नियामक जांच में अदाणी समूह को राहत, पांच कंपनियों ने सेबी को चुकाए 1.51 करोड़ रुपयेगणेशोत्सव के अंतिम बुधवार पर करें बप्पा की विशेष स्तुति, दूर होंगे विघ्न और बढ़ेगी समृद्धिकर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ा, सरकार ने अनिवार्य ईपीएफओ वेतन सीमा को ₹25,000 कियाईरान वार्ता में प्रगति के संकेतों से कच्चे तेल में लगातार पांचवें दिन गिरावट, डब्ल्यूटीआई 89.50 डॉलर के करीबकच्चे तेल में भारी उथल-पुथल: मिडिल ईस्ट सप्लाई और ग्लोबल तनाव के बीच ऊर्जा बाजार में दबावजेफ्री हिंटन का बड़ा अंदेशा, पांच से दस वर्षों में इंसानों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है अनियंत्रित एआईछोटे कस्बों के कारोबारियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने के लिए तैयार होंगे 1000 स्थानीय ट्रेड गाइड, पीयूष गोयल ने पेश किया नया खाकाचेन्नई सुपर किंग्स की प्लेइंग इलेवन लीक कर मैच फिक्सिंग का दावा, दिल्ली के क्रिकेटर वंश बेदी ने डीडीसीए को दी शिकायतबिस्किट का क्रंच बरकरार रखने के स्मार्ट किचन नुस्खे, नमी से बचाने के आसान नियममाइग्रेन और मानसिक तनाव कम करेगा यह पारंपरिक पाउडर, न्यूट्रिशनिस्ट ने बताया बनाने का तरीका
चीन और अमेरिका की महाबैठक से पहले क्यों बैकफुट पर दिख रहे डोनल्ड ट्रंप, शी जिनपिंग से बड़ी डील की उम्मीद बेमानीचीन
23 सित॰ 2026, 12:10 am (35 मिनट पहले)· 0

चीन और अमेरिका की महाबैठक से पहले क्यों बैकफुट पर दिख रहे डोनल्ड ट्रंप, शी जिनपिंग से बड़ी डील की उम्मीद बेमानी

वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच 25 सितंबर की शिखर वार्ता से पहले कारोबारी आंकड़े और रणनीतिक हालात दर्शाते हैं कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के हाथ खाली रह सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के रंगमंच पर जब भी दुनिया की दो शीर्ष महाशक्तियां आमने-सामने होती हैं, तो वैश्विक बाजारों से लेकर कूटनीतिक गलियारों तक हलचल तेज हो जाती है। अधिकांश पर्यवेक्षकों को लगने लगता है कि महीनों से सुलग रहा व्यापारिक टकराव किसी निर्णायक मोड़ पर पहुंच जाएगा या फिर कोई ऐसा समझौता सामने आएगा जो भविष्य की आर्थिक दिशा बदल देगा। हालांकि, 25 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने जा रही बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय बातचीत से यदि किसी ऐतिहासिक या युगांतकारी समझौते की उम्मीद बांधी जा रही है, तो जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आती है। बीजिंग की रणनीति यह साफ संकेत दे रही है कि शिखर वार्ता के मंच से दिखावटी औपचारिकताएं और तीखे बयानों की गूंज तो सुनाई दे सकती है, परंतु ठोस नतीजों के मामले में अमेरिकी पक्ष के हाथ लगभग खाली ही रहने वाले हैं।

मैराथन वार्ता का फीका नतीजा और अधूरी उम्मीदें

शिखर सम्मेलन की जमीन तैयार करने के उद्देश्य से न्यू यॉर्क में दोनों मुल्कों के आला अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय विमर्श आयोजित हुआ था। इस दौरान अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और चीनी प्रतिनिधिमंडल के बीच करीब 8 घंटे तक मैराथन चर्चा चली। इस बैठक के समापन पर अमेरिकी वित्त मंत्री ने व्यापार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर बातचीत को अत्यंत सकारात्मक एवं उत्पादक बताते हुए बड़ा उत्साह प्रकट किया था। इसके बावजूद, यदि 8 घंटे की इस गहन कवायद के वास्तविक परिणामों की पड़ताल की जाए, तो ठोस उपलब्धियों का दायरा बेहद सीमित और औपचारिक दिखाई पड़ता है।

