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मानसिक तनाव और अकेलेपन के दौर में बुनियादी मानवीय रिश्तों की ओर लौटने की सलाहस्वास्थ्य
19 सित॰ 2026, 9:53 pm (23 मिनट पहले)· 1

मानसिक तनाव और अकेलेपन के दौर में बुनियादी मानवीय रिश्तों की ओर लौटने की सलाह

आधुनिक तकनीक, जलवायु संकट और अलगाव के बीच मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने शरीर की देखभाल, व्यक्तिगत मेलजोल और सामुदायिक सहयोग को जरूरी बताया है।

वर्तमान दौर में जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की भरमार, वैश्विक संकट और सामाजिक अलगाव हर वर्ग को मानसिक रूप से थका रहे हैं, तब मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जीवन के बुनियादी तौर-तरीकों को दोबारा अपनाने का आह्वान किया है। वॉशिंगटन डी.सी. में आयोजित अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के सालाना सम्मेलन के दौरान शोधकर्ताओं और क्लिनिकल विशेषज्ञों ने इस बात पर खास जोर दिया कि वास्तविक समाधान जटिल तकनीकों में नहीं, बल्कि अपने शरीर का ध्यान रखने, लोगों से आमने-सामने मिलने और समाज के सबसे कमजोर तबकों के प्रति संवेदनशील बनने में छिपा है।

सम्मेलन के सत्रों में यह स्पष्ट रेखांकित किया गया कि दफ्तर या घर में दैनिक जिम्मेदारियों को सामान्य रूप से निभाते रहने का अर्थ यह कतई नहीं है कि व्यक्ति भीतर से पूरी तरह स्वस्थ है। ब्लैक विमेंस हेल्थ इमपेरेटिव की अध्यक्ष जॉय डी कैलोवे ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक दबा हुआ मानसिक तनाव समय बीतने के साथ जैविक नुकसान में बदल जाता है। उन्होंने मिशिगन विश्वविद्यालय की जनस्वास्थ्य शोधकर्ता आर्लीन गेरोनिमस द्वारा प्रतिपादित वेदरिंग थ्योरी का उल्लेख करते हुए बताया कि लगातार विषम परिस्थितियों में जीने से शारीरिक तंत्र अंदर से घिसने लगता है।

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कैलोवे ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि वर्तमान समाज अक्सर केवल प्रतिकूल परिस्थितियों को झेल लेने की क्षमता को ही संपूर्ण स्वास्थ्य मान लेता है। उनके अनुसार लचीलेपन और वास्तविक कल्याण के बीच का यह भ्रम दूर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारा सबसे बड़ा अंधा बिंदु यह है कि हमने केवल विपरीत परिस्थितियों में टिके रहने को ही समग्र स्वास्थ्य मान लिया है। उनके अनुसार वास्तविक स्वास्थ्य केवल एक व्यक्ति की निजी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह परिवारों के स्नेह, सामुदायिक सहयोग और न्यायसंगत नीतियों व संस्थाओं के मजबूत ढांचे से तैयार होता है।

तीन दिनों तक चले इस विशाल शैक्षणिक समागम में साठ देशों के करीब 8,000 प्रतिभागियों ने भौतिक रूप से उपस्थिति दर्ज कराई। इस व्यापक कार्यक्रम के अंतर्गत 523 अलग-अलग परिचर्चा सत्र आयोजित हुए, जिनमें 1,180 वक्ताओं ने अपनी बात रखी। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक शोध प्रस्तुतियों के लिए 91 पोस्टर सत्र निर्धारित किए गए थे, जहां 1,921 शोधार्थियों ने 2,115 शोध पोस्टर प्रदर्शित किए।

मानसिक थकान और दिशाहीनता की चुनौतियां

युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य, प्रौद्योगिकी के मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभावों और वयस्क जीवन में बढ़ती दिशाहीनता पर केंद्रित सत्रों में विशेषज्ञों ने माना कि वर्तमान में लोग गहरे संशय से जूझ रहे हैं। तकनीकी उथल-पुथल और वैश्विक अस्थिरता के बीच सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना हर उम्र के व्यक्ति के लिए कठिन साबित हो रहा है।

मनोवैज्ञानिक अली मट्टू ने अपने क्लिनिकल अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि एक दशक पहले लोग तनाव और घबराहट से राहत पाने के लिए डॉक्टरों के पास आते थे, जो बाद में आपसी रिश्तों और जुड़ाव की समस्याओं में बदला। मट्टू ने मुख्य मंच से श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि पचास वर्ष से कम उम्र का लगभग हर व्यक्ति इस समय जीवन का अर्थ, इंसानी जुड़ाव, उम्मीद और भारी मानसिक थकावट से निपटने के रास्ते तलाश रहा है। लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि चारों तरफ चरमराते दिख रहे सामाजिक और वैश्विक ढांचों के बीच वे खुद को कैसे संभालें।

