राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में पंचायत राज चुनावों के दौरान एक चौंकाने वाला चुनावी परिणाम सामने आया है, जिसने इंटरनेट की आभासी लोकप्रियता और जमीनी राजनीति के अंतर को उजागर कर दिया है। करोड़ों फॉलोअर्स वाले जाने-माने डिजिटल कंटेंट क्रिएटर पवन साहू की पत्नी कोमल साहू को स्थानीय ग्राम पंचायत के सरपंच पद के मुकाबले में बड़ी शिकस्त झेलनी पड़ी है। ऑनलाइन मंचों पर विशाल प्रशंसक आधार होने के बाद भी कोमल साहू को गांव के मतदाताओं से केवल 277 वोट ही मिल सके।
पंचायत चुनाव में तीसरे स्थान पर खिसकीं कोमल साहू
पंचायती राज व्यवस्था के दूसरे चरण के तहत भीलवाड़ा जिले की 185 ग्राम पंचायत मुख्यालयों पर शुक्रवार के दिन सरपंच और वार्ड पंच पदों के लिए मतदान कराया गया था। मतदान संपन्न होने के बाद शनिवार सुबह तक नतीजे आधिकारिक रूप से घोषित कर दिए गए। शाहपुरा तहसील के अंतर्गत आने वाली फूलिया कलां ग्राम पंचायत मुख्यालय पर सरपंच पद की चुनावी दौड़ में कोमल साहू तीसरे नंबर पर रहीं। इस मुकाबले में भगवती लाल सोनी ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए 1203 मत हासिल किए और ग्राम पंचायत के नए सरपंच निर्वाचित हुए। वहीं, दूसरे स्थान पर रहे प्रत्याशी कालूराम जाट को कुल 797 मत प्राप्त हुए, जिससे मुकाबला पूरी तरह इन दोनों प्रत्याशियों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया।
करोड़ों के डिजिटल नेटवर्क के बावजूद नहीं मिला जनादेश
फूलिया कलां ग्राम पंचायत के ही निवासी पवन साहू सोशल मीडिया जगत का एक बहुत बड़ा नाम हैं। उनके विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर करोड़ों लोग जुड़े हुए हैं, जिनमें यूट्यूब पर लगभग 2 करोड़ 77 लाख, इंस्टाग्राम पर 70 लाख और फेसबुक पर 30 लाख फॉलोअर्स शामिल हैं। चुनावी समर के दौरान राजस्थान के कई प्रमुख सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने बाकायदा वीडियो संदेश जारी करके जनता से कोमल साहू के पक्ष में मतदान करने की अपील की थी। इसके अलावा, पवन साहू ने गांव में अपने स्तर पर हैंडपंप तथा ट्यूबवेल लगवाने जैसे विकास कार्य करवाए थे और लोगों से घर निर्माण में सहयोग की गुहार भी लगाई थी। हालांकि, प्रचार और जनसंपर्क के इन तमाम प्रयासों के बावजूद गांव के मतदाताओं ने उनकी पत्नी को पंचायत का नेतृत्व सौंपने से इनकार कर दिया।
डिजिटल प्रसिद्धि बनाम जमीनी जनसमर्थन
इस चुनाव में खड़े अधिकतर प्रत्याशियों ने प्रचार के लिए सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया था, लेकिन फूलिया कलां के नतीजों ने एक व्यापक बहस को जन्म दे दिया है। चुनावी विश्लेषक और स्थानीय लोग अब ऑनलाइन व्यूज, लाइक्स और फॉलोअर्स की संख्या की तुलना मतपेटी के वास्तविक वोटों से कर रहे हैं। इन परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि स्क्रीन पर करोड़ों लोगों का ध्यान खींचना एक अलग विषय है, जबकि गांव या समाज के स्तर पर लोगों का व्यक्तिगत विश्वास और राजनीतिक निष्ठा जीतना एकदम अलग प्रक्रिया है। फूलिया कलां की जनता ने यह संदेश दे दिया है कि केवल आभासी दुनिया का प्रभाव चुनावी सफलता की गारंटी नहीं बन सकता।





















