राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित गुरला कस्बा इन दिनों कृषि के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश कर रहा है। यहां के किसानों ने पारंपरिक फसलों की खेती से आगे बढ़ते हुए फलदार अमरूद की बागवानी को प्राथमिकता दी है। क्षेत्र का मौसम और जमीन की खास बनावट इस फसल के लिए बेहद मुफीद साबित हो रही है, जिससे अमरूद की जबरदस्त पैदावार देखने को मिल रही है। गुरला में उगे अमरूदों का स्वाद और उनकी बेहतरीन गुणवत्ता इन्हें आम फल बाजारों में बेहद लोकप्रिय बना रही है। इसी वजह से यहां के अमरूद की मांग केवल आसपास के इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राजस्थान और पड़ोसी राज्यों में भी इसकी व्यापक सप्लाई की जा रही है।
गुरला की बलुई दोमट मिट्टी और L-49 किस्म का कमाल
भीलवाड़ा कृषि विभाग में पदस्थ उद्यान विशेषज्ञ डॉक्टर शंकर सिंह राठौड़ के अनुसार, गुरला क्षेत्र का भौगोलिक वातावरण अमरूद के पेड़ों की पैदावार के लिए सर्वोत्तम है। यहां की मिट्टी बलुई दोमट श्रेणी की है, जिसे अमरूद की फसल के लिए बेहद उपजाऊ और उपयोगी माना जाता है। इस अनुकूल वातावरण को देखते हुए कस्बे के लगभग 50 से 60 हेक्टेयर क्षेत्र में अमरूद की पैदावार की जा रही है। किसान मुख्य रूप से अमरूद की प्रसिद्ध ‘L-49’ किस्म, जिसे लखनऊ-49 या सरदार अमरूद भी कहा जाता है, की बुवाई पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इस खास किस्म की खेती के कारण पैदा होने वाले फलों की मिठास, आकार और गुणवत्ता दोनों ही उत्कृष्ट बनी रहती हैं, जिससे बाजार में इन्हें बेहतर दाम प्राप्त होते हैं।
प्रति हेक्टेयर 50,000 से 60,000 रुपये की शुद्ध कमाई
अमरूद की पैदावार से होने वाली आय बाजार में समय-समय पर चलने वाली मांग और आवक की स्थिति पर निर्भर करती है। इसके बावजूद, सामान्य परिस्थितियों में एक किसान प्रति हेक्टेयर करीब 50,000 रुपये से लेकर 60,000 रुपये तक का शुद्ध मुनाफा आसानी से कमा लेता है। पारंपरिक खाद्यान्न फसलों में होने वाली अनिश्चितता की तुलना में अमरूद की खेती किसानों को एक सुनिश्चित और स्थिर आय का जरिया प्रदान कर रही है। लागत निकालने के बाद मिलने वाला यह लाभ क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति को संवारने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।
स्थानीय बाजारों से लेकर दिल्ली की बड़ी मंडियों तक पहुंच
उत्पाद के विपणन और बिक्री के मामले में गुरला के किसानों ने अपनी-अपनी जोत के हिसाब से अलग-अलग रणनीतियां अपनाई हैं। क्षेत्र के छोटे और सीमांत किसान अपने ताजा अमरूदों को नजदीकी स्थानीय फल बाजारों में बेचना अधिक व्यावहारिक और सुविधाजनक मानते हैं, जिससे उन्हें तुरंत नकद भुगतान मिल जाता है। दूसरी तरफ, बड़े पैमाने पर खेती करने वाले किसान अपने माल की ग्रेडिंग और पैकिंग करके जयपुर, उदयपुर और देश की राजधानी दिल्ली की बड़ी फल मंडियों में भिजवा रहे हैं। बड़ी मंडियों में सीधे सप्लाई करने से इन बड़े किसानों को अपनी उपज की प्रीमियम कीमतें हासिल हो रही हैं।
कम पानी और कम रखरखाव से कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूती
अमरूद की फसल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे उगाने के लिए बहुत अधिक पानी की जरूरत नहीं होती और यह कम से कम रखरखाव में भी अच्छी पैदावार देती है। भीलवाड़ा जिले के इस हिस्से में पानी की सीमित उपलब्धता को देखते हुए अमरूद की बागवानी एक आदर्श विकल्प बनकर उभरी है। पारंपरिक फसलों के मुकाबले अधिक और टिकाऊ आय मिलने के कारण गुरला की क्षेत्रीय कृषि अर्थव्यवस्था को काफी मजबूती मिल रही है। इस सफल बदलाव को देखकर क्षेत्र के अन्य किसान भी प्रेरित हो रहे हैं और अपनी जमीनों पर अमरूद के बाग लगाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।



