ये भी पढ़ें

इस लंबी चर्चा के बाद दोनों पक्ष केवल इसी बात पर रजामंद हो सके कि व्यावसायिक सौदों की पहचान करने और रियायती टैरिफ वाले सामानों की सूची तैयार करने के लिए एक कार्यदल अथवा व्यवस्था बनाई जाएगी। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नियमन और सहयोग को व्यावहारिक धरातल पर उतारने की सामान्य बात कही गई। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि दोनों देशों के रिश्तों में गहरा तनाव पैदा करने वाले बुनियादी मसलों पर कोई वास्तविक चर्चा नहीं हुई। व्यापार युद्ध के स्थायी समाधान, ताइवान जलडमरूमध्य के नाजुक हालात या पश्चिम एशिया के गंभीर भू-राजनीतिक संकट जैसे संवेदनशील विषयों पर किसी भी पक्ष ने स्पष्ट कदम नहीं उठाए। जब प्रशासनिक अधिकारियों ने जटिल मुद्दों पर निर्णय टाल दिए, तो सारा दारोमदार अब सीधे तौर पर डोनल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की आमने-सामने की मुलाकात पर टिक गया है।

आक्रामक टैरिफ से अचानक नरमी की ओर ट्रंप का रुख

कुछ अरसा पहले तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का रुख चीन के प्रति बेहद कड़ा और आक्रामक माना जाता था। वे बीजिंग पर अमेरिकी विनिर्माण और आर्थिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने के गंभीर आरोप लगाते हुए चीनी आयात पर 145 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ थोप चुके थे। उस दौर के बयानों से ऐसा प्रतीत होता था कि वॉशिंगटन का यह सख्त रुख बीजिंग को झुकने पर विवश कर देगा।

लेकिन हालिया वक्त में अमेरिकी नेतृत्व के सुर में उल्लेखनीय बदलाव दर्ज किया गया है। जब डोनल्ड ट्रंप से दोनों देशों के संबंधों की भावी दिशा पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने चौंकाने वाला लचीलापन दिखाया। उन्होंने कहा कि चीन के साथ उनका तालमेल बहुत शानदार बैठ रहा है और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनके निजी रिश्ते भी काफी मधुर हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी माना कि 145 प्रतिशत का टैरिफ बहुत अधिक था, जिससे चीनी अर्थव्यवस्था पर बेहद गंभीर असर पड़ रहा था, इसलिए वे अब इस प्रकार के अत्यधिक दंडात्मक कदम उठाने के पक्षधर नहीं हैं।

अमेरिकी प्रशासन के इस बदलते रुख की तह में आर्थिक विवशताएं मौजूद हैं। आयात शुल्कों को हथियार बनाकर दबाव बनाने की वॉशिंगटन की नीति अपनी व्यावहारिक सीमाओं से टकरा चुकी है। कठोर पाबंदियों का उलटा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगों पर भी महसूस किया गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि बीजिंग को केवल एकतरफा टैरिफ के सहारे झुका पाना उतना सरल नहीं है जितना आरंभ में आंका गया था।

1 ट्रिलियन डॉलर का ट्रेड सरप्लस और बीजिंग का दबदबा

आगामी बैठक में शी जिनपिंग का पलड़ा भारी क्यों नजर आ रहा है, इसका विश्लेषण करते ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार के ठोस आंकड़े सामने आ जाते हैं। बीजिंग का आत्मविश्वास किसी खोखले वादे पर नहीं, बल्कि उसकी विनिर्माण क्षमता के विशाल विस्तार पर टिका हुआ है।

  • वैश्विक व्यापार अधिशेष: अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीन का कुल ट्रेड सरप्लस 1 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक स्तर को पार कर चुका है। इसका सीधा अर्थ यह है कि चीन बाकी दुनिया को जितना सामान बेचता है, उसका मूल्य उसके द्वारा खरीदे जाने वाले विदेशी उत्पादों से 1 ट्रिलियन डॉलर अधिक है।
  • आयात शुल्कों का बेअसर रहना: वॉशिंगटन द्वारा लगाए गए तमाम प्रतिबंधों और भारी भरकम शुल्कों के बावजूद चीनी निर्यात तंत्र में कोई संरचनात्मक गिरावट दर्ज नहीं हुई, बल्कि उसकी वैश्विक बाजार हिस्सेदारी लगातार मजबूत बनी रही।
  • 6,500 श्रेणियों में आपूर्ति का जाल: आंकड़ों के मुताबिक चीन की ओर से अमेरिकी बाजार को लगभग 6,500 अलग-अलग श्रेणियों के उत्पाद भेजे जाते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस वर्ष इनमें से आधे से अधिक श्रेणियों में चीनी सामानों का निर्यात घटने के स्थान पर और अधिक बढ़ गया है।

जब कड़े प्रतिबंधों के दौर में भी दोनों मुल्कों का द्विपक्षीय व्यापार घटने के बजाय बढ़ता रहा हो, तो बीजिंग के पास जल्दबाजी में कोई समझौता करने की कोई मजबूरी नहीं बचती। शी जिनपिंग भली-भांति समझते हैं कि समय और आपूर्ति श्रृंखला का संतुलन उनके पक्ष में झुका हुआ है। यही कारण है कि वे वॉशिंगटन को कोई बड़ा आर्थिक रियायत पैकेज देने के बजाय सिर्फ मौजूदा शुल्कों की यथास्थिति बनाए रखने या अस्थायी राहत को आगे खिसकाने तक ही सीमित रहेंगे।

