भारतीय क्रिकेट में आदर्श खिलाड़ियों की एक समृद्ध परंपरा रही है। पहले एक ऐसा जमाना था जब हर गली और मैदान में खेलने वाले बच्चे सुनील गावस्कर की तरह ठोस बल्लेबाजी के सपने संजोया करते थे। इसके बाद आने वाली 90 के दशक की पीढ़ी ने सचिन तेंदुलकर को अपना प्रेरणास्रोत बनाया और उनकी तरह बल्ला थामकर अकादमियों का रुख किया। मौजूदा दौर की बात करें तो आज की युवा पीढ़ी और नई उम्र के बच्चे विराट कोहली के अंदाज से काफी प्रभावित हैं। क्रिकेट के मैदान पर उतरने वाला हर उभरता हुआ खिलाड़ी उनकी तरह सटीक बल्लेबाजी और शानदार करियर की चाहत रखता है। ऐसे में यदि किसी युवा खिलाड़ी को ऑफ साइड के क्षेत्र में अपनी बल्लेबाजी को धारदार और असरदार बनाना है, तो कुछ खास तकनीकी ड्रिल्स का नियमित अभ्यास बेहद कारगर साबित हो सकता है।
दीवार के सहारे शैडो बैटिंग का महत्व
बल्ले के स्विंग और शारीरिक संतुलन को सही दिशा देने के लिए शैडो बैटिंग सबसे बुनियादी और मुफीद तरीका माना जाता है। इस अभ्यास के लिए बच्चे को किसी ठोस दीवार से लगभग 4 से 5 फीट की दूरी पर खड़ा करना चाहिए। इस दौरान बिना किसी असली गेंद के ही बल्लेबाज को रक्षात्मक शॉट, फ्रंट फुट ड्राइव और स्ट्रेट ड्राइव खेलने का अभ्यास कराया जाता है। अभ्यास करते वक्त इस बात की बारीक निगरानी जरूरी है कि शॉट खेलते समय सिर गेंद की काल्पनिक रेखा के ठीक ऊपर टिका रहे, आगे वाला पैर सही जगह पर निकले और बल्ला शरीर के नजदीक से बिल्कुल सीधा नीचे की तरफ आए। बिना गेंद के यह लगातार दोहराव बल्ले के प्रवाह और शॉट के दौरान शारीरिक संतुलन को काफी मजबूत बना देता है।
टेनिस गेंद से फुटवर्क को तराशने का तरीका
ऑफ साइड के क्षेत्र में अधिकार के साथ शॉट खेलने के लिए कदमों का सही समय पर और सही दिशा में चलना सबसे जरूरी पहलू है। फुटवर्क को सटीक बनाने के लिए टेनिस गेंद का इस्तेमाल बेहद फायदेमंद रहता है। अभ्यास कराने वाले व्यक्ति को बल्लेबाज के ठीक सामने से हल्के हाथों से टेनिस गेंद फेंकनी चाहिए, जिसमें गति बहुत ज्यादा तेज न हो। कभी गेंद को आगे की तरफ फुल लेंथ पर डालें तो कभी शरीर से हल्की सी दूरी बनाकर फेंके। गेंद की दिशा और लंबाई को भांपते हुए बच्चे को कभी आगे के पैर पर तो कभी पिछले पैर पर जाकर शॉट खेलना सिखाया जाना चाहिए। युवा खिलाड़ियों को यह बुनियादी बात समझाई जानी चाहिए कि एक उम्दा बल्लेबाजी हाथों के जोर से पहले पैरों की सही हलचल से शुरू होती है।
ड्रॉप-बॉल रिएक्शन से टाइमिंग में सुधार
दुनिया भर में अपनी तेज रफ्तार गेंदबाजी से पहचान बनाने वाले कई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर शुरुआती दिनों में टेनिस बॉल क्रिकेट खेलकर ही आगे बढ़े हैं। गेंदबाजी के साथ ही बल्लेबाजी के विकास में भी टेनिस गेंद की भूमिका काफी असरदार साबित होती है। इस ड्रिल के तहत बच्चे को अपने सामान्य बैटिंग स्टांस में खड़ा किया जाता है और उसके सामने टेनिस बॉल को अलग-अलग ऊंचाई से सीधे नीचे गिराया जाता है। बल्लेबाज का लक्ष्य गेंद को बल्ले के बिल्कुल बीचोंबीच यानी स्वीट स्पॉट से हिट करना होना चाहिए। लगातार इस अभ्यास से आंखों और हाथों का तालमेल काफी दुरुस्त होता है, गेंद की गति को समझने की क्षमता निखरती है और शॉट की टाइमिंग में सुधार आता है। शुरुआत में केवल गेंदों को रोकने यानी डिफेंस का अभ्यास कराया जाना चाहिए और तकनीक बेहतर होने पर ड्राइव या कट जैसे आक्रामक शॉट जोड़े जा सकते हैं।
ताकत से ज्यादा तकनीक और निरंतरता पर जोर
इन तीनों ड्रिल्स को यदि प्रतिदिन सिर्फ 10 से 15 मिनट भी पूरे अनुशासन और सही तकनीक के साथ कराया जाए, तो भले ही रातों-रात बदलाव न दिखे, लेकिन बल्लेबाजी की बुनियादी नींव काफी मजबूत हो जाती है। खिलाड़ी की उम्र और खेल के स्तर के अनुसार आगे चलकर इन अभ्यासों की कठिनाई बढ़ाई जा सकती है। यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि कोई भी बड़ा मुकाम एक दिन की मेहनत से हासिल नहीं होता। शॉट खेलते समय सिर का स्थिर रहना, आखिरी क्षण तक गेंद पर निगाहें टिकाए रखना और बिना ताकत झोंके टाइमिंग पर भरोसा जताना ही किसी भी बल्लेबाज को लंबी रेस का खिलाड़ी बनाता है।



















