भारतीय रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक मुद्रा के उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए एक बड़ा और बेहद अहम वित्तीय कदम उठाया है। बैंकिंग व्यवस्था और रणनीतिक विदेशी कर्ज के माध्यम से 20.7 अरब डॉलर की भारी भरकम विदेशी मुद्रा जुटाकर, केंद्रीय बैंक ने सरकार की उन गहरी चिंताओं को दूर कर दिया है जो रुपये की लगातार गिरती कीमत के कारण पैदा हो रही थीं। डॉलर की यह भारी आवक सीधे तौर पर भारतीय रुपये को मजबूती प्रदान करने के लिए तैयार की गई है, ताकि आयात पर काफी हद तक निर्भर रहने वाली हमारी अर्थव्यवस्था वैश्विक दबाव के सामने घुटने न टेके।
20.7 अरब डॉलर के विशाल भंडार का पूरा गणित
विदेशी मुद्रा का यह विशाल भंडार रातों-रात या किसी एक ही स्रोत से इकट्ठा नहीं हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक ने इस विदेशी मुद्रा को जुटाने के लिए एक बेहद सोची-समझी बहु-आयामी रणनीति का इस्तेमाल किया है। इस वित्तीय खजाने का सबसे बड़ा हिस्सा, जो कि 17.1 अरब डॉलर का है, इसी साल मार्च के महीने में एक विशेष स्वैप सुविधा के जरिए देश में आया है। यह सुविधा फॉरेन करेंसी नॉन रेजिडेंट (बैंक) डिपॉजिट से जुड़ी हुई है, जिसे बैंकिंग की भाषा में FCNR(B) कहा जाता है। इसके अलावा, देश की वित्तीय प्रणाली में ओवरसीज बॉरोइंग यानी विदेशी उधारी के माध्यम से भी 1.97 अरब डॉलर का सीधा निवेश देखा गया है। इस पूरी रकम को और बढ़ाने के लिए, एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (बाहरी वाणिज्यिक उधारी) के रास्ते भी 1.34 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई गई है। जब इन तीनों अलग-अलग रास्तों से आई रकम को एक साथ मिलाया जाता है, तो यह केंद्रीय बैंक को वैश्विक मुद्रा बाजार के किसी भी अचानक आने वाले झटके से निपटने के लिए एक बेहद मजबूत ढाल प्रदान करता है। यह विशाल भंडार भारतीय अर्थव्यवस्था को उन बाहरी खतरों से सुरक्षित रखता है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अचानक होने वाले बदलावों के कारण पैदा होते हैं।
FCNR(B) खातों की कार्यप्रणाली और इसका महत्व
इस पूरी वित्तीय व्यवस्था को गहराई से समझने के लिए फॉरेन करेंसी नॉन रेजिडेंट (बैंक) के बुनियादी ढांचे को समझना बहुत जरूरी है। इस प्रणाली के तहत, विदेशों में रहने वाले लोग, जिन्हें मुख्य रूप से अनिवासी भारतीय (एनआरआई) कहा जाता है, अपनी विदेशी कमाई को भारतीय वाणिज्यिक बैंकों के विशेष खातों में जमा करते हैं। इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक इन बैंकों के सामने एक बहुत ही खास प्रस्ताव रखता है। केंद्रीय बैंक इन वाणिज्यिक बैंकों को निर्देश देता है कि वे विदेशों से आने वाले इस डॉलर को सीधे आरबीआई के खजाने में जमा कर दें। इस विदेशी मुद्रा को अपने पास रखने के बदले में, भारतीय रिजर्व बैंक उन वाणिज्यिक बैंकों को उसी के बराबर मूल्य का भारतीय रुपया सौंप देता है। चूंकि, भारत में काम करने वाले बैंक मुख्य रूप से रुपये में ही अपने ग्राहकों को लोन बांटते हैं, इसलिए यह पूरी व्यवस्था उनके लिए बहुत मुनाफे का सौदा साबित होती है। इससे बैंकों को तुरंत भारी मात्रा में नकद राशि मिल जाती है, जिसे वे अपने खुदरा और कॉर्पोरेट ग्राहकों को कर्ज के रूप में बांट सकते हैं और इस पर मोटा ब्याज कमा सकते हैं। इसके साथ ही, केंद्रीय बैंक यह पूरी गारंटी भी देता है कि भविष्य में जब भी इन बैंकों को अपने डॉलर वापस चाहिए होंगे, तो वे आसानी से रुपया लौटाकर अपनी विदेशी मुद्रा वापस ले सकेंगे। यह एक ऐसा सुरक्षित चक्र है जो देश के भीतर नकदी की तरलता (लिक्विडिटी) को बनाए रखता है और यह सुनिश्चित करता है कि व्यापार और विकास के लिए धन की कोई कमी न हो।
