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झीरम घाटी हत्याकांड के दोषियों की फांसी पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट करेगा अंतिम फैसलाछत्तीसगढ़
25 सित॰ 2026, 6:24 pm (1 घंटे पहले)· 1

झीरम घाटी हत्याकांड के दोषियों की फांसी पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट करेगा अंतिम फैसला

जगदलपुर की विशेष अदालत द्वारा झीरम घाटी हमले में दस दोषियों को सुनाई गई मौत की सजा की पुष्टि के लिए मामला अब उच्च न्यायालय भेजा गया है।

बस्तर संभाग की झीरम घाटी में हुए भीषण नक्सली नरसंहार मामले में दोषियों के मुकद्दर का फैसला अब राज्य की शीर्ष अदालत करेगी। जगदलपुर स्थित राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत ने जिन दस मुजरिमों को फांसी का दंड सुनाया था, उनकी सजा की पुष्टि के लिए विधिक प्रक्रिया के तहत डेथ रेफरेंस बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को अग्रेषित कर दिया गया है। उच्च न्यायालय अब निचली अदालत की पत्रावली, गवाहों के बयानों और वैज्ञानिक साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा कर तय करेगा कि फांसी बरकरार रहेगी या इसमें तब्दीली होगी।

कानूनी प्रक्रिया और डेथ रेफरेंस का प्रावधान

भारतीय फौजदारी कानून की स्थापित व्यवस्था के अनुसार किसी भी ट्रायल कोर्ट द्वारा मुकर्रर किया गया मृत्युदंड तब तक अमल में नहीं लाया जा सकता, जब तक उस पर संबंधित राज्य के हाईकोर्ट की औपचारिक मुहर न लग जाए। यही वजह है कि विशेष अदालत के आदेश के बाद फाइल सीधे उच्च न्यायालय भेजी गई है। वहां खंडपीठ दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर यह परखेगी कि क्या यह मामला दुर्लभ से दुर्लभतम की श्रेणी में पूरी तरह खरा उतरता है अथवा दोषियों को किसी अन्य सजा की पात्रता बनती है।

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साल 2013 का वो खूनी मंजर

यह रक्तरंजित वारदात वर्ष 2013 में उस वक्त घटी थी जब बस्तर क्षेत्र में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का काफिला गुजर रहा था। घात लगाकर बैठे हथियारबंद माओवादियों ने सुनियोजित तरीके से अंधाधुंध गोलीबारी और आईईडी धमाके किए। इस बर्बर हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था, जिसमें कुल 29 लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी।

हमले में शीर्ष सियासी नेतृत्व का सफाया

नक्सलियों के इस खूनी तांडव में समूचा प्रांतीय राजनीतिक नेतृत्व खत्म हो गया था। जान गंवाने वालों में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुखिया नंद कुमार पटेल और उनके सुपुत्र दिनेश पटेल शामिल थे। इसके अलावा बस्तर के कद्दावर आदिवासी चेहरे एवं पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ल और पूर्व विधायक उदय मुदलियार की भी इस हिंसक वारदात में मौत हो गई थी।

जांच का जिम्मा और न्यायिक आयोग

वारदात के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस ने आपराधिक प्रकरण पंजीबद्ध किया था। घटना की भयावहता और व्यापकता को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार ने हमले के महज दो दिनों के भीतर पूरी पड़ताल केंद्रीय एजेंसी एनआईए के हवाले कर दी थी। साथ ही पूरे घटनाक्रम की तह तक जाने के लिए राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के तत्कालीन जज प्रशांत कुमार मिश्रा की निगरानी में एक अलग न्यायिक जांच आयोग का भी गठन किया था।

ट्रायल कोर्ट का फैसला

जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने लंबी कानूनी बहस और गवाहियों के परीक्षण के बाद इसी महीने पांच सितंबर को दो महिलाओं सहित सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया था। इसके पश्चात अदालत ने सजा के बिंदु पर 16 सितंबर के लिए फैसला सुरक्षित रखा और बाद में सभी मुजरिमों को फांसी की सजा सुना दी। अब उच्च न्यायालय के पाले में गेंद है कि वह इस दंड पर अंतिम मुहर लगाता है या नहीं।

सवाल-जवाब

झीरम घाटी मामले में विशेष अदालत ने क्या सजा सुनाई थी?
जगदलपुर स्थित एनआईए की विशेष अदालत ने मामले में दोषी करार दिए गए सभी दस आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी।
दोषियों की फांसी की सजा का मामला हाईकोर्ट क्यों भेजा गया?
कानून के अनुसार किसी भी ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सजा तब तक लागू नहीं हो सकती जब तक हाईकोर्ट उसकी पुष्टि न कर दे।
यह नक्सली हमला किस वर्ष और कहां हुआ था?
यह हमला वर्ष 2013 में छत्तीसगढ़ के बस्तर स्थित झीरम घाटी में हुआ था।
इस हमले में कुल कितने लोगों की जान गई थी?
कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर हुए इस माओवादी हमले में कुल 29 लोगों की मौत हुई थी।
हमले में कांग्रेस के कौन से प्रमुख नेता मारे गए थे?
हमले में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश, महेंद्र कर्मा, विद्या चरण शुक्ल और उदय मुदलियार की मौत हुई थी।
हमले की जांच किस एजेंसी को सौंपी गई थी?
घटना के दो दिन के भीतर ही तत्कालीन राज्य सरकार ने मामले की पूरी जांच एनआईए को सौंप दी थी।
दोषियों में कितनी महिलाएं शामिल हैं?
विशेष अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए 10 अभियुक्तों में दो महिलाएं भी शामिल हैं।
मामले की जांच के लिए बने न्यायिक आयोग के अध्यक्ष कौन थे?
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के तत्कालीन जज प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग गठित किया गया था।
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टिप्पणियाँ 5

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·17 मिनट पहले

झीरम घाटी के इस खूनी कांड की याद आज भी सहमा देती है। इतने साल बीत जाने के बाद भी परिवारों को न्याय का इंतज़ार है। अब देखना होगा कि उच्च न्यायालय इस डेथ रेफरेंस पर क्या फैसला सुनाता है और क्या दोषियों की फांसी की सज़ा बरकरार रहती है?

Ravikash Gupta@ravikash·39 मिनट पहले

इतने साल बाद भी क्या सच में उन दस लोगों को फाँसी तक पहुँचा पाना मुमकिन होगा? कानूनी दांव-पेंच और कागजी कार्रवाई देखकर तो लगता है कि मामला अभी लंबा खिंचेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·38 मिनट पहले

रविकेश, बात तो सही है आपकी, लेकिन नंद कुमार पटेल और महेंद्र कर्मा जैसे बड़े नेताओं के जाने का जो जख्म है, उस पर इंसाफ की उम्मीद में लोग इतने साल भी इंतजार कर रहे हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

दस साल बाद भी हाईकोर्ट के फैसले पर ही बात अटकी है, न्याय मिलने में इतनी देर क्यों लग जाती है?

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

करण भाई, कानूनी प्रक्रिया में डेथ रेफरेंस अनिवार्य है, इसलिए हाईकोर्ट की मंजूरी के बिना बात आगे नहीं बढ़ सकती।

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