पश्चिम एशिया में महीनों से चल रही जंग के कारण एनर्जी बाजार में जो हलचल शुरू हुई थी, वह अब तक शांत नहीं हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल और एलपीजी टैंकरों की आवाजाही बार-बार बाधित हो रही है, क्योंकि जब भी हालात सामान्य होने लगते हैं, वॉशिंगटन और तेहरान एक-दूसरे के जहाजों पर हमले के दावे करने लगते हैं। इसी उठापटक के बीच अमेरिका जहां सैन्य टकराव में उलझा है, वहीं चीन ने चुपचाप एक अलग रास्ता तैयार करना शुरू कर दिया है। बीजिंग जमीनी रेल मार्ग के जरिए मध्य एशिया होते हुए ईरान और पश्चिम एशिया तक पहुंच बनाने में जुटा है, और इस दिशा में उसे अभी एक बड़ी कामयाबी मिली है।
किर्गिस्तान में पहली सुरंग पार, प्रोजेक्ट ने पकड़ी रफ्तार
चीन-किर्गिस्तान-उज्बेकिस्तान रेलवे परियोजना के किर्गिस्तान खंड में नंबर-2 नॉर्थ कोश्तोबे सुरंग को पूरी तरह आर-पार कर लिया गया है। चीन-किर्गिस्तान-उज्बेकिस्तान रेलवे कंपनी के मुताबिक, यह किर्गिस्तान सेक्शन में पूरी होने वाली पहली सुरंग है, इसलिए इसे परियोजना के लिए एक बड़ा पड़ाव माना जा रहा है। कंपनी के एक अधिकारी ने बताया कि इस सुरंग की लंबाई 209.6 मीटर है और इसकी गहराई अधिकतम 41 मीटर तक जाती है। इसे सिंगल-ट्रैक रेलवे सुरंग के रूप में डिजाइन किया गया है। निर्माण टीम ने सुरक्षा और गुणवत्ता के तय मानकों का पालन करते हुए इसे तय समयसीमा के भीतर ही पूरा किया।
27 सुरंगें, 43 पुल और 88 रोडबेड सेक्शन, काम कई मोर्चों पर एक साथ
यह सुरंग भले ही अकेली पूरी हुई हो, लेकिन परियोजना पर काम कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर चल रहा है। अब तक 27 सुरंगों, 43 पुलों और 88 रोडबेड सेक्शन पर निर्माण शुरू हो चुका है, जिनमें से फिलहाल सिर्फ एक सुरंग ही पूरी तरह तैयार हो पाई है। इसके अलावा 20 स्टेशनों की नींव डालने का काम भी साथ-साथ चल रहा है। इतने बड़े पैमाने पर एक साथ काम शुरू होना बताता है कि चीन इस रेल कॉरिडोर को लेकर कितनी जल्दी में है।
नेशनल पार्क बचाकर, वन्यजीवों का रास्ता भी छोड़ा
परियोजना में पर्यावरण को लेकर भी खास सावधानी बरती जा रही है। रेलवे मार्ग को इस तरह डिजाइन किया गया है कि साइमैल्यु-ताश नेशनल पार्क और आसपास के पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों को छुआ तक न जाए। इसके साथ ही रास्ते में जगह-जगह कलवर्ट भी बनाए जा रहे हैं, ताकि वन्यजीवों की आवाजाही में रुकावट न आए और स्थानीय पशुपालकों को भी अपने मवेशियों के साथ आने-जाने में दिक्कत न हो।
लोकल इकोनॉमी को भी फायदा, अफ्रीका से सीखा सबक
चीन ने अफ्रीका में अपने पुराने प्रोजेक्ट्स से जो सबक सीखा, उसे अब यहां भी लागू किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर नाराजगी न पनपे, इसके लिए कंपनी स्थानीय खरीदारी पर खास जोर दे रही है। अब तक करीब 10 अरब सोम (लगभग 11.4 करोड़ डॉलर) मूल्य की सामग्री और उपकरण स्थानीय बाजार से खरीदे जा चुके हैं। परियोजना में इस्तेमाल होने वाला पूरा ईंधन किर्गिस्तान से ही लिया जा रहा है, जबकि सीमेंट समेत ज्यादातर बड़ी निर्माण सामग्री का 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा भी स्थानीय स्रोतों से जुटाया गया है। इसके अलावा 1,700 से ज्यादा स्थानीय मशीनें किराये पर ली गई हैं। स्थानीय समुदायों के विकास पर कंपनी ने अब तक करीब 15.6 करोड़ सोम खर्च किए हैं, जिसमें गांवों की सड़कों को बेहतर बनाना, पानी-बिजली की सुविधा पहुंचाना, दूरसंचार नेटवर्क बिछाना, चिकित्सा सेवाएं देना और पढ़ाई-लिखाई में मदद करना शामिल है।
काशगर से अंदीजान तक, तीन देशों को जोड़ने वाली परियोजना
चीन-किर्गिस्तान-उज्बेकिस्तान रेलवे तीनों देशों के बीच बेल्ट एंड रोड सहयोग की सबसे अहम परियोजनाओं में गिनी जाती है। यह रेल लाइन चीन के शिनजियांग स्थित काशगर शहर से शुरू होगी और तोरुगार्ट दर्रे के रास्ते किर्गिस्तान में दाखिल होगी। इसके बाद यह जलाल-अबाद होते हुए उज्बेकिस्तान के पूर्वी हिस्से में स्थित अंदीजान शहर तक पहुंचेगी। मध्य एशिया में चीन की व्यापारिक और परिवहन कनेक्टिविटी के लिहाज से इसे बेहद अहम परियोजना माना जा रहा है।
होर्मुज और बाब अल-मंदेब को बायपास करने की तैयारी
इस पूरे प्रोजेक्ट की असली अहमियत भूराजनीतिक है। किर्गिस्तान के बाद तुर्कमेनिस्तान और उसके बाद ईरान की सीमा लगती है, इसलिए संभावना जताई जा रही है कि आगे चलकर चीन तुर्कमेनिस्तान के रास्ते ईरान तक भी अपनी सीधी पहुंच बना सकता है। अगर ऐसा हो पाता है, तो चीन को ईरान समेत पश्चिम एशिया के दूसरे देशों से तेल और गैस मंगाने के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज या बाब अल-मंदेब जैसे समुद्री रास्तों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। ईरान जंग और समुद्री लुटेरों की गतिविधियों की वजह से ये दोनों एनर्जी कॉरिडोर पहले ही बेहद संवेदनशील बन चुके हैं, और यही वजह है कि चीन एक भरोसेमंद जमीनी विकल्प तैयार करने में जुटा है।


