इस भारी मानसिक बोझ के पीछे परफेक्शनिज्म यानी हर काम में पूर्णता की अंधी दौड़ और विकल्पों का अत्यधिक विस्तार भी एक बड़ी वजह है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में सामाजिक मनोविज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर थॉमस करन ने इस पहलू पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लोग इस बात से परेशान नहीं हैं कि वे क्या कर रहे हैं, बल्कि इस चिंता में घिरे हैं कि वे और क्या बेहतर कर सकते थे। यह स्थिति एक ऐसे विशाल समंदर में तैरने जैसी है जहां ठहरने के लिए कोई किनारा दिखाई नहीं देता। इससे बचने का व्यावहारिक उपाय सुझाते हुए करन ने कहा कि रोजमर्रा की जिंदगी में थोड़ी-थोड़ी असुविधाओं का सामना करने की आदत डालनी चाहिए।

युवाओं के लिए यह सकारात्मक बदलाव तभी संभव है जब वे हर समय स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहने और अपने-अपने डिजिटल दायरे में कैद रहने की संस्कृति का विरोध करें। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले की स्नातक छात्रा निक्की अय्यर ने नई पीढ़ी के इस अंतर्विरोध को बेहद बारीकी से रेखांकित किया। अय्यर ने कहा कि हमारी पीढ़ी भले ही सबसे अधिक जुड़ी हुई पीढ़ी दिखती हो, लेकिन वास्तव में हम सबसे अकेले और कटे हुए लोग हैं। जब लोग ट्रेनों में, पार्कों में या कैफे में साथ होते हुए भी सिर्फ अपनी स्क्रीन में डूबे रहते हैं, तो यह सामाजिक प्राणियों के रूप में बड़े होने का बेहद दुखद तरीका है।

अय्यर ने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया कि दिग्गज टेक कंपनियां अगर भारी मात्रा में लॉबिंग और विज्ञापनों पर अकूत धन खर्च कर रही हैं, तो उसकी वजह यही है कि युवा अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया के अत्यधिक दखल के खिलाफ खड़े होने लगे हैं। कई युवा अब डिजिटल समय को कम करके आमने-सामने मिलने और अनोखे शौक पूरे करने की ओर लौट रहे हैं।

तकनीक के सामाजिक प्रभाव पर बात करते हुए सदर्न कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के रॉसियर स्कूल ऑफ एजुकेशन में शिक्षा और मनोविज्ञान की प्रोफेसर ब्रेंडेषा टाइन्स ने आगाह किया कि एआई मॉडल मुख्य रूप से श्वेत पुरुषों के नजरिए वाले डेटा सेट पर तैयार किए गए हैं। टाइन्स ने कहा कि एआई की बुनियादी बनावट में ही अश्वेत विरोधी पूर्वाग्रह भरा हुआ है। उन्होंने तकनीक के अंधाधुंध विस्तार की गति को धीमा करने की अपील करते हुए कहा कि युवाओं को ऐसे एल्गोरिद्म के पूर्वाग्रहों की पहचान करने और भविष्य में निष्पक्ष तकनीक बनाने के हुनर सीखने होंगे।

सामुदायिक जुड़ाव और संबल की ताकत

सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में शोधकर्ताओं ने वंचित और हाशिए पर मौजूद समुदायों में मानसिक मजबूती और प्रतिरोधक क्षमता को समझने के लिए नए मॉडल प्रस्तुत किए। इनमें लैंगिक और यौन विविधता वाले युवाओं से लेकर दिव्यांग और नस्लीय रूप से उपेक्षित लोग शामिल थे।

एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर जोशुआ पारमेंटर ने अश्वेत और विविध पृष्ठभूमि के लोगों के लिए एक विशेष प्रतिरोध मॉडल प्रस्तुत किया। इसमें मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले संदेशों को व्यक्तिगत स्तर पर खारिज करने और सामूहिक रूप से सशक्त होने की रूपरेखा समझाई गई। इसी प्रकार ओकलाहोमा स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जूल्स सोपर ने विपरीत कानूनों का सामना कर रहे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की मुकाबला करने की रणनीतियों पर अपने निष्कर्ष रखे।

विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय, मैडिसन के एसोसिएट प्रोफेसर एल्विन थॉमस ने स्पष्ट किया कि दूसरों को संबल देने के लिए किसी औपचारिक रिश्ते का होना अनिवार्य नहीं है। थॉमस ने कहा कि अपनी कोई संतान न होने के बावजूद वे खुद को एक पिता मानते हैं, क्योंकि वे कैरेबियाई देशों और पूरे अमेरिका में अपने भतीजों, भांजियों और कई जरूरतमंद बच्चों के मार्गदर्शन का जिम्मा उठाते हैं।