बैंकों के लिए एक्सचेंज रेट के जोखिम का खात्मा
इस पूरी रणनीति की सबसे बड़ी खूबी वह सुरक्षा है जो यह इसमें शामिल सभी वित्तीय संस्थानों को प्रदान करती है। भारतीय रिजर्व बैंक ने आधिकारिक तौर पर इसी साल 8 जून से अपनी इस विशेष स्वैप सुविधा विंडो को खोला था, जिसने बैंकों के लिए एक अहम सुरक्षा कवच का काम किया है। जब केंद्रीय बैंक इन डॉलरों को अपने पास रखता है, तो वह एक पक्का वादा करता है: बैंकों को भविष्य में अपनी विदेशी मुद्रा बिल्कुल उसी एक्सचेंज रेट पर वापस मिलेगी जो शुरुआती जमा के दिन बाजार में लागू थी। इस सुरक्षा तंत्र को एक काल्पनिक उदाहरण के जरिए आसानी से समझा जा सकता है। मान लीजिए कि कोई भी वाणिज्यिक बैंक 85 रुपये के मौजूदा एक्सचेंज रेट पर केंद्रीय बैंक के पास एक डॉलर जमा करता है। कुछ समय बाद, जब बैंक अपना वह एक डॉलर वापस लेने आता है, तो भले ही बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई हो और डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत गिरकर 90 रुपये के स्तर पर पहुंच गई हो, भारतीय रिजर्व बैंक अपने मूल वादे से बिल्कुल नहीं मुकरेगा। उस वाणिज्यिक बैंक को अपना एक डॉलर वापस पाने के लिए केवल 85 रुपये ही चुकाने होंगे, और उसे बाजार के कारण होने वाले उन पांच रुपये के भारी नुकसान से पूरी तरह बचा लिया जाएगा। यह ठोस गारंटी वाणिज्यिक बैंकिंग क्षेत्र को विदेशी मुद्रा विनिमय के उतार-चढ़ाव वाले खतरनाक जोखिम से पूरी तरह महफूज रखती है, जिससे वे बिना किसी डर के भारतीय बाजार में अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर पाते हैं।
मुनाफा कमाने की रणनीतियां और विदेशी निवेश
भारतीय बैंकिंग प्रणाली में विदेशी पूंजी का यह पूरा प्रवाह उन आकर्षक वित्तीय योजनाओं से शुरू होता है जो विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए पेश की जाती हैं। भारत के बैंक विदेशी नागरिकों और अनिवासी भारतीयों को फिक्स्ड डिपॉजिट योजनाओं के तहत भारी निवेश करने के लिए प्रेरित करते हैं, और उन्हें आम तौर पर उनकी विदेशी मुद्रा पर चार से पांच प्रतिशत के एक तयशुदा मुनाफे (रिटर्न) का पक्का वादा करते हैं। जब बैंकों के पास यह डॉलर आ जाता है, तो उनके सामने यह तय करने की चुनौती होती है कि वे इससे अपना मुनाफा कैसे कमाएं। पहला तरीका तो वही बेहद सुरक्षित रास्ता है जिसके तहत बैंक भारतीय रिजर्व बैंक के साथ डॉलर की अदला-बदली करके रुपया ले लेते हैं। इससे वे एक्सचेंज रेट की चिंता किए बिना देश के भीतर आराम से लोन बांटते हैं और सुरक्षित ब्याज कमाते हैं। दूसरा तरीका थोड़ा सीधा लेकिन जोखिम भरा है। बैंक इन जमा किए गए डॉलरों को सीधे तौर पर किसी विदेशी या बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी को डॉलर में ही लोन के रूप में दे सकते हैं, और उनसे सात से आठ प्रतिशत तक का मोटा ब्याज वसूल सकते हैं। इस दूसरे तरीके में, कंपनियों से वसूला गया भारी ब्याज और विदेशी निवेशकों को दिया जाने वाला कम रिटर्न ही बैंक का असली मुनाफा होता है। लेकिन, सीधे लोन देने के इस तरीके में बैंक बड़े खतरे में रहते हैं। अगर विदेशी मुद्रा बाजार में कोई बड़ा उलटफेर हो जाता है और डॉलर महंगा हो जाता है, तो बैंकों के मुनाफे का पूरा गणित बिगड़ सकता है और उन्हें भारी घाटा सहना पड़ सकता है। इसीलिए, अपने मुनाफे को सुरक्षित रखने के लिए बैंक ज्यादातर आरबीआई की स्वैप विंडो का ही सुरक्षित रास्ता चुनते हैं, जहां उन्हें भले ही थोड़ा सीमित, लेकिन शत-प्रतिशत सुरक्षित मुनाफा मिलता है।
