मध्य भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक नक्शे पर अलग छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण किसी एक दिन का फैसला नहीं था, बल्कि इसके पीछे दशकों लंबा बौद्धिक, सांस्कृतिक और जन आंदोलन खड़ा रहा। इस पूरे संघर्ष में एक ऐसा असाधारण व्यक्तित्व उभरा जिसने संन्यास के वैराग्य, साहित्य के ओज और चुनावी राजनीति की धार को एक ही सांचे में ढाल दिया। यह शख्सियत थे संत पवन दीवान, जिन्हें उनके समकालीन और समर्थक छत्तीसगढ़ के जन जागरण का गांधी मानते थे। जब भी राज्य निर्माण की ऐतिहासिक यात्रा की पड़ताल होती है, संत पवन दीवान का नाम सबसे पहली कतार में नजर आता है। उन्होंने केवल भाषणों तक अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि धार्मिक मंचों से लेकर चुनावी अखाड़ों तक हर जगह स्थानीय अस्मिता, किसानों के स्वाभिमान और संसाधनों की लूट के खिलाफ मुखर आवाज उठाई। 1 नवंबर 2000 को जब मध्य प्रदेश का पुनर्गठन होकर नया छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आया, तब वह उन चुनिंदा नायकों में थे जिन्होंने अपने जीवनकाल में अपने संघर्ष को पूर्ण राज्य के रूप में फलीभूत होते देखा।
1971 का बिलासपुर सम्मेलन और जनआंदोलन की शुरुआत
पवन दीवान के व्यक्तित्व के विकास और आंदोलन से जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बिलासपुर रहा। वर्ष 1971 में बिलासपुर स्थित बृहस्पति बाजार में आयोजित एक ऐतिहासिक कवि सम्मेलन हुआ था, जहां साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का जमावड़ा लगा। इसी सम्मेलन के दौरान साहित्यकार और उनके सहयोगी डॉ देवधर महंत के साथ उनकी आत्मीयता प्रगाढ़ हुई। दोनों के बीच यह संपर्क सिर्फ कविता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आगे चलकर यह संपर्क सामाजिक चेतना और अलग राज्य के संघर्ष की साझी यात्रा बन गया। उस दौर में पवन दीवान की लोकप्रियता का आलम यह था कि जनसभाओं में आम लोग जोश के साथ नारे लगाते थे कि वे महज पवन का झोंका नहीं बल्कि एक आंधी हैं और छत्तीसगढ़ के सच्चे गांधी हैं। उनकी लोकप्रियता ने यह साबित कर दिया था कि एक कवि जब जनता की नब्ज पकड़ता है, तो कविताएं सत्ता के गलियारों को हिलाने की ताकत हासिल कर लेती हैं।
संसाधनों की समृद्धि और किसानों की बदहाली का दर्द
छात्र जीवन के दिनों से ही पवन दीवान के भीतर क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक विषमताओं को लेकर गहरी टीस थी। उनका स्पष्ट मानना था कि छत्तीसगढ़ की धरती खनिजों, वनों और जल संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद यहां की बहुसंख्यक आबादी अत्यंत गरीबी, उपेक्षा और पिछड़ेपन की शिकार है। दिन-रात खेतों में पसीना बहाने वाले अन्नदाता किसान को दो वक्त का भरपूर भोजन और उनके बच्चों को विकास के बुनियादी मौके तक मयस्सर नहीं हो पा रहे थे। इसी शोषण और क्षेत्रीय असंतुलन ने उनके भीतर के कवि को झकझोरा। उन्होंने लिखा कि छत्तीसगढ़ के पास कुदरत की दी हुई हर नेमत मौजूद है, मगर यहां सबसे बड़ी कमी आत्मसम्मान और स्वाभिमान की है, और वर्तमान दौर की यह खामोशी उनसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती। इन पंक्तियों के जरिए उन्होंने समाज की सोई हुई चेतना को झकझोरने का लगातार प्रयास किया।
माटी के प्रति निष्ठा और संन्यास का संकल्प
आमतौर पर संन्यास का अर्थ सांसारिक मामलों और दुनियादारी से विरक्ति समझा जाता है, लेकिन पवन दीवान के लिए संन्यास की परिभाषा एकदम अलग थी। उन्होंने केवल व्यक्तिगत मोक्ष या आध्यात्मिक शांति तलाशने के लिए गेरुआ वस्त्र धारण नहीं किए थे। उनका मूल मकसद अपनी जन्मभूमि, लोक संस्कृति और स्थानीय अस्मिता की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण जीवन न्योछावर करना था। उनका चिंतन यह था कि पारिवारिक और गृहस्थ जीवन की सामान्य जिम्मेदारियों में बंधकर वे शायद समाज और अपनी धरती के लिए उस स्तर पर समर्पित होकर काम नहीं कर पाते जिसकी उस वक्त आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने संन्यास को सामाजिक और सांस्कृतिक लड़ाई का एक साधन बनाया और पूरे समर्पण के साथ छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति और अलग राज्य की मांग को घर-घर तक पहुंचाने में जीवन बिता दिया।
डॉ खूबचंद बघेल की विरासत और चुनावी जंग
