कमोडिटी बाजारों में अक्सर यह मान लिया जाता है कि खदानों से कम उत्पादन होने पर धातुओं के दाम अपने आप चढ़ने लगेंगे। चांदी के मौजूदा हालात इस धारणा को पूरी तरह उलट रहे हैं। सर्राफा गलियारों में खनन और खपत के बुनियादी संतुलन के मुकाबले वैश्विक वित्तीय तंत्र के व्यापक कारक ज्यादा असरदार साबित हो रहे हैं। अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में मजबूती, बॉन्ड यील्ड की बढ़ती चमक और वायदा सौदों में बड़े फंड्स द्वारा की जा रही बिकवाली ने सफेद धातु के पारंपरिक समीकरणों को पीछे धकेल दिया है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिक्विडिटी का प्रवाह बदलने लगता है, तो जमीन पर मौजूद भौतिक आपूर्ति के आंकड़े बाजार की दिशा तय नहीं कर पाते।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख से बिगड़ा कीमती धातुओं का माहौल
कीमती धातुओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती अमेरिकी केंद्रीय बैंक की तरफ से आ रही सख्त आर्थिक नीतियां हैं। हालिया समीक्षा में ब्याज दरों में कोई फेरबदल नहीं किया गया, फिर भी वायदा कारोबार यह मानकर चल रहा है कि दिसंबर में दरों में और इजाफा होने की 80% संभावना बनी हुई है। सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड और डॉलर निवेशकों को बिना किसी झंझट के बढ़िया रिटर्न दिला रहे हैं। चूंकि चांदी या सोने जैसी गैर-उपज वाली परिसंपत्तियों पर कोई नियमित ब्याज नहीं मिलता, इसलिए बड़े वित्तीय संस्थान और हेज फंड्स अपनी पूंजी को धातु बाजार से खींचकर सरकारी प्रतिभूतियों व नकद संपत्तियों में लगा रहे हैं।
युद्ध के तनाव के बीच सेफ हेवन की धारणा क्यों टूटी
पारंपरिक तौर पर सीमाई टकराव या अंतरराष्ट्रीय विवाद गहराने पर निवेशक अपनी पूंजी बचाने के लिए सोने और चांदी की तरफ दौड़ते रहे हैं। इस दौर में वह पुराना नियम काम नहीं कर रहा है। वित्तीय दुनिया की नजर केवल बारूद या सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात का हिसाब लगाया जा रहा है कि बढ़ते टकराव से क्रूड ऑयल, महंगाई और ब्याज दरों की चाल पर क्या असर पड़ेगा। बाजार को आशंका है कि यदि ऊर्जा की लागत बढ़ने से महंगाई अनियंत्रित हुई, तो केंद्रीय बैंक अपनी सख्त मौद्रिक नीति को लंबे समय तक जारी रखने को मजबूर होंगे। अधिक समय तक ऊंची ब्याज दरें धातुओं के निवेश के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होती हैं।
गोदामों में रखा पुराना स्टॉक और डेफिसिट का असली सच
आमतौर पर सालाना आपूर्ति में कमी की खबर सुनकर यह समझ लिया जाता है कि भौतिक धातु खत्म हो गई है। हकीकत में ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसका सीधा अर्थ सिर्फ इतना होता है कि संबंधित वर्ष में रीसाइक्लिंग और नई माइनिंग का कुल जोड़ खपत की तुलना में कम रहा। इस तात्कालिक अंतर को न्यूयॉर्क और लंदन की तिजोरियों में पहले से संचित भारी स्टॉक से आसानी से पूरा किया जाता रहा है। वैश्विक स्तर पर स्थापित इन विशाल वॉल्ट्स से वर्ष 2021 के बाद से अब तक तकरीबन 762 मिलियन औंस चांदी पहले ही निकाली जा चुकी है, जिससे खुले बाजार में किसी भी तरह का वास्तविक अभाव नहीं दिखा।
फोटोवोल्टाइक तकनीक से तांबे की तरफ बढ़ता सौर उद्योग
चांदी के कमजोर पड़ने का एक बड़ा आंतरिक पहलू हरित ऊर्जा क्षेत्र में चल रहे तकनीकी प्रयोगों से जुड़ा है। सोलर पैनल तैयार करने वाली इकाइयां अपनी लागत घटाने के लिए नए रास्ते तलाश रही हैं। इसके तहत हर सेल में चांदी के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से घटाया जा रहा है और उसकी जगह तांबे से जुड़ी तकनीक अपनाई जा रही है। सुक्डेन के वर्ल्ड सिल्वर सर्वे 2026 के अनुमान बताते हैं कि इस बदलाव के चलते सौर ऊर्जा उद्योग में चांदी की खपत चालू वर्ष में 19% घटकर 151 मिलियन औंस तक आ सकती है। वहीं जेपी मॉर्गन का विश्लेषण इससे भी अधिक गंभीर स्थिति की ओर इशारा करता है, जहां खपत 30% तक गिरने से करीब 60 मिलियन औंस की मांग पूरी तरह खत्म होने की आशंका जताई गई है।
नए औद्योगिक क्षेत्रों से भरपाई में देरी
यद्यपि इलेक्ट्रिक वाहनों, आधुनिक पावर ग्रिड्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले डेटा सेंटर्स में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के विस्तार से चांदी का उपयोग बढ़ा है, लेकिन यह बढ़त बाकी क्षेत्रों की सुस्ती की भरपाई नहीं कर पाई है। कुल औद्योगिक मांग का लगभग 57% हिस्सा रखने वाले सेक्टर्स में ठहराव की स्थिति है। इसके अतिरिक्त आभूषण और सिल्वरवेयर की बिक्री में सुस्ती बने रहने से सटोरिया पूंजी लगाने वाले ट्रेडर्स का हौसला पस्त हो गया है। इसी कारण सप्लाई घटने की खबरों के बाद भी बड़े कॉर्पोरेट खरीदार तुरंत सौदे करने के बजाय कीमतों में और गिरावट आने की राह देख रहे हैं।
चार्ट्स पर टूटता भरोसा और अहम सपोर्ट स्तर
तकनीकी पैमानों पर भी चांदी इस समय बेहद कमजोर स्थिति दर्शा रही है। इसका बाजार भाव अपने 200-दिन के मूविंग एवरेज से लगभग 25% नीचे फिसल चुका है। हेज फंड्स और पोर्टफोलियो मैनेजरों की शुद्ध खरीदारी वाली पोजिशंस 2024 के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है, जो बड़े वित्तीय संस्थानों के घटते भरोसे का स्पष्ट संकेत है। तकनीकी विश्लेषकों का मानना है कि यदि धातु का भाव 50 डॉलर का मनोवैज्ञानिक स्तर तोड़ता है, तो नीचे की ओर अगला ठोस आधार 48 डॉलर पर दिखाई देगा। जब तक व्यापक आर्थिक परिदृश्य में अनुकूल बदलाव नहीं आता, तब तक केवल कमी के तर्क से कीमतों को संभालना मुश्किल बना रहेगा।


















