छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में खेती की पारंपरिक पद्धतियों से आगे निकलकर किसान अब नकदी सब्जियों की ओर रुख कर रहे हैं। आमतौर पर ठंड के दिनों में उगाई जाने वाली बींस की फसल अब मानसूनी मौसम में भी सफलतापूर्वक लगाई जा रही है। बारिश के मौसम में इस प्रयोग से किसानों को कम समय में बेहतर आर्थिक लाभ मिलने की मजबूत उम्मीद बंधी है। तीन से चार महीने की इस छोटी अवधि की फसल में बीमारियों का जोखिम अपेक्षाकृत कम होता है और बाजार में बेहतर दाम मिलने से यह किसानों के लिए आय का एक मजबूत जरिया बन रही है।
बाजार में मजबूत कीमतें और प्रति एकड़ कमाई का गणित
मौजूदा समय में स्थानीय मंडियों और खुदरा बाजारों में बींस की कीमत 60 से 70 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर चल रही है। बेहतर मांग और स्थिर भावों के चलते एक एकड़ रकबे में बींस की व्यवस्थित खेती करने वाले किसान एक लाख रुपये से अधिक की शुद्ध कमाई कर रहे हैं। कम अवधि वाली इस सब्जी की फसल में लागत सीमित रहती है, जिससे मानसूनी सीजन में कम पूंजी लगाकर भी किसान अपनी आय को तेजी से बढ़ा सकते हैं। इस फसल चक्र से एक एकड़ क्षेत्र से कुल मिलाकर एक से डेढ़ लाख रुपये तक का मुनाफा मिलने का अनुमान है।
खेत की तैयारी, बुवाई का तरीका और उर्वरक प्रबंधन
बींस की सफल पैदावार के लिए खेत की प्रारंभिक तैयारी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। बुवाई से पूर्व जमीन की दो से तीन बार अच्छी तरह से गहरी जुताई की जाती है, जिसके बाद मिट्टी को भुरभुरा और समतल बनाने के लिए रोटावेटर चलाया जाता है। इसके बाद क्यारियां तैयार करके बीज की बुवाई की जाती है।
- दूरी का नियम: बुवाई के दौरान एक बेड से दूसरे बेड की दूरी तीन फीट रखी जाती है, जबकि पौधे से पौधे के बीच की दूरी एक फीट निर्धारित की जाती है।
- किस्म का चयन: बेहतर उत्पादन के लिए स्टू बेस्ट वैरायटी के बीजों का चयन किया गया है।
- उर्वरक की मात्रा: मिट्टी की उर्वरता और पौधों के सही विकास के लिए गोबर की सड़ी खाद के साथ रासायनिक खादों में डीएपी और पोटाश का संतुलित इस्तेमाल किया जाता है।
- लागत विवरण: एक एकड़ में जुताई, बीज, खाद और रख-रखाव को मिलाकर कुल खर्च लगभग 60 से 70 हजार रुपये के आसपास आता है।
रोग प्रबंधन और मानसूनी चुनौतियों से बचाव
बींस की फसल में सामान्यतः अन्य सब्जियों की तुलना में कीटों और रोगों का प्रकोप काफी कम देखने को मिलता है, फिर भी कुछ मौसमी बीमारियां पौधों को प्रभावित कर सकती हैं। मानसूनी मौसम में लगातार या अधिक पानी भराव होने से कई बार पत्तियों में पीलापन आने की समस्या देखी गई है।
इस तरह की समस्याओं से निपटने और पौधों को स्वस्थ रखने के लिए समय-समय पर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव जरूरी होता है। फसल सुरक्षा के तहत आटा बोरॉन और अन्य अनुमोदित रोगरोधी दवाओं का नियमित छिड़काव किया जा रहा है, जिससे फसल खराब न हो। पहली बार सब्जियों की व्यावसायिक खेती अपनाने वाले किसानों के लिए भी यह तरीका कम झंझट और त्वरित आमदनी देने वाला साबित हो रहा है।



















