बिलासपुर जिले के सिलपहरी गांव में प्रस्तावित आधुनिक ट्रांसपोर्ट नगर परियोजना को लेकर स्थानीय निवासियों का विरोध तेजी से बढ़ता जा रहा है। करीब 55 एकड़ भूमि पर इस ट्रांसपोर्ट नगर को विकसित करने की योजना बनाई गई है, जिसने यहां के रहवासियों की नींद उड़ा दी है। ग्रामीणों का तर्क है कि जिस जमीन को इसके लिए चिन्हित किया गया है, वहां कई लोग खेती करते हैं, बाड़ियां चलाते हैं, और छोटे-मोटे व्यवसाय संचालित करते हैं। इस स्थिति में यदि इस क्षेत्र में ट्रांसपोर्ट नगर का निर्माण किया जाता है, तो दर्जनों परिवारों की रोजी-रोटी पूरी तरह से खतरे में पड़ जाएगी।
गांव के लोग पहले से ही पास के औद्योगिक क्षेत्र के कारण फैलने वाले प्रदूषण, धूल और अन्य गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं। उनका साफ कहना है कि वे किसी भी विकास कार्य के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर उनकी पैतृक भूमि और आजीविका को उजाड़ा जाना स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अपनी इन्हीं चिंताओं और मांगों को लेकर ग्राम पंचायत सिलपहरी के तमाम ग्रामीणों ने एकजुट होकर जिला कलेक्टर के कार्यालय में ज्ञापन सौंपा है। उन्होंने मांग की है कि इस पूरे प्रस्तावित स्थल का दोबारा परीक्षण किया जाए और इस ट्रांसपोर्ट नगर को किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर स्थानांतरित किया जाए। साथ ही, उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि इसी स्थान पर परियोजना को जबरन आगे बढ़ाया गया, तो स्थानीय परिवारों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।
औद्योगिक प्रदूषण के बीच ट्रांसपोर्ट नगर की नई मुसीबत
स्थानीय निवासी दीपक कुमार यादव ने मीडिया से चर्चा में बताया कि सिलपहरी में लगभग 55 एकड़ भूमि पर ट्रांसपोर्ट नगर बनाए जाने का प्रस्ताव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस जमीन पर गांव के लोग खेती-किसानी करते हैं, सब्जियां उगाने के लिए बाड़ी तैयार करते हैं और कई परिवार अपनी छोटी दुकानों के जरिए गुजर-बसर करते हैं। यदि इस जमीन को परियोजना के लिए खाली कराया गया, तो इन सभी लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। दीपक कुमार यादव के अनुसार, सिलपहरी की आबादी पहले से ही औद्योगिक इकाइयों की वजह से उड़ने वाली धूल और प्रदूषण का दंश झेल रही है। ऐसी परिस्थितियों में स्थानीय जनजीवन और भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्रशासन को इस प्रोजेक्ट के लिए किसी दूसरी जगह का चयन करना चाहिए।
सात पीढ़ियों से बसे परिवारों पर उजड़ने का मंडराया खतरा
गांव के एक अन्य निवासी धर्मा ने भी प्रस्तावित ट्रांसपोर्ट नगर को लेकर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने जानकारी दी कि उनका परिवार पिछले सात पीढ़ियों से इसी गांव में निवास करता आ रहा है। ग्रामीणों के मन में यह भारी आशंका है कि जैसे ही परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण और खाली कराने की कार्रवाई शुरू होगी, उन्हें अपने आशियाने और जमीनों से हाथ धोना पड़ जाएगा। धर्मा ने दर्द बयां करते हुए कहा कि जो लोग केवल मजदूरी करके या रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पालते हैं, उनके लिए घर और जमीन छिन जाने के बाद किसी नई जगह पर दोबारा बसना असंभव सा हो जाएगा। ग्रामीणों का यही कहना है कि वे अपने हक की जमीन और रोजगार बचाने के लिए इस ट्रांसपोर्ट नगर की लोकेशन बदलने की पुरजोर मांग कर रहे हैं।
