भारत और चीन के बीच जारी सीमा विवाद को महज़ दो देशों के बीच सरहद तय करने का मामला नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह एशिया के दो दिग्गज मुल्कों के बीच लंबे वक्त से चली आ रही रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता का बड़ा उदाहरण है। ‘China’s War Clouds: The Great Chinese Checkmate’ पुस्तक के लेखक लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी ने एक खास बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि इस पेचीदा मसले को समझने के लिए मौजूदा हालात के बजाय एक सदी से भी अधिक पुराने इतिहास पर नजर डालनी होगी। इसके साथ ही आने वाले समय में सिर्फ वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी ही नहीं, बल्कि नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत पूरा हिमालयी और दक्षिण एशियाई भू-राजनीतिक दायरा भारत की सुरक्षा रणनीतियों को गहराई से प्रभावित करने की कुब्बत रखता है।
सीमा विवाद की ऐतिहासिक और पुरानी पृष्ठभूमि
लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी के मुताबिक, वर्ष 1914 में शिमला में एक अहम सम्मेलन बुलाया गया था, जिसमें ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के नुमाइंदों ने शिरकत की थी। उस दौर में यानी 1913 के दौरान तिब्बत एक आजाद इकाई के रूप में काम कर रहा था और उसी दौरान ब्रिटिश भारत, तिब्बती प्रतिनिधियों और चीनी पक्षों के बीच सीमाओं के निर्धारण को लेकर विचार-विमर्श हुआ था। मैकमोहन लाइन भारत और चीन के दरमियान पूर्वी हिस्से की मुख्य प्रभावी सरहद है, जिसे 1914 के शिमला समझौते के दौरान तय किया गया था। उस समय नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी यानी मौजूदा अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर लंबी चर्चा हुई और तिब्बती तथा ब्रिटिश अधिकारियों ने मिलकर सरहद को पूरी स्पष्टता के साथ परिभाषित किया था।
हालांकि चीन ने इस व्यवस्था को कभी भी दिल से स्वीकार नहीं किया और आने वाले वर्षों में यही बिंदु मैकमोहन लाइन विवाद के रूप में उभरकर सामने आया, जो आज भी भारत-चीन सीमा विवाद की मुख्य बुनियाद में शुमार है। साल 1947 में भारत को आजादी मिली और इसके ठीक दो साल बाद यानी 1949 में चीन की सत्ता में कम्युनिस्ट सरकार काबिज हुई। शुरुआती दौर में दोनों मुल्कों के रिश्ते काफी दोस्ताना रहे और उसी दौरान 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारे गूंजे थे। लेकिन साल 1950 में चीन की सेना द्वारा तिब्बत पर कब्जा जमाने के बाद से पूरे इलाके का सामरिक और रणनीतिक संतुलन तेजी से पलटने लगा था।
पंचशील समझौते से लेकर 1962 की जंग तक का सफर
तारीख 29 अप्रैल 1954 को हुए पंचशील समझौते के तहत भारत ने औपचारिक रूप से तिब्बत को चीन का अभिन्न हिस्सा मान लिया था, जिसके बदले में चीन ने भारत और तिब्बत के बीच व्यापारिक समझौतों की पुरानी व्यवस्था को सुचारू रूप से जारी रखने का पूरा भरोसा दिया था। कुछ सालों तक दोनों देशों के बीच हालात सामान्य बने रहे, लेकिन वर्ष 1959 और 1960 के दौरान स्थितियां बहुत तेजी से करवट लेने लगीं, जब चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री झोउ एनलाई ने भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को खत लिखकर मैकमोहन लाइन को मानने से साफ इनकार कर दिया था। ठीक उसी साल तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा भारत आ गए, जिसके बाद दोनों पड़ोसी देशों के बीच कूटनीतिक तनाव और ज्यादा गहरा गया।
वर्ष 1961 में भारत ने फॉरवर्ड पॉलिसी की शुरुआत की और सरहद के संवेदनशील इलाकों में अपनी अग्रिम चौकियां खड़ी करनी शुरू कर दीं। चीन ने इस कदम पर सख्त आपत्ति जताई और सरहद पर अपनी सैन्य हलचलें तेज कर दीं। लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी बताते हैं कि ठीक उसी समय दुनिया के मंच पर भी बहुत बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम घटित हो रहे थे। सोलह अक्टूबर से अट्ठाइस अक्टूबर 1962 के बीच हुए क्यूबन मिसाइल संकट ने पूरी दुनिया को परमाणु युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था और इसी कालखंड में भारत तथा चीन के बीच पूर्ण सैन्य संघर्ष छिड़ गया था।
