हर साल 5 सितंबर को देश शिक्षक दिवस मनाता है। यह तारीख भारत के उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है। इस मौके पर सिर्फ स्कूल-कॉलेज के अध्यापकों को ही याद नहीं किया जाता, बल्कि मैदान पर खिलाड़ियों को तराशने वाले कोचों को भी उतनी ही शिद्दत से याद किया जाता है।
खेल की दुनिया में गुरु की भूमिका सिर्फ तकनीक सिखाने तक सीमित नहीं होती। एक अच्छा कोच अपने शिष्य को मैदान पर आने वाली हर मुश्किल से जूझना भी सिखाता है और उसे मानसिक रूप से इतना मजबूत बना देता है कि वह हार के बाद भी उठ खड़ा हो सके। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में ऐसे कई गुरु रहे हैं, जिन्होंने साधारण से बच्चों को तराशकर देश के लिए बड़े सितारे तैयार किए। शिक्षक दिवस के मौके पर ऐसी ही कुछ गुरु-शिष्य जोड़ियों को याद किया जा रहा है, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदल दी।
सचिन तेंदुलकर और रमाकांत आचरेकर
भारतीय क्रिकेट में सबसे पहला और सबसे मशहूर नाम सचिन तेंदुलकर और उनके कोच रमाकांत आचरेकर का आता है। मुंबई के शिवाजी पार्क मैदान की नेट्स में बचपन के सचिन को घंटों बल्लेबाजी का अभ्यास कराने वाले आचरेकर सर ने अनुशासन को उनकी सबसे बड़ी ताकत बना दिया था। कड़ी मेहनत और सख्त तालीम की इसी नींव पर आगे चलकर सचिन को क्रिकेट जगत में 'भगवान' का दर्जा मिला।
विराट कोहली और राजकुमार शर्मा
विराट कोहली को क्रिकेट का 'किंग' बनाने की कहानी में उनके बचपन के कोच राजकुमार शर्मा का जिक्र सबसे पहले आता है। राजकुमार सर ने विराट को सिर्फ बल्लेबाजी के दांव-पेच नहीं सिखाए, बल्कि उन्हें भीतर से इतना मजबूत बनाया कि पिता का साया सिर से उठ जाने के अगले ही दिन विराट मैदान पर उतरकर मैच खेल पाए। आज दुनिया के सबसे बड़े सितारों में शुमार होने के बावजूद विराट कोहली अपने इस गुरु का सम्मान करना कभी नहीं भूलते।
महेंद्र सिंह धोनी और केशव रंजन
महेंद्र सिंह धोनी, जिन्होंने अपनी कप्तानी में भारत को दो-दो विश्व कप जिताए, क्रिकेट की दुनिया में एक संयोग से ही आए थे। रांची के श्यामली इलाके में स्कूली दिनों के दौरान धोनी फुटबॉल में गोलकीपर हुआ करते थे। उनकी फुर्ती को भांपते हुए स्कूल कोच केशव रंजन ने ही उन्हें क्रिकेट की विकेटकीपिंग आजमाने की सलाह दी थी। यही सलाह आगे चलकर माही को दुनिया के सबसे कामयाब कप्तानों में शुमार करा गई।
रोहित शर्मा और दिनेश लाड
टीम इंडिया के 'हिटमैन' कहे जाने वाले रोहित शर्मा के सफर में कोच दिनेश लाड की भूमिका किसी परिवार के सदस्य से कम नहीं रही। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने वाले रोहित को दिनेश लाड ने शुरुआत से ही बेटे जैसा स्नेह दिया। उन्होंने रोहित को अनुशासन के साथ-साथ बल्लेबाजी में गेंदबाजों पर हावी होने के तरीके भी सिखाए। शिखर पर पहुंचने के बाद भी रोहित शर्मा आज तक अपने इस पहले गुरु के आगे सिर झुकाना नहीं भूलते।
ऋषभ पंत और तारक सिन्हा
दुनिया भर में आक्रामक बल्लेबाजी के लिए पहचाने जाने वाले ऋषभ पंत को यह मुकाम दिलाने में कोच तारक सिन्हा का बड़ा योगदान रहा। उत्तराखंड से दिल्ली आए ऋषभ की बेखौफ बल्लेबाजी शैली को तारक सिन्हा ने पहचाना और उसे सही दिशा में ढाला। गलती होने पर वे ऋषभ को खूब डांटते थे, लेकिन साथ ही एक पिता की तरह उन पर अपना स्नेह भी लुटाते थे।
वैभव सूर्यवंशी और मनीष ओझा
सिर्फ 15 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू करके सुर्खियां बटोरने वाले वैभव सूर्यवंशी की कामयाबी के पीछे कोच मनीष ओझा की भूमिका रीढ़ की हड्डी जैसी रही है। मनीष ओझा ने बेहद कम उम्र में ही वैभव की प्रतिभा को पहचान लिया था और उनके खेल की तकनीकी खामियों को दूर करने में जुट गए। इसी मार्गदर्शन और वैभव की अटूट मेहनत का नतीजा है कि वह इतनी छोटी उम्र में पूरी दुनिया में छा गए हैं।
गुरु के बिना अधूरी है सफलता की कहानी
सचिन तेंदुलकर से लेकर वैभव सूर्यवंशी तक, इन सभी की कामयाबी की जड़ में एक भरोसेमंद गुरु का हाथ साफ नजर आता है। कोई कोच अपने शिष्य की तकनीक सुधारता है तो कोई उसे मुश्किल वक्त में भावनात्मक सहारा देता है। भारतीय क्रिकेट में यही गुरु-शिष्य परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी नए सितारे गढ़ती आई है, और शिक्षक दिवस इन्हीं गुमनाम मेहनतकशों को सलाम करने का दिन है।



















