छत्तीसगढ़ में धान की रोपाई और बुवाई को तीन महीने से अधिक का समय बीत चुका है। इस समय राज्य के कई ग्रामीण और कृषि प्रधान अंचलों में धान के पौधों से बालियां फूटने की प्रक्रिया जोरों पर है। फसल चक्र के इस बेहद नाजुक पड़ाव पर कीटों का अनपेक्षित हमला धान उत्पादकों के लिए गंभीर परेशानी खड़ी कर सकता है। विशेष रूप से सूक्ष्म कीट पेनिकल माइट, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में छोटी मकड़ी के तौर पर पहचाना जाता है, बालियों को अपना निशाना बना रहा है। इस कीट का प्रकोप धान के दानों को बदरंग कर देता है, जिससे बाजार में अनाज की चमक, गुणवत्ता और कुल पैदावार दोनों पर विपरीत प्रभाव पड़ने का अंदेशा बढ़ जाता है।
बालियों का बदलता स्वरूप और नुकसान के लक्षण
कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के वरिष्ठ कृषि विशेषज्ञ डॉ. केआर साहू ने धान उत्पादक किसानों को खेतों का लगातार मुआयना करने और कीट के शुरुआती संकेतों को तुरंत भांपने का परामर्श दिया है। स्थानीय परिवेश में छोटी मकड़ी के नाम से पुकारा जाने वाला पेनिकल माइट मुख्य रूप से बालियों और दानों के जोड़ों में अपनी जगह बनाता है। जिस भी पौधे की बाली पर यह कीट सक्रिय होता है, उसके दानों का स्वाभाविक रंग उड़ जाता है और वे बदरंग व धब्बेदार दिखाई देने लगते हैं। इसके गंभीर प्रकोप की सबसे बड़ी निशानी यह है कि धान की समूची बाली मुड़कर तोते की चोंच जैसी विकृत आकृति ले लेती है। यदि खेतों में बालियां इस तरह से झुकी या मुड़ी हुई दिखें, तो किसानों को तत्काल सचेत होकर सघन पड़ताल शुरू कर देनी चाहिए।
सफेद कागज के इस्तेमाल से कीट की पुष्टि
शारीरिक संरचना में अत्यधिक सूक्ष्म होने के कारण पेनिकल माइट को नंगी आंखों से पौधों की हरी पत्तियों के बीच सीधे देख पाना काफी पेचीदा काम होता है। इस समस्या से निपटने के लिए विशेषज्ञ ने एक बेहद सरल घरेलू जांच का तरीका सुझाया है। किसान संदिग्ध रूप से प्रभावित बालियों या टहनियों को एक साफ सफेद कागज के ऊपर रखकर आहिस्ता से झाड़ें। टहनियां हिलाने पर यदि सफेद कागज की सतह पर बहुत बारीक कीड़े तेजी से रेंगते या चलते हुए नजर आएं, तो समझ लेना चाहिए कि खेत में पेनिकल माइट का आक्रमण हो चुका है। सटीक पहचान और नुकसान की गंभीरता का आकलन करने के लिए स्थानीय कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क साधना हमेशा बेहतर रहता है।
माइटिसाइड का उपयोग और सुरक्षात्मक सावधानियां
खेत में कीट की पुष्टि होते ही किसानों को बिना देर किए रासायनिक प्रबंधन के कदम उठाने चाहिए। डॉ. केआर साहू ने पेनिकल माइट की रोकथाम के लिए विशेष माइटिसाइड समूह की दवाओं के छिड़काव की सिफारिश की है। नियंत्रण के लिए प्रोपरगाइट अथवा स्पाइरोमेसिफेन जैसे स्वीकृत रासायनिक फार्मूलों का इस्तेमाल किया जा सकता है। सामान्य दिशानिर्देश के तौर पर प्रति एकड़ खेत में लगभग 150 से 200 मिलीलीटर दवा के उपयोग का उल्लेख किया गया है।
दवा की यह मात्रा उसके तकनीकी फार्मूलेशन, ब्रांड और सक्रिय तत्वों की सांद्रता के आधार पर बदल भी सकती है। इसलिए उत्पाद के डिब्बे पर छपे सुरक्षा और उपयोग संबंधी निर्देशों को ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए और किसी मान्यता प्राप्त कृषि विशेषज्ञ से पुष्टि कराने के बाद ही छिड़काव करना चाहिए। बालियां निकलने का समय धान की पैदावार का आधार तय करता है, इसलिए नियमित निगरानी ही फसल के नुकसान को रोकने की सबसे बड़ी कुंजी है।



















