राजस्थान के अजमेर जिले के अंतर्गत आने वाले किशनगढ़ इलाके की गुदोलाव झील एक समय अपनी बेहतरीन पैदावार के लिए खासा नाम रखती थी। यहां के सिंघाड़े अपनी खास क्वालिटी और बेहतरीन जायके के चलते दूर-दूर के इलाकों में पसंद किए जाते थे। इन फसलों की पहुंच केवल स्थानीय बाजारों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि राज्य के अन्य बड़े शहरों के बाजारों में भी इनकी भारी मांग बनी रहती थी। सैकड़ों परिवारों के लिए यह जलाशय रोजी-रोटी का मुख्य साधन था, जिससे किसानों को नियमित तौर पर आर्थिक संबल प्राप्त होता था।
बीते कुछ वर्षों में इस ऐतिहासिक जलस्रोत की स्थिति काफी खराब हो गई, जिसके कारण लगभग डेढ़-दो दशक पहले यहां सिंघाड़े की पैदावार पूरी तरह बंद हो गई। इस क्षेत्र से जुड़ी कौशल्या का कहना है कि करीब सत्रह साल पहले उन्होंने इस खेती में लगभग चार लाख रुपये का बड़ा निवेश करके पौधे लगवाए थे। हालांकि, पानी में मौजूद मछलियों ने पूरी फसल को तबाह कर दिया, जिससे उन्हें बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। पानी के लगातार मैले होने और बार-बार होने वाले घाटे से आजिज आकर किसानों ने इस पुश्तैनी काम से हमेशा के लिए मुंह मोड़ लिया।
आजीविका का संकट और बाहरी क्षेत्रों पर बढ़ती निर्भरता
इस जलस्रोत पर आधारित कामकाज थमने से कई घरों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट पैदा हो गया है। एक अन्य स्थानीय निवासी मीरा ने बताया कि अब किसानों को दूसरे इलाकों में जमीन किराए पर लेकर खेती करने को मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे उनका खर्च काफी बढ़ गया है। स्थिति यह हो गई है कि किशनगढ़ के बाजारों में सिंघाड़े की मांग पूरी करने के लिए केकड़ी और मसूदा जैसे बाहरी इलाकों का रुख करना पड़ता है। जिस जगह से कभी लोगों को भरपूर आमदनी और बेहतरीन फसल मिलती थी, वह आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।
झील के जीर्णोद्धार की सख्त आवश्यकता
क्षेत्र के बाशिंदों और किसानों का यह मानना है कि यदि शासन-प्रशासन स्तर पर जलशोधन और पानी की निकासी के पुख्ता इंतजाम किए जाएं, तो इस स्थान पर दोबारा खेती शुरू हो सकती है। पानी की खराबी दूर होने से पर्यावरण बेहतर होगा और लोगों को घर के पास ही रोजगार के नए अवसर मिल सकेंगे। जिस गुदोलाव झील की पहचान कभी खुशहाली और मिठास से जुड़ी थी, उसे सरकारी उदासीनता के दलदल से बाहर निकालने के लिए अब ठोस कदमों की दरकार है।
















