त्योहारी सीजन की शुरुआत होते ही फूलों की मांग तेजी से बढ़ने लगती है, और इसी मौके को बस्तर के एक प्रगतिशील किसान ने अपनी बेहतर आमदनी का जरिया बना लिया है। किसान पुरुषोत्तम पटेल ने लगभग आधे एकड़ रकबे में गेंदे की व्यावसायिक खेती की है। उनकी इस कोशिश से लगभग डेढ़ लाख रुपये की कुल आमदनी होने का अनुमान है। कम लागत और सीमित देखरेख में तैयार होने वाली यह बागवानी फसल इलाके के किसानों के लिए एक आकर्षक विकल्प बनकर सामने आई है।
खेत की तैयारी और रोपाई का सही तरीका
गेंदे की सफल पैदावार के लिए खेत की बुनियादी तैयारी बेहद अहम भूमिका निभाती है। किसान पुरुषोत्तम पटेल के अनुसार, सबसे पहले खेत की दो से तीन बार अच्छी तरह जुताई की जाती है और फिर मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए रोटावेटर चलाया जाता है। इसके उपरांत सुनियोजित तरीके से क्यारियां यानी बेड तैयार की जाती हैं और नर्सरी से पौधे लाकर रोपे जाते हैं। पौधों के समुचित विकास और धूप हवा के सही आवागमन के लिए एक बेड से दूसरे बेड की दूरी 4 फीट तय की जाती है, जबकि कतार में पौधे से पौधे के बीच 2 फीट का अंतर रखा जाता है। रोपाई के महज एक से डेढ़ महीने के भीतर पौधों में फूल खिलने लगते हैं, और यह पैदावार लगातार लगभग छह महीने तक चलती रहती है।
लागत, पोषण प्रबंधन और मुनाफे का गणित
आधे एकड़ क्षेत्र में गेंदे की खेती पर करीब 50 हजार रुपये की कुल लागत आती है। पोषण प्रबंधन के लिए मिट्टी में देसी गोबर खाद के साथ-साथ सुपर फास्फेट और डीएपी का संतुलित इस्तेमाल किया जाता है। फसल के नियमित रखरखाव और बेहतर गुणवत्ता वाले फूलों के लिए 19:19:19 और 12:61:0 जैसे घुलनशील फर्टिलाइजर का छिड़काव किया जाना जरूरी होता है। इस योजनाबद्ध देखरेख के बाद करीब डेढ़ लाख रुपये तक की आमदनी होने की पूरी संभावना बनती है, जिससे लागत काटकर किसान को शुद्ध लाभ मिल जाता है।
त्योहारी मांग और फसल सुरक्षा के उपाय
बस्तर क्षेत्र में फूलों की खपत का दायरा काफी बड़ा है। पूजा-पाठ और दशहरा जैसे बड़े पर्वों के चलते इन दिनों गेंदे के फूलों की मांग चरम पर पहुंच चुकी है, जिसके चलते थोक मंडियों में फूल 80 रुपये प्रति किलो के स्तर पर बिक रहे हैं। हालांकि गेंदे की फसल में सामान्य तौर पर बीमारियों का प्रकोप कम देखा जाता है, लेकिन बारिश के मौसम में ब्लाइट जैसी फफूंदजनित बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। कीटों और अन्य रोगों से सुरक्षा के लिए समय पर कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव करना पड़ता है। अपनी आय को अधिक सुरक्षित और विविध बनाने के लिए किसान ने इसी खेत में टमाटर और मिर्च की फसलें भी लगा रखी हैं।