इमैनुएल कॉलेज में मनोविज्ञान की प्रोफेसर और रॉयल हॉलोवे, लंदन विश्वविद्यालय की विजिटिंग शोधकर्ता क्लेयर एम मेहता ने हर नागरिक से अपील की कि वे अपने पड़ोस और साझा सार्वजनिक स्थानों में आगे बढ़कर संबंध बनाएं। उन्होंने लोगों को पुराने जमाने के गांव वालों की तरह आपस में घुलने-मिलने की सलाह दी। मेहता ने कहा कि शारीरिक सेहत की चिंता में लोग अक्सर मेलजोल छोड़ देते हैं, जबकि सच यह है कि सामाजिक संपर्क से कटना सेहत के लिए शराब पीने से भी ज्यादा नुकसानदेह हो सकता है। कैफे या पब में जाकर केवल जूस या सादा पानी पीते हुए भी लोगों से बातचीत की जा सकती है।

युवा मस्तिष्क की जैविक बनावट को सकारात्मक बताते हुए चैपल हिल स्थित नॉर्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान की प्रोफेसर ईवा टेलज़र ने कहा कि युवा पीढ़ी बदलाव लाने में सबसे आगे रह सकती है। मुख्य सत्र के प्रश्नोत्तर काल में टेलज़र ने कहा कि युवाओं के दिमाग की बुनावट ऐसी होती है कि वे जोखिम भी उठाते हैं और अपने साथियों व सामाजिक संबंधों की गहराई से परवाह भी करते हैं। यह स्वभाव उन्हें समाज में अच्छाई फैलाने की सबसे मुफीद स्थिति में रखता है।

प्रौद्योगिकी के सकारात्मक उपयोग को लेकर मट्टू ने जोर दिया कि आधुनिक एआई को इंसानी क्षमताओं के सहायक के रूप में काम करना चाहिए, न कि मानवीय अस्तित्व के प्रतिस्थापन के रूप में। उन्होंने सलाह दी कि जिन क्षेत्रों में हम कमजोर हैं, वहां तकनीक की मदद ली जाए, लेकिन अपनी विशिष्ट मानवीय प्रवृत्तियों को पूरी तरह सुरक्षित रखा जाए। मट्टू ने उन तीन क्षेत्रों को एआई से दूर रखने की सलाह दी जिनसे व्यक्ति अगाध प्रेम करता है, जिनमें उसकी विशेषज्ञता है और जिनके लिए वह उच्च नैतिक मानक रखता है।

सम्मेलन के समापन संदेश को रेखांकित करते हुए रटगर्स यूनिवर्सिटी, नेवार्क की डीन और मनोवैज्ञानिक जैकलिन एस मैटिस ने मानवीय संवेदनाओं के महत्व पर बात रखी। मैटिस ने कहा कि कोशिकाओं के एक सूक्ष्म समूह से जीवन शुरू करके एक-दूसरे से प्रेम करना और दूसरों के लिए त्याग करने की क्षमता हासिल करना ही हमें वास्तव में इंसान बनाता है और इस जीवन को जीने लायक बनाता है।

सवाल-जवाब

सम्मेलन में मानसिक स्वास्थ्य के लिए क्या बुनियादी कदम सुझाए गए?
विशेषज्ञों ने शरीर की समुचित देखभाल करने, लोगों से आमने-सामने मिलने और कमजोर तबकों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने की सलाह दी है।
वेदरिंग थ्योरी क्या है और इसका क्या असर होता है?
इस सिद्धांत के अनुसार लंबे समय तक लगातार झेला जाने वाला तनाव व्यक्ति के शरीर को अंदरूनी और जैविक रूप से नुकसान पहुंचाता है।
इस सम्मेलन में कितने देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया?
वॉशिंगटन डी.सी. में आयोजित इस तीन दिवसीय सम्मेलन में 60 देशों के लगभग 8,000 प्रतिभागियों ने भौतिक रूप से हिस्सा लिया।
विशेषज्ञों के अनुसार एआई को किन क्षेत्रों से दूर रखना चाहिए?
जिन कार्यों से व्यक्ति को सच्चा लगाव हो, जिनमें उसकी गहरी विशेषज्ञता हो और जिनके लिए उच्च नैतिक मानक हों, उन्हें एआई के हवाले नहीं करना चाहिए।
अकेलेपन से निपटने के लिए क्या व्यावहारिक सलाह दी गई है?
लोगों को डिजिटल स्क्रीन छोड़कर पार्कों, कैफे या सार्वजनिक स्थानों पर जाने और पड़ोसियों से संवाद स्थापित करने की सलाह दी गई है।
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