कर्नाटक के स्वास्थ्य विभाग में उस वक्त बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब एक वीवीआईपी कनेक्शन से जुड़ा फर्जीवाड़ा सबके सामने आ गया। बागलकोट जिले से एक ऐसा वाकया सामने आया है जहाँ एक डॉक्टर बिना अस्पताल जाए हर महीने सरकारी खजाने से मोटी रकम वसूल रही थी। इस पूरे खेल में रसूखदारों के प्रभाव का इस्तेमाल करने की बात सामने आई है जिसके बाद जिला प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए फौरन बर्खास्तगी का फरमान जारी कर दिया। आम जनता के हक का पैसा किस तरह से नियमों को ताक पर रखकर लूटा जा रहा था, इस खुलासे ने हर किसी को हैरान कर दिया है।
नम्मा क्लिनिक में चल रहा था फर्जीवाड़ा
बागलकोट की वाम्बे कॉलोनी में स्थित नम्मा क्लिनिक में अप्रैल 2025 के दौरान डॉ. अंकिता आर यारागल को संविदा मेडिकल ऑफिसर के पद पर तैनात किया गया था। शुरुआत में सब कुछ कागजों पर ठीक चला लेकिन इस साल मार्च के महीने में उन्होंने अपनी नौकरी के साथ बिना इस्तीफा दिए ही एक प्राइवेट कॉलेज में एमडी पैथोलॉजी की पढ़ाई शुरू कर दी। स्थानीय कार्यकर्ताओं की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक डॉक्टर साहिबा ने महीनों से क्लिनिक का रुख तक नहीं किया था। जब इलाज के लिए गरीब मरीज वहां पहुंचते थे तो उन्हें डॉक्टर नदारद मिलती थीं। पूरे स्वास्थ्य केंद्र की जिम्मेदारी सिर्फ नर्सों के भरोसे छोड़ दी गई थी जबकि डॉक्टर घर बैठे सरकारी सैलरी के तौर पर हर महीने 75,000 रुपये उठा रही थीं।
औचक निरीक्षण में खुली पोल
पूरा मामला तब उजागर हुआ जब बागलकोट तालुक स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सरस्वती मागी ने अचानक उस नम्मा क्लिनिक का निरीक्षण किया। उस वक्त ड्यूटी पर तैनात होने के बावजूद डॉक्टर अपनी सीट से गायब थीं। जब अधिकारी ने फोन पर संपर्क साधा तो डॉ. अंकिता ने लापरवाही भरा जवाब देते हुए खुद को शहर से बाहर होना बताया। हालांकि वहां इलाज कराने आए मरीजों ने अधिकारी के सामने पोल खोल दी और बताया कि डॉक्टर पिछले तीन महीनों से कभी क्लिनिक आई ही नहीं हैं। हैरानी की बात यह थी कि डॉक्टर की गैरमौजूदगी के बावजूद हाजिरी रजिस्टर में उनकी अटेंडेंस लगातार भरी जा रही थी। इस तरह से आम जनता के टैक्स के पैसों की सरेआम बर्बादी हो रही थी और जरूरतमंद लोग इलाज के लिए भटक रहे थे।
राजनीतिक रसूख और प्रशासनिक कार्रवाई
इस पूरे घोटाले के पीछे पारिवारिक रसूख का भरपूर इस्तेमाल होने के आरोप लगे हैं। स्थानीय एक्टिविस्ट राजू नाइक ने बताया कि आरोपी डॉक्टर के पिता डॉ. राजकुमार यारागल खुद जिले के स्वास्थ्य अधिकारी यानी डीएचओ के पद पर हैं। राजनीतिक पहुंच और पारिवारिक पद के दम पर इस फर्जीवाड़े को लंबे समय तक छिपाए रखा गया। जैसे ही यह मामला तूल पकड़ता गया, बागलकोट जिला पंचायत के मुख्य कार्यकारी अधिकारी गजानन बाले ने कड़ा रुख अपनाते हुए डॉ. अंकिता की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त करने के आदेश दे दिए। हालांकि बचाव पक्ष की तरफ से यह सफाई दी गई कि नियुक्ति उनके कार्यकाल से पहले हुई थी और उन्होंने कार्यभार संभालने के बाद बेटी का वेतन रोक दिया था, लेकिन इस पूरे प्रकरण पर विधायक उमेश मेटी और आरोपी डॉक्टर की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।



















