बिलासपुर के जूना बिलासपुर स्थित हटरी चौक पर एक ऐसा अनूठा प्राचीन मंदिर है जिसके कपाट पूरे साल में केवल एक ही बार खोले जाते हैं। विजयादशमी यानी दशहरे के पावन पर्व पर सीताराम हनुमान मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिएकिए जाते हैं। इस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल का इतिहास लगभग 160 साल पुराना है, और साल में महज एक दिन ही दर्शन का दुर्लभ अवसर मिलने के कारण यहां सुबह से ही भक्तों का भारी सैलाब उमड़ पड़ता है। तय कार्यक्रम के अनुसार इस बार मंदिर के पट सुबह 7 बजे से शाम 4 बजे तक दर्शन के लिए खुले रखे गए हैं, ताकि दूर-दूर से आने वाले सभी भक्त सुगमता से भगवान के दर्शन कर सकें।
नीम की जड़ों से प्रगट होने की प्राचीन मान्यता
इस मंदिर की स्थापना और इतिहास को लेकर क्षेत्र में गहरी मान्यताएं प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार जिस जगह पर आज भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और बजरंगबली की भव्य प्रतिमाएं विराजमान हैं, वहां कभी एक विशाल नीम का पेड़ हुआ करता था। वक्त के साथ जब वह पेड़ सूखकर गिर गया, तब उसकी जड़ों से भगवान की ये दिव्य प्रतिमाएं प्रकट होने की बात सामने आई। इसके बाद उन प्रतिमाओं को पूरी श्रद्धा के साथ स्थापित किया गया और विधि-विधान से मंदिर का निर्माण कर प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न की गई। तब से लेकर आज तक पांडेय परिवार ही इस मंदिर की व्यवस्था और संचालन की जिम्मेदारी संभालता आ रहा है।
मनोकामना पूर्ति का प्रमुख केंद्र
इस पवित्र स्थल को लेकर श्रद्धालुओं के मन में अगाध आस्था और विश्वास बसा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि दशहरे के दिन जो भी भक्त सच्चे मन से भगवान श्रीराम, माता सीता और हनुमान जी के दर्शन करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि इसे क्षेत्र में मनोकामना पूर्ति मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। कोई अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना लेकर यहां पहुंचता है, तो कोई अपनी कोई विशेष मन्नत पूरी होने की प्रार्थना करता है। वंदना यादव नामक एक श्रद्धालु ने बताया कि वह कई वर्षों से इस मंदिर की भव्यता और परंपरा के बारे में सुनती आ रही थीं, लेकिन इस बार उन्हें पहली बार साक्षात दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिसके बाद उन्हें अत्यंत शांति और प्रसन्नता का अनुभव हुआ।
सोशल मीडिया रील्स का बढ़ता प्रभाव
आज के दौर में इस मंदिर की अनूठी परंपरा केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से भी यह व्यापक रूप से चर्चा का केंद्र बन गई है। रूपेंद्र यादव नाम के एक अन्य श्रद्धालु ने साझा किया कि उन्होंने इस मंदिर के बारे में सोशल मीडिया पर एक रील देखी थी। उस वीडियो में दशहरे के दिन मंदिर खुलने और मनोकामनाएं पूर्ण होने की बात कही गई थी, जिसे देखकर उनकी जिज्ञासा जागी और वह खुद भगवान के दर्शन करने के लिए यहां पहुंच गए। इस प्रकार डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हो रही चर्चाओं के कारण नए और युवा श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में इस प्राचीन परंपरा से जुड़ रहे हैं।
भक्तों की अटूट आस्था और परंपरा का निर्वहन
मंदिर के दर्शन करके बाहर आए विनोद कुमार देवांग ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और हर साल दशहरा पर्व पर ही मंदिर के पट आम जनता के लिए खोले जाते हैं। इस बार सुबह 7 बजे से शाम 4 बजे तक की समय-सीमा तय की गई है, जिसके भीतर सभी लोग कतारबद्ध होकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं और भगवान के चरणों में अपनी अर्जी लगाते हैं। उन्होंने भी अपनी मनोकामना भगवान के समक्ष रखी है और उसके पूर्ण होने की पूरी उम्मीद जताई है। विजयादशमी का यह पा पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होने के साथ-साथ बिलासपुर की समृद्ध धार्मिक संस्कृति और लोगों की अटूट निष्ठा का भी जीवंत प्रमाण प्रस्तुत करता है।
