ताइवान को रक्षा आपूर्ति और 14 अरब डॉलर का हथियार सौदा

व्यापारिक टकराव के अतिरिक्त ताइवान का सुरक्षा ढांचा इस शिखर वार्ता का सबसे नाजुक पहलू बनने जा रहा है। अमेरिका ने ताइवान को उन्नत रक्षा क्षमताओं से लैस करने के लिए 14 अरब डॉलर के भारी-भरकम हथियार पैकेज की रूपरेखा तैयार की है, जिसके अंतर्गत आधुनिक मिसाइलें, एंटी-ड्रोन रक्षा तकनीक और उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम शामिल किए गए हैं।

इस 14 अरब डॉलर के व्यापक रक्षा सौदे पर अंतिम मुहर लगाना अभी डोनल्ड ट्रंप के अधिकार क्षेत्र में है। आगामी बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस बात पर कड़ा जोर देने की तैयारी में हैं कि वॉशिंगटन ताइवान को हथियारों की यह आपूर्ति तुरंत ठंडे बस्ते में डाले। कूटनीतिक समीकरण संकेत दे रहे हैं कि डोनल्ड ट्रंप इस चीनी मांग के सामने नरमी बरत सकते हैं, क्योंकि वे पहले से ही पश्चिम एशिया में गहराते संघर्ष और घरेलू प्राथमिकताओं के दबाव से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में अमेरिकी प्रशासन ताइवान के मुद्दे पर बीजिंग के साथ किसी नए सीधे टकराव में उलझने से बचना चाहेगा।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीक की अंतहीन होड़

भविष्य की अर्थव्यवस्था को तय करने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत तकनीकों के मोर्चे पर भी किसी बड़े समझौते की संभावना नहीं है। डोनल्ड ट्रंप पहले ही यह नीतिगत रेखा खींच चुके हैं कि अमेरिका फ्रंटियर टेक्नोलॉजी और उन्नत एआई के विकास की रफ्तार किसी भी सूरत में धीमी नहीं पड़ने देगा। जब वॉशिंगटन अपनी तकनीकी बढ़त को किसी समझौते के तहत सीमित करने को तैयार नहीं है, तो बीजिंग के पास भी अपनी तकनीकी खोज को रोकने का कोई कारण शेष नहीं रहता।

नतीजतन, यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नियमन पर कोई संयुक्त वक्तव्य आता भी है, तो वह अत्यंत सीमित और सतही कार्यप्रणाली तक ही सिमटा रहेगा। दोनों में से कोई भी महाशक्ति अपने रणनीतिक तकनीकी प्रभुत्व की बलि देकर किसी व्यापक समझौते पर हस्ताक्षर करने का जोखिम नहीं उठाएगी।

टकराव का स्थायी समाधान नहीं, केवल मतभेदों का प्रबंधन

इन तमाम राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं के आलोक में 25 सितंबर की यह बैठक दोनों महाशक्तियों के बीच बुनियादी अविश्वास को समाप्त करने के बजाय केवल वर्तमान तनाव को नियंत्रित रखने का साधन साबित होगी। दोनों नेता अपनी घरेलू प्राथमिकताओं और वैश्विक दबावों के बीच संवाद का खुला दिखावा करेंगे, लेकिन दुनिया को दिशा देने वाली किसी बड़ी व्यापारिक डील का अभाव साफ दिखाई देगा।

सवाल-जवाब

डोनल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच यह बैठक कब निर्धारित है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच यह बहुचर्चित शिखर वार्ता 25 सितंबर को होनी तय है।
न्यू यॉर्क में हुई अफसरों की बैठक कितने समय तक चली थी?
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और चीनी प्रतिनिधिमंडल के बीच न्यू यॉर्क में यह मैराथन बातचीत पूरे 8 घंटे तक चली थी।
डोनल्ड ट्रंप ने चीनी सामानों पर कितने प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया था?
डोनल्ड ट्रंप ने चीनी उत्पादों के आयात पर 145 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ थोप दिया था।
चीन का वैश्विक ट्रेड सरप्लस कितना दर्ज किया गया है?
चीन का वैश्विक व्यापार अधिशेष यानी ट्रेड सरप्लस 1 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है।
अमेरिका ताइवान को कितने मूल्य का हथियार पैकेज देने की योजना बना रहा है?
अमेरिका ने ताइवान को आधुनिक मिसाइलें और एयर डिफेंस सिस्टम देने के लिए 14 अरब डॉलर का रक्षा पैकेज तैयार किया है।
क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर दोनों देशों के बीच कोई बड़ी डील संभव है?
नहीं, दोनों देश फ्रंटियर टेक्नोलॉजी में अपनी बढ़त छोड़ने को तैयार नहीं हैं, इसलिए केवल सीमित व्यावहारिक संवाद की ही उम्मीद है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp