दीपावली का पावन पर्व आते ही चारों तरफ बाजारों में चहल-पहल अपने चरम पर पहुंच चुकी है। लोग अपने आशियानों को रोशन और सजाने के लिए तरह-तरह के आधुनिक सामान, रंग-बिरंगी झालरें और फैंसी दीये खरीदने में जुटे हुए हैं। लेकिन बाजार में आई इस नई चमक-दमक के बीच मिट्टी को आकार देकर खुशियां बांटने वाले पारंपरिक कुम्हार परिवारों के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित कुम्हारपारा इलाके में कई परिवार सदियों से अपनी इस पुश्तैनी विरासत को संभाले हुए हैं। हर वर्ष त्योहार के कई महीने पहले से ही यहां के घरों में दिन-रात चाक घूमते नजर आते हैं, जहां घर के पुरुष, महिलाएं और बच्चे सब मिलकर मिट्टी के दीये, पारंपरिक ग्वालिन और भगवान श्री गणेश तथा माता लक्ष्मी की मूर्तियां गढ़ते हैं। इसके बावजूद बाजार में फैंसी सजावटी विकल्पों, प्लास्टिक व मोम से बने आर्टिफिशियल दीयों और आयातित सजावटी झालरों की भरमार ने इनके पूरे कारोबार को बेहद कठिन दौर में धकेल दिया है।
सजावट के बदलते तौर-तरीके और सिमटती खरीदारी का संकट
स्थानीय शिल्पकारों की मानें तो बीते कुछ वर्षों के दौरान आम उपभोक्ताओं की प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। पहले के समय में दीपावली के अवसर पर हर घर में सैकड़ों की संख्या में मिट्टी के दीये खरीदे जाते थे, जिससे कुम्हारों के पूरे साल का खर्च आसानी से निकल जाता था। अब अधिकांश घरों में मिट्टी के दीयों की खरीदारी महज शगुन के रूप में कुछ गिनी-चुनी संख्या तक सीमित रह गई है। लोग सुविधा, आसान सफाई और कृत्रिम चमक के चक्कर में रेडीमेड प्लास्टिक दीयों और इलेक्ट्रॉनिक झालरों को तरजीह दे रहे हैं। इस बदलते व्यवहार का सीधा और कड़ा असर उन स्थानीय कारीगरों पर पड़ रहा है, जिनकी आजीविका सिर्फ इसी सीजन पर टिकी होती है। कई परिवारों को तो अपनी मेहनत का न्यूनतम मूल्य तक निकालना मुश्किल हो रहा है, जिसके चलते कई लोगों ने चाक पर दीये बनाना पूरी तरह बंद कर केवल मूर्तियों तक खुद को सीमित कर लिया है।
पीढ़ियों से मिट्टी को गढ़ रहा वीरेंद्र प्रजापति का परिवार
कुम्हारपारा में रहने वाले वीरेंद्र प्रजापति पिछले 25 से 26 वर्षों से लगातार मिट्टी के दीये और दीपावली पूजन के लिए उपयोग होने वाली पारंपरिक मूर्तियां बना रहे हैं। यह हुनर उन्हें अपने दादा-दादी और पिता से विरासत में मिला है, यानी उनके घर में दो से तीन पीढ़ियों से यही काम चला आ रहा है। आज भी उनका समूचा परिवार पूरे समर्पण के साथ मिट्टी को गूंधने से लेकर उसे आकार देने, सुखाने और रंगने के काम में एक साथ जुटता है। वे विशेष रूप से दीपावली पूजन के लिए पूजी जाने वाली ग्वालिन और अन्य पारंपरिक प्रतिमाएं तैयार करते हैं। हालांकि वीरेंद्र प्रजापति का कहना है कि पहले जिस तरह से लोग त्योहार के हफ्तों पहले से ऑर्डर देकर मूर्तियां और दीये ले जाया करते थे, वैसी रौनक अब देखने को नहीं मिलती और काम की मांग लगातार घटती जा रही है।
कच्चे माल की चौतरफा मार और भाव घटाने का चौतरफा दबाव
कारीगरों के सामने सबसे गंभीर चुनौती उत्पादन लागत का बेतहाशा बढ़ना है। वीरेंद्र प्रजापति ने बताया कि पहले जिस अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी का एक ट्रैक्टर लगभग 3000 रुपये में मिल जाता था, अब उसी मिट्टी को मंगाने के लिए करीब 3500 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। मिट्टी के अलावा दीयों और मूर्तियों को पकाने के लिए जरूरी भूसा और लकड़ी के भाव भी आसमान छू रहे हैं। लागत बढ़ने के कारण कारीगरों ने अपने तैयार सामान की कीमत में केवल 5 रुपये तक की मामूली बढ़ोतरी की है। लेकिन विडंबना यह है कि थोक व्यापारी और आम ग्राहक अब भी पुराने भाव पर ही सामान खरीदने की जिद पर अड़े रहते हैं। जब कुम्हार नई दरें बताते हैं तो खरीदार मोलभाव करने लगते हैं, जिससे बढ़े हुए खर्च के बीच सामान बेचना कारीगरों के लिए भारी सिरदर्द बन गया है।
