बस्तर क्षेत्र में खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान पर इन दिनों एक खतरनाक कीट का गंभीर साया मंडरा रहा है। खेतों में धान के पौधों से जब बालियां बाहर आने का महत्वपूर्ण समय चल रहा है, उसी नाजुक दौर में फसलों पर गॉल मिज कीट का हमला देखा जा रहा है। यह कीट पौधों और बालियों को इस कदर नुकसान पहुंचाता है कि अगर समय रहते रोकथाम न की जाए, तो पैदावार पूरी तरह चौपट हो सकती है। क्षेत्रीय स्तर पर धान का रकबा बहुत बड़ा होने के कारण काश्तकारों के सामने भारी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
स्थानीय बोलचाल में मोंगा और गंगई के नाम से पहचान
कीट विशेषज्ञ धरमपाल केरकेट्टा ने इस कीट के प्रकोप और इसकी प्रकृति के बारे में अहम तकनीकी जानकारियां साझा की हैं। बस्तर अंचल में खरीफ सत्र के दौरान धान की खेती सबसे बड़े पैमाने पर की जाती है। मौजूदा समय में खेतों में तेजी से फैल रहे गॉल मिज को स्थानीय ग्रामीण बोलचाल में मोंगा, पोंगली अथवा गंगई नाम से जाना जाता है। देखने में यह कीट बारीक मच्छर की तरह नजर आता है, लेकिन इसका लार्वा तने के भीतर घुसकर पौधे के विकास को अंदर से पूरी तरह अवरुद्ध कर देता है।
पहचान के लक्षण और उत्पादन पर शून्य का खतरा
धरमपाल केरकेट्टा के मुताबिक इस कीट के आक्रमण की पहचान खेत में बेहद आसानी से की जा सकती है। जब गॉल मिज धान के पौधे पर हमला करता है, तो पौधे की पत्तियां सामान्य रूप से विकसित होने के बजाय मुड़कर प्याज की पत्तियों के समान नलिकाकार दिखाई देने लगती हैं। इस विकृति को देखते ही यह समझ लेना चाहिए कि कीट पौधे के आंतरिक हिस्से पर कब्जा कर चुका है। इस घातक कीट के असर से पौधे में बालियां नहीं निकल पाती हैं, जिसके चलते फसल की उपज में 100 प्रतिशत तक की जबर्दस्त गिरावट आ जाती है और पूरा खेत बंजर जैसा दिखने लगता है।
जल निकासी और संतुलित खाद प्रबंधन के उपाय
फसल को विनाश से बचाने के लिए समय पर कृषि प्रबंधन करना अनिवार्य हो जाता है। यद्यपि इस सीजन में बारिश का पैमाना अपेक्षाकृत कम दर्ज किया गया है, फिर भी खेतों में अनावश्यक जलभराव को तुरंत बाहर निकालने के निर्देश दिए गए हैं। जरूरत से ज्यादा भरा पानी धान के सामान्य जीवन चक्र को बुरी तरह बाधित करता है और कीटों के प्रसार को गति देता है। इसके साथ ही खेतों की मेड़ों पर उगने वाली अवांछित घासफूस की सफाई जरूरी है। काश्तकारों को अत्यधिक यूरिया डालने से सख्त परहेज करना चाहिए और उर्वरकों का संतुलित प्रयोग केवल तय अनुपात में ही करना चाहिए।
फिप्रोनिल और थायामेथोक्साम से रासायनिक समाधान
संक्रमण की रोकथाम हेतु कीट विशेषज्ञ ने सटीक कीटनाशक दवाओं के इस्तेमाल का परामर्श दिया है। रासायनिक उपचार के तौर पर किसान 10 किलो प्रति एकड़ की दर से फिप्रोनिल का प्रयोग कर सकते हैं। यदि तरल रूप में छिड़काव करना हो, तो 500 मिलीलीटर फिप्रोनिल को प्रति एकड़ के मान से छिड़का जा सकता है। इसके अलावा दानेदार रूप में उपलब्ध थायामेथोक्साम का 40 ग्राम प्रति एकड़ का घोल बनाकर इस्तेमाल करने का विकल्प भी मौजूद है। खेतों में कीट का फैलाव गंभीर होने की दशा में 8 से 10 स्प्रे टंकी घोल बनाकर पूरे रकबे में सघन छिड़काव करने की सलाह दी गई है।