आम आदमी के बजट और महंगाई पर सीधा असर
भले ही केंद्रीय बैंक के ये बड़े-बड़े वित्तीय फैसले आम जिंदगी से बहुत दूर नजर आते हों, लेकिन डॉलर को खजाने में भरने की इस विशाल रणनीति का सीधा और बहुत गहरा असर देश के हर एक आम उपभोक्ता पर पड़ता है। 20.7 अरब डॉलर के इस विशाल विदेशी मुद्रा भंडार को जमा करने का सबसे मुख्य उद्देश्य भारतीय रुपये के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा घेरा बनाना है। जब केंद्रीय बैंक के पास विदेशी मुद्रा की बहुत बड़ी ताकत होती है, तो वह डॉलर के मुकाबले रुपये को अचानक और बहुत तेजी से गिरने से बचाने के लिए बाजार में सीधा दखल दे सकता है। उदाहरण के लिए, जब भी बाजार में डॉलर की मांग बहुत तेजी से बढ़ती है, तो आरबीआई अपने इस खजाने से कुछ डॉलर बाजार में उतार देता है, जिससे डॉलर की कमी पूरी हो जाती है और रुपये की कीमत अचानक नीचे नहीं गिरती। घरेलू मुद्रा की इसी स्थिरता पर ही पूरे देश की आयातित महंगाई का सीधा नियंत्रण टिका होता है। अगर रुपया लगातार कमजोर होता जाए, तो विदेशों से खरीदा जाने वाला हर सामान बेतहाशा महंगा हो जाएगा और देश के भीतर एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है, जिससे निपटना सरकार और केंद्रीय बैंक दोनों के लिए बेहद मुश्किल हो जाएगा।
आयातित महंगाई से देश की सुरक्षा
हमारा देश अपनी कई अहम आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल और भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक सामान विदेशों से ही आयात करता है, और इन सभी चीजों का भुगतान अमेरिकी डॉलर में ही करना पड़ता है। जब भारतीय रुपया कमजोर हो जाता है, तो विदेशों से मंगाया जाने वाला कच्चे तेल का हर एक बैरल भारत के लिए अपने आप बहुत ज्यादा महंगा हो जाता है, भले ही वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बिल्कुल न बढ़ी हों। 20.7 अरब डॉलर की इस आवक का इस्तेमाल करके रुपये को मजबूत बनाए रखकर, भारतीय रिजर्व बैंक यह सुनिश्चित करता है कि देश का आयात बिल अचानक से बेकाबू न हो जाए। रुपये को स्थिर रखने का यह सीधा हस्तक्षेप ही वह मुख्य कारण है जिससे देश के भीतर पेट्रोल और डीजल जैसी चीजों के दाम नियंत्रण में बने रहते हैं। चूंकि देश में माल ढुलाई और ट्रांसपोर्ट का खर्च नहीं बढ़ता, इसलिए आम आदमी की रसोई का सामान, रोजमर्रा की सब्जियां और उपभोक्ता वस्तुएं भी जानलेवा महंगाई से बची रहती हैं। इसके अलावा, विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों की फीस और विदेशों में यात्रा करने वाले पर्यटकों का खर्च भी रुपये की मजबूती से ही सुरक्षित रहता है। अगर रुपया गिरता है तो विदेश में पढ़ाई और इलाज दोनों बहुत महंगे हो जाते हैं। आसान शब्दों में कहें तो, विदेशी मुद्रा के साथ किया गया यह जटिल वित्तीय प्रबंधन देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत ढाल का काम करता है, जो हर नागरिक की क्रय शक्ति को बचाता है, आम आदमी की रसोई के बजट को सुरक्षित रखता है और उसके जीवन स्तर पर महंगाई की सीधी मार नहीं पड़ने देता। इस पूरी व्यवस्था के कारण ही अर्थव्यवस्था का पहिया सुचारू रूप से चलता रहता है और बाजार में आम लोगों का भरोसा बना रहता है।

















