गोंडा के युवा किसान प्रिंस सिंह का कमाल, जैविक खाद और आधुनिक लेजर तकनीक से गन्ने की खेती में बंपर पैदावार की उम्मीदजियो की शेयर बाजार में होने जा रही धमाकेदार एंट्री, एयरटेल को पछाड़कर बन सकती है देश की दूसरी सबसे बड़ी कंपनीमूलांक 7 राशिफल 28 अक्टूबर: पैसों के मामले में केतु का संकेतमूलांक 9 राशिफल 28 अक्टूबर: रिश्तों और कामकाज में रखें संयम, पुरानी बातों पर लंबी बहस से बचेंFATF की बैठक में पाकिस्तान को घेरने की तैयारी में भारत, तालिबान के बयान से इस्लामाबाद पर बढ़ेगा कूटनीतिक दबावमिसाइल हमलों से फिर भड़का कच्चा तेल, भाव 115 डॉलर के पार पहुंचाकरनाल में ट्रक से पकड़ा गया करोड़ों का गांजा, काजू के छिलकों के नीचे छिपाकर ले जाए जा रहे थे 19 कट्टेमूलांक 8 राशिफल 28 अक्टूबर: शनि की दो सीख वित्तीय समझदारी बढ़ाएंगी, रिश्तों और कार्यक्षेत्र में रखें धैर्यमूलांक 6 दैनिक अंकज्योतिष 28 अक्टूबर: रिश्तों में सीमाएं तय करें और जल्दबाजी में आर्थिक वादों से बचेंकरवा चौथ 2026: जानिए व्रत की तारीख, शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय का समय और छलनी से पति को देखने की परंपरा
छत्तीसगढ़ की कोसा साड़ी दिल्ली से बेंगलुरु तक धूम मचा रही है, सुतली गांव के बुनकरों का हुनर चमका रहा है तकदीरछत्तीसगढ़
28 अक्तू॰ 2026, 9:23 am (5 मिनट पहले)· 1

छत्तीसगढ़ की कोसा साड़ी दिल्ली से बेंगलुरु तक धूम मचा रही है, सुतली गांव के बुनकरों का हुनर चमका रहा है तकदीर

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के सुतली गांव में बुनकर कोसा सिल्क की साड़ियां तैयार कर रहे हैं। इन साड़ियों की मांग दिल्ली और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों तक है, जिससे स्थानीय कारीगरों को बेहतर रोजगार मिल रहा है।

छत्तीसगढ़ का कोसा सिल्क अपनी प्राकृतिक चमक और अनूठी बनावट के लिए देश भर में विख्यात है। इस विशेष रेशम से बनने वाली साड़ियां अपनी पारंपरिक कारीगरी और सुंदरता के कारण ग्राहकों को आकर्षित करती हैं। जांजगीर-चांपा जिले के सुतली गांव में सक्रिय मां दुर्गा बुनकर समूह के सदस्य इन दिनों कोसा सिल्क की साड़ियां तैयार कर आजीविका के नए रास्ते तलाश रहे हैं। इन कारीगरों की मेहनत और कला के बल पर न केवल पारंपरिक बुनाई को संरक्षण मिल रहा है, बल्कि उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में भी उल्लेखनीय सुधार आ रहा है।

साड़ी तैयार करने में लगती है कड़ी मेहनत

मां दुर्गा बुनकर समूह से जुड़े देवेंद्र का कहना है कि उनके समूह द्वारा छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कोसा सिल्क से उत्कृष्ट साड़ियों का निर्माण किया जाता है। एक अदद साड़ी को मुकम्मल रूप देने में बुनकरों को काफी समय और शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है। धागे की शुरुआती तैयारी से लेकर करघे पर बुनाई और परिधान को अंतिम रूप देने तक हर स्तर पर बारीकी से काम करना पड़ता है। बुनकर अपने वर्षों के अनुभव और कौशल का उपयोग करके ऐसे आकर्षक डिजाइन तैयार करते हैं, जिनकी बाजार में भारी मांग बनी रहती है।