करीब 3,488 किलोमीटर लंबी सरहद पर चीन ने पश्चिमी सेक्टर यानी लद्दाख और पूर्वी सेक्टर यानी अरुणाचल प्रदेश दोनों ही मोर्चों पर एक साथ सैन्य आक्रमण कर दिया। लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी के अनुसार, बेहद कम दिनों के भीतर चीनी फौज कई इलाकों में काफी अंदर तक घुस आई थी। इसके बाद चीन के सर्वोच्च नेता माओत्से तुंग और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच कई दौर का पत्राचार हुआ। माओ ने अक्साई चिन को आधिकारिक रूप से चीन का हिस्सा मान लिए जाने की शर्त पर युद्धविराम का प्रस्ताव रखा था, जबकि प्रधानमंत्री नेहरू ने लड़ाई शुरू होने से पहले की स्थिति यानी पूर्व स्थिति को बहाल किए जाने पर जोर दिया था।
आखिरकार नवंबर 1962 में चीन की तरफ से एकतरफा युद्धविराम का ऐलान कर दिया गया। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप अक्साई चिन पर चीन का अवैध कब्जा हमेशा के लिए कायम रह गया, जबकि पूर्वी क्षेत्र से उसकी सेनाएं वापस लौट गईं।
अक्साई चिन का सामरिक और रणनीतिक महत्व
लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी का साफ मानना है कि अक्साई चिन का मसला केवल जमीन के एक टुकड़े पर कब्जे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बीजिंग की दीर्घकालिक सामरिक और आर्थिक महात्वाकांक्षाओं का एक बेहद अहम हिस्सा है। अक्साई चिन के रास्ते ही शिनजियांग प्रांत का संपर्क उन तमाम विशाल परियोजनाओं से जुड़ता है जिन्हें चीन अपनी सर्वोच्च रणनीतिक प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपेक और पाकिस्तान के कब्जे वाला जम्मू-कश्मीर का इलाका भी इसी बड़ी भू-राजनीतिक गणना का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।
यही वजह है कि लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी का यह स्पष्ट मानना है कि चीन कभी भी अपनी मर्जी से अक्साई चिन पर अपनी पकड़ या नियंत्रण को छोड़ने वाला नहीं है।
हिमालयी मोर्चे पर नेपाल की बदलती स्थिति
लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी के साथ हुई इस पूरी बातचीत के दौरान चीन की दूरगामी रणनीतियों, पड़ोसी मुल्कों पर उसके बढ़ते आर्थिक व कूटनीतिक दबाव और क्षेत्रीय सुरक्षा के समीकरणों पर बार-बार खुलकर चर्चा हुई है। इसी व्यापक संदर्भ में नेपाल की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति को समझना बेहद जरूरी हो जाता है। नेपाल भारत और चीन के ठीक बीच बसा हुआ एक अत्यंत संवेदनशील हिमालयी राष्ट्र है, जिसके साथ भारत के रिश्ते बहुत गहरे हैं। भारत और नेपाल के बीच खुली हुई सरहदें, सांस्कृतिक समानताएं, धार्मिक जुड़ाव और सदियों पुराने आर्थिक संपर्क दोनों देशों को आपस में जोड़ते हैं। दूसरी तरफ, बीते कुछ वर्षों में चीन ने भी नेपाल के भीतर अपने बुनियादी ढांचे के विकास, भारी निवेश, संपर्क परियोजनाओं और राजनीतिक गलियारों में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है।
इसी वजह से भविष्य में यदि कभी भारत और चीन के बीच कोई बड़ा सामरिक तनाव या सैन्य टकराव पैदा होता है, तो नेपाल की कूटनीतिक स्थिति बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।
लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी के मुताबिक, यदि किसी भी तरह का भारी कूटनीतिक या सामरिक दबाव बनाया गया, तो नेपाल की मौजूदा प्रवृत्तियों को देखते हुए वह चीन के साथ खड़ा नजर आ सकता है। हालांकि उनके विश्लेषण के अनुसार नेपाल अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किसी भी तरह के प्रत्यक्ष सैनिक हमले के लिए कभी नहीं होने देगा। आज भी अधिकांश नेपाली नागरिक दिल से भारत के साथ ही जुड़े हुए हैं। भले ही पिछले कुछ वर्षों के दौरान द्विपक्षीय रिश्तों में कुछ कड़वाहट या खटास देखने को मिली हो, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि नेपाल के आम लोगों का झुकाव आज भी भारत की तरफ ही है।



















