स्वास्थ्य प्रबंधन
बकरियों की सेहत को दुरुस्त रखने के लिए उनके रहने की जगह का चुनाव बहुत मायने रखता है। उन्हें हमेशा सूखी और ऊंचाई वाली जगहों पर रखें, ताकि जलभराव की स्थिति न बने। अधिक पानी या कीचड़ वाली जगहों पर बकरियों को रखने से उनके बीमार होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। साथ ही, यदि झुंड में से कोई एक बकरी बीमार नजर आए, तो उसे बिना देरी किए स्वस्थ जानवरों से अलग कर दें। यह सावधानी अन्य पशुओं में बीमारी फैलने से रोकने में सबसे कारगर साबित होती है।
अनिवार्य टीकाकरण
बरसात के सीजन में बकरियों के बचाव के लिए टीकाकरण सबसे महत्वपूर्ण कदम है। पशुपालकों को अपनी बकरियों को प्रमुख रूप से दो टीके जरूर लगवाने चाहिए, जिसमें टी-टो टॉक्सिन और पीपीआर का टीका शामिल है। इन टीकों को लगवाने के लिए आप अपने नजदीकी पशु चिकित्सालय में संपर्क कर सकते हैं। यह टीकाकरण प्रक्रिया बहुत ही किफायती है और मात्र 100 रुपये के खर्च में उपलब्ध है। सही समय पर टीकाकरण करवाने से बकरियों को घातक बीमारियों से बचाया जा सकता है और उनके स्वास्थ्य की रक्षा की जा सकती है।


















