स्कूली शिक्षा के पारंपरिक ढांचे में अक्सर सैद्धांतिक विषयों पर अधिक जोर रहता था, लेकिन अब विद्यार्थियों को व्यावहारिक समझ और व्यावसायिक कौशल से जोड़ने की दिशा में ठोस बदलाव किए जा रहे हैं। इसी क्रम में एनसीईआरटी ने नौवीं कक्षा के सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम में उद्यमिता पर केंद्रित एक नया अध्याय शामिल किया है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य छात्रों में बहुत कम उम्र से ही जोखिम उठाने की क्षमता, नए विचारों पर काम करने का हौसला और स्वतंत्र उद्यम खड़ा करने की बुनियादी समझ विकसित करना है। किताबी परिभाषाओं में उलझाने के बजाय इस नए पाठ को व्यावहारिक उदाहरणों से तैयार किया गया है, ताकि युवा पीढ़ी केवल रोजगार तलाशने तक सीमित न रहे बल्कि भविष्य में रोजगार पैदा करने की सोच भी अपना सके।
तीन बुनियादी सवालों पर टिका है नया पाठ्यक्रम
नौवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में शामिल यह नया खंड मुख्य रूप से तीन अहम बिंदुओं के इर्द-गिर्द संरचित किया गया है। सबसे पहले विद्यार्थियों को यह समझाया गया है कि किसी भी समाज और अर्थव्यवस्था के विकास में उद्यमशीलता किस तरह महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। दूसरा मुख्य पहलू यह स्पष्ट करता है कि किसी व्यावसायिक संस्थान या उपक्रम के संचालन में कौन-कौन से मुख्य कार्यक्षेत्र सक्रिय होते हैं। इसके साथ ही छात्रों को यह भी सिखाया जा रहा है कि जमीन पर काम करने वाला एक प्रभावी और सफल बिजनेस प्लान किस तरह तैयार किया जाता है।
शुरुआती उम्र में बाजार की समझ और तकनीकी टूल्स का मेल
इस पाठ्यक्रम के जरिए बच्चों को बाजार की दैनिक गतिविधियों को बारीकी से समझने, नए मौकों की पहचान करने, अपने कामकाज का सही मूल्यांकन करने और उपलब्ध संसाधनों की पूर्व योजना बनाने के व्यावहारिक तौर-तरीके सिखाए जा रहे हैं। बदलते वक्त के साथ तालमेल बिठाते हुए इसमें आधुनिक तकनीक की भूमिका को भी प्रमुखता दी गई है। अध्याय में यह रेखांकित किया गया है कि आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) किस प्रकार बाजार के रुझानों का विश्लेषण करने और व्यापारिक निर्णय लेने में उद्यमियों की मदद कर सकता है।
भारत के स्टार्टअप विस्तार की जमीनी तस्वीर
पाठ्यक्रम में भारतीय स्टार्टअप व्यवस्था के पिछले एक दशक के सफर को स्पष्ट आंकड़ों के जरिए प्रस्तुत किया गया है। करीब एक दशक पहले देश में जहां केवल 350 से 400 स्टार्टअप सक्रिय थे, वहीं आज इनकी कुल संख्या बढ़कर लगभग 2.3 लाख तक पहुंच चुकी है। इन आंकड़ों के साथ भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने में अनुसंधान, औद्योगिक इकाइयों और नए स्टार्टअप्स को एक साझा मंच पर लाने की नीतिगत सोच ने अहम भूमिका निभाई है।
घरेलू छत से वैश्विक पहचान तक पहुंचा लिज्जत पापड़
किताबी सिद्धांतों को जीवन के अनुभवों से जोड़ने के लिए पाठ्यक्रम में दो ऐतिहासिक भारतीय उद्यमों की प्रेरक यात्रा को शामिल किया गया है। इनमें पहला उदाहरण श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ का है, जिसकी शुरुआत साल 1959 में मुंबई में एक घर की छत से हुई थी। सात गृहिणियों ने महज 80 रुपये उधार लेकर पापड़ बनाने का यह काम शुरू किया था। घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ गुणवत्ता और कड़े अनुशासन को प्राथमिकता देते हुए इन महिलाओं ने एक साधारण घरेलू प्रयास को दुनिया भर में पहचाने जाने वाले बड़े ब्रांड में तब्दील कर दिया।
50 रुपये की नौकरी से बड़े होटल समूह की स्थापना
दूसरा प्रमुख उदाहरण मोहन सिंह ओबेरॉय के जीवन संघर्ष और सफलता का है। पंजाब में जन्मे ओबेरॉय ने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत महज 50 रुपये महीने की मामूली नौकरी से की थी। अपने सपनों को विस्तार देने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखकर पहला होटल खरीदा। अपने समर्पण और दूरदर्शिता के बल पर उन्होंने भारतीय आतिथ्य सत्कार उद्योग में एक विशाल होटल श्रृंखला की नींव रखी और उद्योग जगत के प्रमुख दिग्गजों में अपनी पहचान बनाई। इन दोनों कहानियों के माध्यम से छात्रों को यह संदेश दिया जा रहा है कि सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत संकल्प और सही योजना से बड़े मुकाम हासिल किए जा सकते हैं।



