अकेली महिला और आठ एकड़ जमीन का संघर्ष
गांव की कोटवार श्याम बाई मानिकपुरी ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि शासन की तरफ से उन्हें जीवनयापन के लिए आठ एकड़ जमीन प्रदान की गई थी। उनके पति और पुत्र का पहले ही देहांत हो चुका है, जिसके कारण परिवार और बच्चों के भरण-पोषण की पूरी जिम्मेदारी अब उन्हीं के कंधों पर है। उनका कहना है कि ट्रांसपोर्ट नगर के लिए चिन्हित इस जमीन के आसपास घेराबंदी किए जाने से उन्हें अपनी भूमि छिन जाने का डर सता रहा है। श्याम बाई के मुताबिक, इस जमीन पर अन्य लोग भी खेती करते हैं और उनसे मिलने वाली उपज या राशि से उनके घर का खर्च चलता है। यदि यह जमीन हाथ से निकल गई, तो उनके सामने भुखमरी जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि उनकी इस विशेष परिस्थिति को देखते हुए उन्हें अन्य जगह जमीन दी जाए या वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था की जाए।
अनेक परिवारों की आजीविका पर सीधा असर
गांव वालों का यह स्पष्ट दावा है कि प्रस्तावित 55 एकड़ की इस जमीन से केवल एक या दो लोगों का नहीं, बल्कि गांव के एक बड़े हिस्से का भविष्य जुड़ा हुआ है। किसी की आजीविका सीधे तौर पर इस भूमि पर होने वाली खेती पर निर्भर है, तो कोई छोटे व्यवसाय के जरिए अपने परिवार का खर्च चला रहा है। ऐसी स्थिति में ट्रांसपोर्ट नगर के निर्माण से न सिर्फ जमीन प्रभावित होगी, बल्कि रोजगार के साधन भी छिन जाएंगे। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया, तो गांव के कई परिवारों के सामने विस्थापन का भयावह संकट उत्पन्न हो जाएगा। इसी मुख्य वजह से वे इस प्रोजेक्ट को किसी दूसरे स्थान पर ले जाने की अपनी मांग पर अड़े हुए हैं।
जिला कलेक्टर को सौंपा गया औपचारिक ज्ञापन
ग्राम पंचायत सिलपहरी और वहां के समस्त ग्रामीणों की तरफ से 23 अक्टूबर 2026 को जिला कलेक्टर, बिलासपुर के नाम एक लिखित आवेदन प्रस्तुत किया गया। इस ज्ञापन में लगभग 55 एकड़ जमीन पर ट्रांसपोर्ट नगर बसाने के निर्णय पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई गई है। ग्रामीणों ने आवेदन में विस्तार से बताया है कि इस क्षेत्र में ट्रांसपोर्ट नगर के बन जाने से भारी मालवाहक वाहनों की आवाजाही में भारी इजाफा होगा। इससे यातायात का दबाव बढ़ने के साथ-साथ धूल, धुआं, अत्यधिक शोर और पर्यावरण से जुड़ी कई गंभीर समस्याएं पैदा हो जाएंगी। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि इस प्रस्तावित स्थल का फिर से निरीक्षण किया जाए और जमीनी हकीकत का जायजा लिया जाए।
विकास के विरोधी नहीं, लेकिन रोजगार सुरक्षा पहली प्राथमिकता
ग्रामीणों ने अपने ज्ञापन के माध्यम से इस बात को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी तरह के विकास कार्यों के खिलाफ नहीं हैं। उनकी मुख्य मांग यह है कि सरकार जब भी कोई नई विकास योजना लागू करे, तो उसमें स्थानीय जनता की सहमति, उनकी सुविधाओं, पर्यावरण के संरक्षण और उनकी आजीविका का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। ग्रामीण चाहते हैं कि ट्रांसपोर्ट नगर के लिए कोई ऐसा इलाका चुना जाए, जहां स्थानीय परिवारों की जमीनों, खेती और रोजगार पर कम से कम प्रभाव पड़े। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जिला प्रशासन ग्रामीणों की इन जायज आपत्तियों पर क्या कदम उठाता है और इस ट्रांसपोर्ट नगर के स्थान को लेकर आगे क्या अंतिम निर्णय लिया जाता है।