ये भी पढ़ें

साड़ियों की कीमत और सालाना कारोबार

इस समूह में बनने वाली कोसा सिल्क की एक साड़ी की कीमत अमूल्य रूप से 4 हजार से 6 हजार रुपये के दायरे में होती है। हालांकि, ग्राहकों की व्यक्तिगत पसंद और विशेष ऑर्डर्स के आधार पर इससे ऊंचे दाम वाली साड़ियां भी बनाई जाती हैं। इन परिधानों की बिक्री से समूह के सभी सदस्यों को नियमित आमदनी हासिल होती है। देवेंद्र के मुताबिक, यह समूह पूरे साल के दौरान लाखों रुपये का कुल कारोबार दर्ज करता है, जो उनकी मेहनत का प्रत्यक्ष परिणाम है।

देश के बड़े महानगरों तक पहुंच

चांपा क्षेत्र में तैयार होने वाली इन साड़ियों का दायरा केवल स्थानीय बाजारों तक ही सीमित नहीं है। इस समूह को देश की राजधानी दिल्ली और बेंगलुरु जैसे महानगरों से भी बड़े पैमाने पर ऑर्डर मिलते हैं। समूह के सदस्यों का यह भी बताना है कि दिल्ली के संपर्क सूत्रों के जरिए ये शानदार साड़ियां विदेशों तक भी पहुंच बनाई चुकी हैं। इससे चांपा के स्थानीय बुनकरों के काम को एक विस्तृत मंच मिल रहा है और पारंपरिक रेशम उद्योग से जुड़े लोगों के लिए कारोबार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

कोसा सिल्क साड़ी निर्माण की पूरी प्रक्रिया

कोसा सिल्क की साड़ी बनाने का सफर कच्चे रेशम के धागे से प्रारंभ होता है। कोसा सिल्क मूल रूप से तसर रेशम का ही एक रूप है, जो विशेष कीटों के कोकून से निकाला जाता है। कोकून से रेशे अलग करने के लिए कई चरणों में वैज्ञानिक और पारंपरिक प्रसंस्करण किया जाता है, जिसके बाद धागे बुनाई के योग्य बनते हैं। धागे की गुणवत्ता परखने के बाद उसे करघे पर व्यवस्थित किया जाता है। रंग, डिजाइन और पैटर्न की तय रूपरेखा के मुताबिक बुनाई का काम पूरा होता है और अंत में साड़ी को फिनिशिंग दी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में बुनकरों का अनुभव और सतर्कता सबसे अहम होती है।

आजीविका का प्रमुख जरिया बना हुनर

चांपा का मां दुर्गा बुनकर समूह कोसा सिल्क के जरिए अपनी प्राचीन परंपरा को जीवंत रखे हुए है। इन साड़ियों की लगातार बढ़ती मांग स्थानीय परिवारों के लिए रोजगार का मजबूत माध्यम साबित हो रही है। ग्रामीण स्तर पर तैयार होने वाला यह विशिष्ट उत्पाद छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत और बुनकरों के हुनर को राष्ट्रीय फलक पर पहचान दिला रहा है। इस तरह कोसा सिल्क की ये साड़ियां सिर्फ पहनावे का एक माध्यम नहीं हैं, बल्कि स्थानीय कारीगरों के परिश्रम और उनकी आजीविका की आधारशिला भी हैं।

सवाल-जवाब

कोसा सिल्क की साड़ियां मुख्य रूप से कहां तैयार की जाती हैं?
छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के सुतली गांव में मां दुर्गा बुनकर समूह के सदस्यों द्वारा ये साड़ियां तैयार की जाती हैं।
कोसा सिल्क साड़ियों की कीमत कितनी होती है?
एक कोसा सिल्क की साड़ी की सामान्य कीमत लगभग 4 हजार से 6 हजार रुपये तक होती है, जो ऑर्डर के अनुसार बढ़ भी सकती है।
चांपा की कोसा साड़ियां किन बड़े शहरों में भेजी जाती हैं?
ये साड़ियां दिल्ली और बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों के साथ-साथ विदेशों तक भी पहुंचाई जाती हैं।
कोसा सिल्क मुख्य रूप से किससे प्राप्त होता है?
कोसा रेशम तसर रेशम का एक प्रकार है, जिसे रेशम के कीट के कोकून से उचित प्रसंस्करण द्वारा प्राप्त किया जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp