झारखंड के पलामू जिले में इस बार धान के किसानों के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। एल नीनो के असर से मानसून की रफ्तार धीमी पड़ी है और कई इलाकों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज हुई है। जिन खेतों में अब तक रोपाई नहीं हो पाई है, वहां किसान लगातार आसमान की ओर देख रहे हैं और अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं।
बारिश कम तो फसल पर सीधा खतरा
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आने वाले दिनों में भी बारिश का यही हाल रहा तो धान की उपज को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है, क्योंकि रोपाई में देरी होने से पौधों को पकने के लिए पूरा समय नहीं मिल पाता और सीधे पैदावार पर असर पड़ता है। पलामू भौगोलिक रूप से रैन शैडो जोन में आता है, यानी पहाड़ों की ओट में होने के कारण यहां वैसे भी दूसरे इलाकों की तुलना में बारिश कम होती है। ऐसे हालात को देखते हुए विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे सिर्फ धान पर निर्भर न रहकर एक वैकल्पिक योजना यानी प्लान बी भी तैयार रखें, ताकि मानसून धोखा दे तो भी घाटा सीमित रहे और आमदनी पर असर कम पड़े।
मड़ुआ की वापसी क्यों हो रही है
चियांकी स्थित क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश शाह किसानों को धान के बदले मड़ुआ यानी रागी उगाने की सलाह दे रहे हैं। उनके मुताबिक कभी झारखंड के लगभग हर कोने में मड़ुआ की खेती बड़े पैमाने पर होती थी, लेकिन जैसे जैसे धान की खेती का रकबा फैलता गया, मड़ुआ की खेती पीछे छूटती चली गई। अब बदलते मौसम, घटती बारिश और बाजार में बढ़ती मांग ने मड़ुआ को फिर से किसानों के लिए मुनाफे की फसल बना दिया है। डॉ. शाह के अनुसार यह फसल मध्यम दर्जे की जमीन में भी आसानी से उगाई जा सकती है और कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती है, इसलिए सूखा झेल रहे या कम बारिश वाले इलाकों के लिए यह बेहतर विकल्प साबित हो सकती है। हालांकि उन्होंने चेताया कि शुरुआती दौर में खरपतवार पर काबू रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि समय पर खरपतवार न हटाया जाए तो पौधों की बढ़वार रुक जाती है और उत्पादन गिर सकता है।
खरपतवार से निपटने का तरीका
खरपतवार नियंत्रण के लिए डॉ. शाह पेंडीमैथिलिन दवा के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। इसे 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के अनुपात में घोलकर खेत में छिड़का जा सकता है। जो किसान छिड़काव नहीं करना चाहते, वे प्रति एकड़ करीब 1 लीटर दवा को खाद में मिलाकर पूरे खेत में समान रूप से बिखेर भी सकते हैं। इस तरीके से भी खरपतवार पर अच्छा नियंत्रण मिलता है, पौधों की बढ़वार बेहतर होती है और आखिरकार उपज बढ़ने की संभावना बनती है।
कौन सी किस्म चुनें, कितनी होगी कमाई
किस्म के चुनाव को लेकर बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची ने बिरसा मड़ुआ-3 नाम की किस्म विकसित की है, जो झारखंड की जलवायु के हिसाब से ढली हुई है और अच्छी उपज देती है। इसकी खेती में प्रति एकड़ लगभग 22 से 24 हजार रुपये का खर्च आता है। अगर किसान सही तकनीक अपनाएं और फसल को बाजार में उचित दाम मिल जाए, तो लागत से करीब दोगुना मुनाफा कमाया जा सकता है।
सेहत के प्रति सजगता से बढ़ी मांग
लोगों में सेहत को लेकर जागरूकता बढ़ने के साथ मड़ुआ की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। इससे तैयार आटा, बिस्कुट, कुकीज़ और दलिया जैसे उत्पाद बाजार में अच्छे दाम पर बिक रहे हैं, जिससे किसानों को अतिरिक्त कमाई का मौका मिल रहा है। ऐसे हालात में जब एल नीनो की वजह से धान की खेती पर खतरा मंडरा रहा है, मड़ुआ जैसी फसल अपनाकर किसान न सिर्फ नुकसान से बच सकते हैं बल्कि अपनी कमाई भी बढ़ा सकते हैं।




