दीपक प्रजापति का अनुभव और काम छोड़ने को मजबूर होते कारीगर
इसी बस्ती के एक अन्य कारीगर दीपक प्रजापति पिछले 10 से 12 वर्षों से चाक चलाकर मिट्टी के दीये तैयार कर रहे हैं। उनके परिवार की भी तीन पीढ़ियां इसी हुनर के जरिए अपनी जिंदगी की गाड़ी खींचती रही हैं। दीपक का कहना है कि बढ़ती महंगाई और बाजार में बाहर से आने वाले सजावटी सामानों के दबदबे ने पारंपरिक दीयों की मांग को बहुत कमजोर कर दिया है। इसी भारी आर्थिक दबाव का नतीजा है कि कुम्हारपारा के कई साथी परिवारों ने दीये गढ़ने का काम पूरी तरह से छोड़ दिया है और अब वे केवल मूर्तियों के निर्माण पर ही ध्यान दे रहे हैं। दीपक बताते हैं कि बाहर से आने वाले सस्ते और कृत्रिम उत्पादों के मुकाबले स्थानीय स्तर पर हाथ से तैयार किया गया माल खुले बाजार में जगह नहीं बना पाता, जिससे कारीगरों का मनोबल टूट रहा है।
मौसम का मिजाज और अंतिम पलों में औने-पौने दाम पर बिकता माल
त्योहारी सीजन के दौरान कुम्हार परिवार सामूहिक रूप से हजारों की संख्या में मूर्तियां तैयार करते हैं। उत्पादन के पैमाने की बात करें तो वीरेंद्र प्रजापति के यहां अकेले एक सीजन में लगभग 5 से 6 हजार मूर्तियां बनाई जाती हैं, जबकि परिवार की मेहनत और तैयारी के अनुसार यह आंकड़ा 6 से 8 हजार मूर्तियों तक भी पहुंच जाता है। इन मूर्तियों को सीधे ग्राहकों के अलावा स्थानीय व्यापारियों के नेटवर्क के जरिए बाजार तक पहुंचाया जाता है। हालांकि इस पूरी कवायद में अनिश्चितता का साया हमेशा मंडराता रहता है। अगर त्योहार के दिनों में मौसम पूरी तरह साफ रहे और बाजार में खरीदारों की आवाजाही ठीक रहे तो माल बिक जाता है, लेकिन अगर अचानक बारिश हो जाए या बाजार में सुस्ती छा जाए तो भारी संख्या में मूर्तियां बिना बिकी रह जाती हैं।
दीपावली के अंतिम दिनों में यह संकट और विकराल रूप ले लेता है। जब त्योहार के दिन करीब आते हैं और बनाई गई मूर्तियां नहीं बिकतीं, तो कारीगर भारी आर्थिक घाटे से बचने के लिए उन्हें लागत से भी कम दाम पर बेचने को विवश हो जाते हैं। कई मामलों में व्यापारी स्थिति का फायदा उठाकर बची हुई मूर्तियों को आधे दाम पर खरीदने की पेशकश करते हैं। कई महीनों तक परिवार के हर सदस्य द्वारा बहाए गए पसीने और दिन-रात की मेहनत के बाद भी इन कुम्हार परिवारों के हाथ मुनाफा तो दूर, अपनी असल लागत बचाना भी दूभर हो जाता है।
पारंपरिक संस्कृति बचाने और स्थानीय कारीगरों से खरीदारी की मार्मिक अपील
कुम्हार परिवारों का स्पष्ट कहना है कि मिट्टी का एक दीया सिर्फ प्रकाश करने का जरिया भर नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की आस्था, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का अटूट प्रतीक है। आज भी सनातन परंपरा में मिट्टी के दीये जलाकर ही पर्व की पवित्रता पूरी मानी जाती है। कुम्हारपारा के कारीगरों ने आम जनता से भावुक अपील की है कि वे इस दीपावली पर कृत्रिम चकाचौंध के बीच स्थानीय कुम्हारों के हाथों से गढ़े गए मिट्टी के दीये और पारंपरिक मूर्तियां जरूर खरीदें। उनका कहना है कि ग्राहकों का यह छोटा सा कदम न सिर्फ सदियों पुरानी लोककला और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखेगा, बल्कि पीढ़ियों से इस कठिन काम में जुटे मेहनतकश परिवारों के चूल्हे को जलते रहने का सहारा भी बनेगा।





