छत्तीसगढ़ को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में पहचान दिलाने के लिए सबसे पहले संगठित प्रयास डॉ खूबचंद बघेल ने किए थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ भ्रातृ संघ का गठन करके बिखरे हुए असंतोष को एक संगठनात्मक रूप दिया था। डॉ बघेल के बाद इस आंदोलन की सबसे मजबूत मशाल संत पवन दीवान ने ही थामी। उन्होंने भ्रातृ संघ के विचारों को न केवल आगे बढ़ाया बल्कि आम लोगों को लामबंद करने के लिए सड़क से लेकर संसद तक का मार्ग चुना। इसी कड़ी में उन्होंने पृथक छत्तीसगढ़ पार्टी के मंच से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा। वे लगातार धरने, जनसभाएं, पदयात्राएं और साहित्यिक गोष्ठियां आयोजित करते रहे, ताकि राज्य निर्माण का मुद्दा केवल बुद्धिजीवियों की मेज तक सीमित न रहकर आम जनता का सबसे प्रमुख भावनात्मक संकल्प बन जाए।
भागवत मंचों से लोकभाषा और अस्मिता का उद्घोष
पवन दीवान की कार्यशैली की सबसे विलक्षण बात यह थी कि उन्होंने अध्यात्म और सामाजिक बदलाव को कभी अलग-अलग नहीं देखा। वे भागवत कथा के बेहद लोकप्रिय प्रवक्ता थे। उनके धार्मिक प्रवचनों में हजारों की संख्या में ग्रामीण और शहरी श्रोता जुटते थे। वे इन धार्मिक आयोजनों में पूरी तरह ठेठ छत्तीसगढ़ी भाषा का इस्तेमाल करते थे। धार्मिक आख्यानों के साथ-साथ वे स्थानीय संस्कृति की महत्ता, भाषा के गौरव और क्षेत्र की जनता के साथ हो रहे आर्थिक शोषण का सच बड़ी बेबाकी से रखते थे। यह पहली बार था जब धर्म का मंच किसी क्षेत्र विशेष के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों की मांग का सशक्त जरिया बना। उनकी इस विशिष्ट शैली ने छत्तीसगढ़ी भाषा को एक नया गौरव दिलाया और दूर-दराज के गांवों में रहने वाले साधारण लोगों के मन में भी अपने अधिकारों की समझ पैदा की।
युवाओं का आह्वान और तेलंगाना का दृष्टांत
उस दौर में जब दक्षिण भारत में पृथक तेलंगाना की मांग को लेकर युवा सड़कों पर उतर रहे थे, तब पवन दीवान ने उस संघर्ष को छत्तीसगढ़ के संदर्भ में एक जनप्रिय नारे में तब्दील कर दिया। उनकी पंक्ति बेहद लोकप्रिय हुई जिसमें उन्होंने ऐलान किया था कि जब हर नौजवान दीवाना हो उठेगा, तब छत्तीसगढ़ भी अपने हक के लिए तेलंगाना की तरह खड़ा हो जाएगा। उनका यह आह्वान राज्य के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और ग्रामीण चौपालों में युवाओं के बीच तेजी से गूंजने लगा। उनकी रचनाएं मात्र साहित्यिक पंक्तियां नहीं थीं, बल्कि वे एक दबे-कुचले अंचल के सामूहिक आक्रोश और आत्मसम्मान की आवाज बन चुकी थीं।
1977 का चुनावी करिश्मा और राजनीतिक उपलब्धियां
पवन दीवान का असर केवल वैचारिक और सांस्कृतिक स्तर तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने राजनीतिक फलक पर भी अप्रत्याशित सफलता हासिल की। वर्ष 1977 के ऐतिहासिक विधानसभा चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल जैसे कद्दावर नेता को मात देकर राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। इस ऐतिहासिक जीत के बाद उन्होंने शासन में भी महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी निभाई। वे मध्य प्रदेश सरकार में पंचायत एवं समाज सेवा राज्य मंत्री बने और साथ ही जेल मंत्री का कार्यभार भी संभाला। इसके अतिरिक्त उन्होंने दो बार संसद सदस्य के रूप में लोकसभा में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और छत्तीसगढ़ गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष का दायित्व भी निभाया। राजनीतिक सत्ता के शीर्ष पदों पर रहने के बावजूद उनकी प्राथमिक निष्ठा हमेशा अपनी माटी, लोकसंस्कृति और पृथक राज्य के सपने के प्रति ही समर्पित रही।
सामाजिक समरसता और एकजुटता का संदेश
पवन दीवान की संपूर्ण जीवन यात्रा केवल राजनीतिक अलगाव या सीमाओं के निर्धारण की लड़ाई नहीं थी, बल्कि उनकी दृष्टि में एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना का स्वप्न था। वे अपनी छत्तीसगढ़ी कविताओं और वक्तव्यों के माध्यम से हमेशा यह संदेश देते थे कि जब तक लोग जाति, वर्ग और आपसी भेदभाव को भुलाकर एक सूत्र में नहीं बंधेंगे, तब तक उनका वास्तविक विकास संभव नहीं है। उन्होंने अपनी धरती से अटूट प्रेम और भाईचारे को ही राज्य के निर्माण और उसकी समृद्धि का सबसे बड़ा आधार माना। उनके विचार और रचनाएं आज भी नए छत्तीसगढ़ की बुनियाद में एक मार्गदर्शक स्तंभ की तरह स्थापित हैं।
























